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यूपीआई में एमडीआर लागू होने से इंडस्ट्री को ₹20,600 करोड़ तक का फायदा संभव: ब्रोकरेज अनुमान

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यूपीआई में एमडीआर लागू होने से इंडस्ट्री को ₹20,600 करोड़ तक का फायदा संभव: ब्रोकरेज अनुमान

सारांश

एनपीसीआई के एमडीआर ऐलान के बाद वैश्विक ब्रोकरेज फर्मों ने बड़े अनुमान पेश किए हैं — गोल्डमैन सैश का आँकड़ा ₹20,600 करोड़ तक जाता है। 15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के पीटूएम लेनदेन पर 0.4% शुल्क लागू होगा, जिसका फायदा बैंकों, फिनटेक और पेमेंट एग्रीगेटर्स को मिलेगा।

मुख्य बातें

एनपीसीआई ने 15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के पीटूएम यूपीआई लेनदेन पर 0.4% एमडीआर लगाने की घोषणा की है।
अधिकतम शुल्क सीमा ₹300 प्रति लेनदेन निर्धारित; यह शुल्क मर्चेंट वहन करेगा, ग्राहक नहीं।
गोल्डमैन सैश का अनुमान — इंडस्ट्री रेवेन्यू पूल ₹20,600 करोड़ तक पहुँच सकता है।
जेपी मॉर्गन के अनुसार अधिकतम पूल ₹17,000 करोड़ ; बैंकों को ₹11,700 करोड़ — वित्त वर्ष 26 के शुद्ध मुनाफे का 2.1% ।
सिटी के अनुसार राजस्व में 60% बैंकों को, 25% यूपीआई ऐप प्रोवाइडर्स को और 15% गैर-बैंक पेमेंट एग्रीगेटर्स को मिलेगा।
मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि फिनटेक कंपनियों की कमाई पर इसका प्रभाव सबसे अधिक होगा।

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने के ऐलान के बाद, प्रमुख वैश्विक ब्रोकरेज फर्मों के अनुमान के अनुसार पूरी भुगतान इंडस्ट्री का सालाना रेवेन्यू पूल ₹10,000 करोड़ से बढ़कर ₹20,600 करोड़ तक पहुँच सकता है। यह बदलाव 15 अक्टूबर से प्रभावी होना प्रस्तावित है और इससे बैंकों तथा फिनटेक कंपनियों दोनों के लिए आय के नए द्वार खुलने की उम्मीद है।

एमडीआर की संरचना और दायरा

एनपीसीआई ने ₹2,000 से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पीटूएम) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाने की घोषणा की है। इस शुल्क की अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेनदेन तय की गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शुल्क मर्चेंट वहन करेगा, ग्राहक नहीं — जिससे आम उपभोक्ता पर सीधा बोझ नहीं पड़ेगा।

गौरतलब है कि भारत में यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर को 2020 में समाप्त कर दिया गया था, ताकि डिजिटल भुगतान को व्यापक प्रोत्साहन मिल सके। अब इसे पुनः लागू करने का यह प्रस्ताव भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र में एक बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत देता है।

ब्रोकरेज फर्मों के अनुमान

यूबीएस के अनुसार, बैंकों और भुगतान कंपनियों के लिए सालाना रेवेन्यू पूल ₹10,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के बीच रह सकता है। इसमें से लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा बैंकों के पास रहेगा, जबकि शेष भुगतान कंपनियों को मिलेगा।

गोल्डमैन सैश ने सबसे ऊँचा अनुमान पेश किया है — उसके मुताबिक इंडस्ट्री का संभावित रेवेन्यू पूल ₹20,600 करोड़ तक जा सकता है। यह आकलन इस आधार पर है कि कुल यूपीआई लेनदेन मूल्य का लगभग आधा हिस्सा पूरे 40 आधार अंक एमडीआर के दायरे में आ सकता है।

जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि अधिकतम रेवेन्यू पूल लगभग ₹17,000 करोड़ हो सकता है, जिसमें इश्यूइंग और एक्वायरिंग बैंकों के लिए करीब ₹11,700 करोड़ शामिल हैं। यह राशि सूचीबद्ध वाणिज्यिक बैंकों के वित्त वर्ष 26 के शुद्ध मुनाफे का 2.1 प्रतिशत है।

मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि इस बदलाव का सबसे अधिक सकारात्मक प्रभाव फिनटेक कंपनियों की कमाई पर पड़ेगा।

