12 अगस्त 2026
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गढ़चिरोली आश्रम स्कूल में सांप के काटने से 3 छात्राओं की मौत, शिवसेना (यूबीटी) ने आदिवासी इलाके में व्यवस्था की विफलता पर उठाए सवाल

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गढ़चिरोली आश्रम स्कूल में सांप के काटने से 3 छात्राओं की मौत, शिवसेना (यूबीटी) ने आदिवासी इलाके में व्यवस्था की विफलता पर उठाए सवाल

सारांश

विश्व के मूल निवासियों के दिवस पर गढ़चिरोली के एक आश्रम स्कूल में सांप काटने से 3 छात्राओं की मौत — यह महज़ एक हादसा नहीं, बल्कि जर्जर बुनियादी ढाँचे, खनन-जनित वन्यजीव संकट और आदिवासी इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं के पूर्ण अभाव की परिणति है।

मुख्य बातें

गढ़चिरोली के जपतलाई आदिवासी आश्रम स्कूल में 12 अगस्त 2026 को सांप काटने से 6 छात्राएँ प्रभावित हुईं, 3 की मौत हुई और 2 की हालत गंभीर है।
घटना विश्व के मूल निवासियों के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर घटी, जो आदिवासी अधिकारों के लिए समर्पित दिन है।
शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' संपादकीय में राज्य प्रशासन पर आदिवासियों की उपेक्षा और खनन उद्यमियों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया।
संपादकीय के अनुसार, खनन गतिविधियों से वन्यजीवों के आवास नष्ट होने से तेंदुए और सांप स्कूल परिसरों में घुस रहे हैं।
क्षेत्र में एम्बुलेंस सेवाओं का अभाव और जर्जर आश्रम स्कूलों की स्थिति को त्रासदी का मुख्य कारण बताया गया।
कथित तौर पर खनन ट्रकों से 1,500 से अधिक निवासियों की मौत का आरोप भी संपादकीय में लगाया गया।

महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले के धनोरा तालुका स्थित जपतलाई आदिवासी आवासीय स्कूल (आश्रम स्कूल) में 12 अगस्त 2026 को जहरीले सांपों के काटने से 6 छात्राएँ घायल हुईं, जिनमें से 3 की मौके पर ही मौत हो गई और 2 की हालत गंभीर बनी हुई है। यह दुखद घटना विश्व के मूल निवासियों के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर घटी, जो आदिवासी अधिकारों की चर्चा के लिए समर्पित दिन है।

घटनाक्रम और पार्टी की प्रतिक्रिया

शिवसेना (यूबीटी) ने बुधवार को पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में इस त्रासदी को आदिवासी बच्चों के प्रतिदिन के खतरनाक हालातों का प्रमाण बताया। संपादकीय में कहा गया कि क्षेत्र में नक्सली गतिविधियाँ भले ही कम हुई हों, परंतु आदिवासियों के जीवन पर मँडराता खतरा जस का तस बना हुआ है।

यह ऐसे समय में आया है जब गढ़चिरोली में खनन और औद्योगिक विस्तार को लेकर आदिवासी समुदायों और राज्य प्रशासन के बीच तनाव पहले से चरम पर है। गौरतलब है कि यह इलाका देश के सर्वाधिक संवेदनशील आदिवासी क्षेत्रों में गिना जाता है।

आश्रम स्कूलों की जर्जर स्थिति

सामना के संपादकीय के अनुसार, आदिवासी आश्रम स्कूलों में गंभीर संरचनात्मक दरारें, खराब स्वच्छता, चिकित्सा सुविधाओं की कमी और बुनियादी फर्नीचर का अभाव है। इन परिस्थितियों के चलते बच्चों को नंगे फर्श पर सोने पर मजबूर होना पड़ता है, जिससे वन्यजीवों के प्रवेश का खतरा और बढ़ जाता है।

संपादकीय में यह भी आरोप लगाया गया कि बड़े पैमाने पर खनन कार्यों ने स्थानीय वन्यजीवों — विशेषकर तेंदुओं और सांपों — के प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर दिया है, जिससे ये जानवर रिहायशी इलाकों और स्कूल परिसरों में घुसने लगे हैं।

खनन और विस्थापन के आरोप

सामना के संपादकीय में राज्य प्रशासन पर यह आरोप लगाया गया कि वह कॉरपोरेट संस्थाओं और बाहरी खनन उद्यमियों को प्राथमिकता देने के लिए आदिवासी आबादी को सुनियोजित रूप से विस्थापित कर रहा है। संपादकीय के अनुसार, कथित तौर पर तेज रफ्तार खनन ट्रकों से 1,500 से अधिक स्थानीय निवासी मारे जा चुके हैं, जिसके बाद अधिकारियों द्वारा दुर्घटना स्थलों की त्वरित सफाई की जाती है।

