16 सितंबर 2026
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महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य संकट: शिवसेना (यूबीटी) ने नंदुरबार-गढ़चिरोली की दर्दनाक घटनाओं से घेरी सरकार

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महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य संकट: शिवसेना (यूबीटी) ने नंदुरबार-गढ़चिरोली की दर्दनाक घटनाओं से घेरी सरकार

सारांश

नंदुरबार में एक गर्भवती महिला को रात में 7 किमी झोली पर ढोया गया; गढ़चिरोली में माता-पिता को दो बच्चों के शव 15 किमी कंधे पर उठाने पड़े। शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' संपादकीय से फडणवीस सरकार के 'डिजिटल हेल्थ' के दावों पर तीखा प्रश्न दागा — जब बुनियाद ही नहीं, तो स्मार्ट क्या?

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 16 सितंबर 2026 को मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय के ज़रिये महाराष्ट्र सरकार पर आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की उपेक्षा का आरोप लगाया।
नंदुरबार के वेहगी-बारीपाड़ा में गर्भवती फुलवंती देवराम पदवी को रात में झोली पर 7 किमी ले जाया गया और प्रसव के बाद उसी रास्ते वापस लाया गया।
गढ़चिरोली में माता-पिता अपने दो मृत बच्चों के शव कंधे पर उठाकर 15 किमी पैदल चले — कोई एम्बुलेंस या शव वाहन नहीं मिला।
बॉम्बे उच्च न्यायालय पहले कह चुका है कि आदिवासी बाल कुपोषण 'सरकारी तंत्र की विफलता' है।
संपादकीय ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के 'डिजिटल और स्मार्ट हेल्थकेयर' के दावों को ज़मीनी हकीकत से परे बताया।

शिवसेना (यूबीटी) ने 16 सितंबर 2026 को पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित एक तीखे संपादकीय के ज़रिये महाराष्ट्र सरकार पर सीधा हमला बोला, यह आरोप लगाते हुए कि राज्य के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सड़कें, एम्बुलेंस सेवा और स्वास्थ्य सुविधाएँ आज भी नदारद हैं। संपादकीय में नंदुरबार और गढ़चिरोली जिलों की दो हालिया घटनाओं को प्रशासनिक विफलता के जीवंत प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया।

मुख्य घटनाक्रम: दो दर्दनाक वाकये

नंदुरबार जिले के वेहगी-बारीपाड़ा गाँव की गर्भवती महिला फुलवंती देवराम पदवी को सड़क और नदी पुल न होने के कारण रात के अँधेरे में बाँस-कपड़े की झोली (अस्थायी स्ट्रेचर) पर 7 किलोमीटर ढोया गया। पिंपलखुटा स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव के बाद उन्हें और उनके नवजात शिशु को उसी झोली पर 7 किलोमीटर और वापस ले जाना पड़ा।

दूसरी घटना गढ़चिरोली से सामने आई, जहाँ शोकाकुल माता-पिता को अपने दो मृत बच्चों के शव कंधों पर उठाकर 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा — क्योंकि स्थानीय प्रशासन ने न एम्बुलेंस भेजी, न शव वाहन उपलब्ध कराया।

संरचनात्मक समस्याएँ: सिर्फ दो घटनाएँ नहीं

'सामना' के संपादकीय में यह भी रेखांकित किया गया कि ये कोई इकलौती घटनाएँ नहीं हैं। आदिवासी बहुल जिलों में स्कूली बच्चों को रस्सी के पुलों से नदियाँ पार करनी पड़ती हैं। बिस्तरों की कमी के कारण छात्रावास की फ़र्श पर सोने वाली युवा छात्राओं की साँप के काटने से मौत हो चुकी है। मेलघाट जैसे क्षेत्रों में बाल कुपोषण से मौतों का सिलसिला अनवरत जारी है।

गौरतलब है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय पहले यह कह चुका है कि 'आदिवासियों में बाल कुपोषण कोई अलग-थलग समस्या नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की विफलता है।' ठाकरे खेमे ने इस न्यायिक टिप्पणी का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि राज्य प्रशासन 'खतरनाक रूप से सुस्त और न्यायिक चेतावनियों के प्रति अनुत्तरदायी' बना हुआ है।

सरकार पर निशाना: 'स्मार्ट हेल्थ' से पहले बुनियाद ठीक करो

संपादकीय में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के 'स्मार्ट' और 'डिजिटल' स्वास्थ्य सेवाओं के दावों पर सीधा प्रहार किया गया। इसमें कहा गया, 'डिजिटल और स्मार्ट स्वास्थ्य सेवा का ढोल उड़ाने से पहले, राज्य सरकार को सबसे पहले आदिवासी समुदायों के दैनिक संघर्षों को रोकना होगा, बुनियादी सड़कें बनानी होंगी और आपातकालीन परिवहन सुनिश्चित करना होगा।'

यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र सरकार विकास के तमाम आँकड़े पेश कर रही है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये आँकड़े राज्य के हाशिये पर खड़े आदिवासी ज़िलों की ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खाते।

आम जनता पर असर

महाराष्ट्र में आदिवासी आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 9% है और मुख्यतः नंदुरबार, गढ़चिरोली, पालघर, अमरावती और नासिक जिलों में निवास करती है। इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढाँचे की कमज़ोरी का सबसे भारी बोझ गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं और बच्चों पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बुनियादी सड़क संपर्क के अभाव में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएँ कागज़ पर ही रहती हैं — चाहे सरकार कितने भी डिजिटल पोर्टल क्यों न लॉन्च कर दे। आगे देखें तो यह मुद्दा विधानसभा सत्र में भी गूँजने की संभावना है, क्योंकि विपक्षी दलों ने आदिवासी ज़िलों में तत्काल बुनियादी ढाँचे की माँग तेज़ की है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर शांत हो जाता है। असली सवाल यह है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय की सख्त चेतावनियों के बाद भी राज्य ने इन ज़िलों में आपातकालीन परिवहन के लिए कोई बाध्यकारी समयसीमा क्यों नहीं तय की। 'डिजिटल हेल्थ' के नारे और ज़मीन पर झोली से प्रसव — यह अंतर महज़ बजट आवंटन की विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकता की कमी को दर्शाता है। विपक्ष का यह हमला तथ्यों पर टिका है, लेकिन इस मुद्दे पर विपक्ष की अपनी सत्ता के दौरान का रिकॉर्ड भी पारदर्शिता की माँग करता है।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नंदुरबार में गर्भवती महिला को झोली पर क्यों ले जाया गया?
नंदुरबार के वेहगी-बारीपाड़ा गाँव में सड़कें और नदी पुल नहीं हैं, इसलिए गर्भवती फुलवंती देवराम पदवी को रात में बाँस-कपड़े की अस्थायी झोली पर 7 किलोमीटर ढोकर पिंपलखुटा स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया गया। प्रसव के बाद उन्हें और नवजात को उसी झोली पर 7 किलोमीटर वापस लाया गया।
गढ़चिरोली में माता-पिता को बच्चों के शव कंधे पर क्यों उठाने पड़े?
गढ़चिरोली के सुदूर क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन ने कोई एम्बुलेंस या शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया, जिससे शोकाकुल माता-पिता को अपने दो मृत बच्चों के शव कंधों पर उठाकर 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
शिवसेना (यूबीटी) ने महाराष्ट्र सरकार पर क्या आरोप लगाए हैं?
'सामना' संपादकीय के ज़रिये शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि सरकार 'तेज़ विकास' का ढोल पीटती है, लेकिन नंदुरबार और गढ़चिरोली जैसे आदिवासी ज़िलों में बुनियादी सड़कें, एम्बुलेंस, स्वास्थ्य कर्मी और दवाएँ आज भी उपलब्ध नहीं हैं। पार्टी ने मुख्यमंत्री फडणवीस के 'डिजिटल हेल्थ' के दावों को ज़मीनी हकीकत से परे बताया।
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र में आदिवासी कुपोषण पर क्या कहा था?
बॉम्बे उच्च न्यायालय पहले यह स्पष्ट कर चुका है कि आदिवासियों में बाल कुपोषण कोई अलग-थलग समस्या नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की विफलता है। शिवसेना (यूबीटी) ने इसी न्यायिक टिप्पणी का हवाला देते हुए राज्य प्रशासन पर न्यायिक चेतावनियों के प्रति अनुत्तरदायी होने का आरोप लगाया।
महाराष्ट्र के किन आदिवासी ज़िलों में यह समस्या सबसे गंभीर है?
संपादकीय में नंदुरबार, गढ़चिरोली और मेलघाट (अमरावती) को विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इन क्षेत्रों में सड़क संपर्क, एम्बुलेंस, शव वाहन, स्वास्थ्य कर्मियों और दवाओं की गंभीर कमी के साथ-साथ स्कूली बच्चों को रस्सी के पुलों से नदियाँ पार करने और छात्रावासों में साँप के काटने से मौत जैसी घटनाएँ भी दर्ज हैं।
राष्ट्र प्रेस
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