राजस्व का वितरण

सिटी के अनुमान के अनुसार, सालाना इंडस्ट्री रेवेन्यू पूल ₹16,000 करोड़ से ₹17,000 करोड़ के बीच रहेगा। इसमें से लगभग 60 प्रतिशत बैंकों को, 25 प्रतिशत यूपीआई एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स को और 15 प्रतिशत गैर-बैंक पेमेंट एग्रीगेटर्स को मिलने का अनुमान है। यह वितरण ढाँचा भुगतान इकोसिस्टम में शक्ति संतुलन की स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।

आम जनता और मर्चेंट पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब भारत में यूपीआई लेनदेन की मात्रा और मूल्य दोनों रिकॉर्ड स्तर पर हैं। छोटे व्यापारियों और मर्चेंट्स के लिए यह शुल्क एक अतिरिक्त लागत बनेगा, हालाँकि ₹2,000 से कम के लेनदेन इसके दायरे से बाहर रहेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े मर्चेंट इस लागत को अवशोषित कर सकते हैं, लेकिन छोटे कारोबारियों पर दबाव बढ़ सकता है।

क्या होगा आगे

15 अक्टूबर की प्रस्तावित तारीख से पहले उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं के बीच विस्तृत विचार-विमर्श की संभावना है। इस फैसले का असर न केवल बैंकिंग क्षेत्र, बल्कि फोनपे, गूगल पे जैसे यूपीआई एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स और पेमेंट एग्रीगेटर्स पर भी पड़ेगा। डिजिटल भुगतान क्षेत्र की दीर्घकालिक वृद्धि इस नीतिगत परिवर्तन के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन बैंकों और फिनटेक कंपनियों के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल के बिना। ₹20,600 करोड़ के अनुमान आकर्षक हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या छोटे मर्चेंट इस लागत को वहन कर पाएंगे या डिजिटल भुगतान से नकद की ओर वापसी होगी। 2020 में एमडीआर हटाने के पीछे यही डर था। बिना व्यापक मर्चेंट-सब्सिडी ढाँचे के, यह नीति डिजिटल समावेश की उन उपलब्धियों को जोखिम में डाल सकती है जो भारत ने पिछले पाँच वर्षों में हासिल की हैं।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपीआई पर एमडीआर क्या है और यह कब से लागू होगा?
एमडीआर वह शुल्क है जो मर्चेंट को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर देना होता है। एनपीसीआई ने ₹2,000 से अधिक के पीटूएम यूपीआई लेनदेन पर 0.4% एमडीआर 15 अक्टूबर से लागू करने की घोषणा की है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेनदेन है।
क्या यूपीआई एमडीआर से ग्राहकों पर कोई असर पड़ेगा?
नहीं, यह शुल्क मर्चेंट वहन करेगा, ग्राहक नहीं। इसके अलावा, ₹2,000 से कम के लेनदेन इस शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे, जिससे छोटे दैनिक भुगतान प्रभावित नहीं होंगे।
ब्रोकरेज फर्मों के अनुसार इंडस्ट्री को कितना फायदा होगा?
विभिन्न ब्रोकरेज फर्मों के अनुमान अलग-अलग हैं — यूबीएस का अनुमान ₹10,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़, जेपी मॉर्गन का ₹17,000 करोड़, सिटी का ₹16,000 करोड़ से ₹17,000 करोड़ और गोल्डमैन सैश का सबसे ऊँचा अनुमान ₹20,600 करोड़ है।
इस राजस्व में बैंकों और फिनटेक कंपनियों की कितनी हिस्सेदारी होगी?
सिटी के अनुमान के अनुसार, कुल राजस्व में से लगभग 60% बैंकों को, 25% यूपीआई एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स को और 15% गैर-बैंक पेमेंट एग्रीगेटर्स को मिलेगा। यूबीएस के अनुसार बैंकों की हिस्सेदारी 60 से 70 प्रतिशत के बीच रह सकती है।
यूपीआई पर पहले एमडीआर क्यों हटाया गया था?
भारत सरकार ने 2020 में डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने और मर्चेंट्स पर लागत का बोझ कम करने के लिए यूपीआई पर एमडीआर समाप्त किया था। अब इसे पुनः लागू करने का प्रस्ताव भुगतान इकोसिस्टम की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आया है।
राष्ट्र प्रेस
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