यूपीआई में एमडीआर लागू होने से इंडस्ट्री को ₹20,600 करोड़ तक का फायदा संभव: ब्रोकरेज अनुमान
सारांश
मुख्य बातें
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने के ऐलान के बाद, प्रमुख वैश्विक ब्रोकरेज फर्मों के अनुमान के अनुसार पूरी भुगतान इंडस्ट्री का सालाना रेवेन्यू पूल ₹10,000 करोड़ से बढ़कर ₹20,600 करोड़ तक पहुँच सकता है। यह बदलाव 15 अक्टूबर से प्रभावी होना प्रस्तावित है और इससे बैंकों तथा फिनटेक कंपनियों दोनों के लिए आय के नए द्वार खुलने की उम्मीद है।
एमडीआर की संरचना और दायरा
एनपीसीआई ने ₹2,000 से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पीटूएम) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाने की घोषणा की है। इस शुल्क की अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेनदेन तय की गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शुल्क मर्चेंट वहन करेगा, ग्राहक नहीं — जिससे आम उपभोक्ता पर सीधा बोझ नहीं पड़ेगा।
गौरतलब है कि भारत में यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर को 2020 में समाप्त कर दिया गया था, ताकि डिजिटल भुगतान को व्यापक प्रोत्साहन मिल सके। अब इसे पुनः लागू करने का यह प्रस्ताव भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र में एक बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत देता है।
ब्रोकरेज फर्मों के अनुमान
यूबीएस के अनुसार, बैंकों और भुगतान कंपनियों के लिए सालाना रेवेन्यू पूल ₹10,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के बीच रह सकता है। इसमें से लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा बैंकों के पास रहेगा, जबकि शेष भुगतान कंपनियों को मिलेगा।
गोल्डमैन सैश ने सबसे ऊँचा अनुमान पेश किया है — उसके मुताबिक इंडस्ट्री का संभावित रेवेन्यू पूल ₹20,600 करोड़ तक जा सकता है। यह आकलन इस आधार पर है कि कुल यूपीआई लेनदेन मूल्य का लगभग आधा हिस्सा पूरे 40 आधार अंक एमडीआर के दायरे में आ सकता है।
जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि अधिकतम रेवेन्यू पूल लगभग ₹17,000 करोड़ हो सकता है, जिसमें इश्यूइंग और एक्वायरिंग बैंकों के लिए करीब ₹11,700 करोड़ शामिल हैं। यह राशि सूचीबद्ध वाणिज्यिक बैंकों के वित्त वर्ष 26 के शुद्ध मुनाफे का 2.1 प्रतिशत है।
मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि इस बदलाव का सबसे अधिक सकारात्मक प्रभाव फिनटेक कंपनियों की कमाई पर पड़ेगा।
राजस्व का वितरण
सिटी के अनुमान के अनुसार, सालाना इंडस्ट्री रेवेन्यू पूल ₹16,000 करोड़ से ₹17,000 करोड़ के बीच रहेगा। इसमें से लगभग 60 प्रतिशत बैंकों को, 25 प्रतिशत यूपीआई एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स को और 15 प्रतिशत गैर-बैंक पेमेंट एग्रीगेटर्स को मिलने का अनुमान है। यह वितरण ढाँचा भुगतान इकोसिस्टम में शक्ति संतुलन की स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।
आम जनता और मर्चेंट पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में यूपीआई लेनदेन की मात्रा और मूल्य दोनों रिकॉर्ड स्तर पर हैं। छोटे व्यापारियों और मर्चेंट्स के लिए यह शुल्क एक अतिरिक्त लागत बनेगा, हालाँकि ₹2,000 से कम के लेनदेन इसके दायरे से बाहर रहेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े मर्चेंट इस लागत को अवशोषित कर सकते हैं, लेकिन छोटे कारोबारियों पर दबाव बढ़ सकता है।
क्या होगा आगे
15 अक्टूबर की प्रस्तावित तारीख से पहले उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं के बीच विस्तृत विचार-विमर्श की संभावना है। इस फैसले का असर न केवल बैंकिंग क्षेत्र, बल्कि फोनपे, गूगल पे जैसे यूपीआई एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स और पेमेंट एग्रीगेटर्स पर भी पड़ेगा। डिजिटल भुगतान क्षेत्र की दीर्घकालिक वृद्धि इस नीतिगत परिवर्तन के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।