संपादकीय में यह भी दावा किया गया कि औद्योगिक कचरा आदिवासी घरों में पके हुए भोजन पर जमा होता है, जिससे परिवारों को प्रदूषित पानी और दूषित भोजन मिलता है। गढ़चिरोली को पर्यावरण के अनुकूल 'स्टील हब' बनाने के दावों को खारिज करते हुए कहा गया कि औद्योगिक गतिविधियों ने पर्यावरण को बुरी तरह प्रदूषित किया है।

चिकित्सा ढाँचे की विफलता

संपादकीय में गढ़चिरोली में चिकित्सा बुनियादी ढाँचे की भारी कमी को रेखांकित किया गया। आपातकालीन परिवहन और सरकारी एम्बुलेंस सेवाओं के अभाव में, गंभीर रूप से बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को कपड़े से बनी कामचलाऊ स्ट्रेचर पर लंबी दूरी तक ले जाया जाता है। संपादकीय के अनुसार, शोक संतप्त माता-पिता के पास अपने बच्चों के शवों को कंधों पर उठाकर ले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

राजनीतिक संदर्भ और आगे की राह

शिवसेना (यूबीटी) के संपादकीय ने यह तर्क दिया कि इस इलाके में नक्सलवाद-विरोधी अभियान स्थानीय लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए नहीं, बल्कि व्यावसायिक औद्योगिक उपक्रमों की सुरक्षा और मुनाफे को सुनिश्चित करने के लिए चलाया गया। विरोध करने वाले निवासियों को कथित तौर पर नक्सली या देशद्रोही करार देकर जेल भेजने के आरोप भी लगाए गए।

इस घटना के बाद आदिवासी क्षेत्रों में आश्रम स्कूलों की सुरक्षा, चिकित्सा सुविधाओं और खनन-प्रभावित समुदायों के अधिकारों पर व्यापक राजनीतिक बहस छिड़ने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर व्यवस्थागत बदलाव नहीं आया। असली सवाल यह है कि जब खनन परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी मिलती है, तो प्रभावित समुदायों के लिए पुनर्वास और स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे की बाध्यता क्यों कागजों तक सिमटी रह जाती है। शिवसेना (यूबीटी) का यह संपादकीय राजनीतिक रूप से प्रेरित हो सकता है, लेकिन इसमें उठाए गए सवाल — एम्बुलेंस का अभाव, जर्जर छात्रावास, वन्यजीव संघर्ष — सत्यापन योग्य और नीतिगत जवाबदेही की माँग करते हैं।
RashtraPress
12 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गढ़चिरोली आश्रम स्कूल में सांप काटने की घटना क्या है?
12 अगस्त 2026 को गढ़चिरोली जिले के धनोरा तालुका स्थित जपतलाई आदिवासी आश्रम स्कूल में जहरीले सांपों के काटने से 6 छात्राएँ प्रभावित हुईं। इनमें से 3 की मौके पर ही मौत हो गई और 2 की हालत गंभीर बताई जा रही है।
शिवसेना (यूबीटी) ने इस घटना पर क्या कहा?
शिवसेना (यूबीटी) ने पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में इस त्रासदी को आदिवासी बच्चों की रोज़मर्रा की खतरनाक परिस्थितियों का प्रमाण बताया। संपादकीय में राज्य प्रशासन पर आदिवासियों की उपेक्षा और खनन उद्यमियों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया गया।
गढ़चिरोली में खनन और आदिवासी विस्थापन का क्या संबंध है?
सामना के संपादकीय के अनुसार, बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियों ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट किए हैं, जिससे सांप और तेंदुए जैसे जानवर रिहायशी इलाकों और स्कूल परिसरों में आ रहे हैं। साथ ही, कथित तौर पर आदिवासी परिवारों को खनन परियोजनाओं के लिए विस्थापित किया जा रहा है।
गढ़चिरोली में चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति कैसी है?
संपादकीय के अनुसार, क्षेत्र में आपातकालीन परिवहन और सरकारी एम्बुलेंस सेवाओं का गंभीर अभाव है। गंभीर मरीजों को कपड़े की कामचलाऊ स्ट्रेचर पर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और परिजनों को शव कंधे पर उठाकर ले जाने की नौबत आती है।
आदिवासी आश्रम स्कूलों में बुनियादी ढाँचे की क्या स्थिति बताई गई है?
सामना के संपादकीय में कहा गया कि आश्रम स्कूलों में गंभीर संरचनात्मक दरारें, खराब स्वच्छता और बुनियादी फर्नीचर का अभाव है, जिससे बच्चे नंगे फर्श पर सोने को मजबूर हैं। इन्हीं कमियों के चलते वन्यजीवों का स्कूल परिसर में प्रवेश आसान हो जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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