महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में सड़क-एम्बुलेंस का संकट, शिवसेना (UBT) ने फडणवीस सरकार को घेरा
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 16 सितंबर को महाराष्ट्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि नंदुरबार और गढ़चिरोली जैसे सुदूर आदिवासी जिलों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवा और परिवहन अवसंरचना पूरी तरह चरमराई हुई है। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित एक संपादकीय में प्रशासन पर 'तेज़ विकास' के खोखले दावे करते हुए आदिवासी समुदायों की घोर उपेक्षा करने का आरोप लगाया गया।
मानवीय त्रासदी की दो भयावह घटनाएँ
नंदुरबार जिले के वेहगी-बारीपाड़ा गाँव में गर्भवती महिला फुलवंती देवराम पदवी को देर रात बाँस और कपड़े से बनी अस्थायी झोली (स्ट्रेचर) पर सात किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी, क्योंकि इलाके में कोई सड़क या नदी पुल मौजूद नहीं था। पिंपलखुटा स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव के बाद उन्हें और उनके नवजात शिशु को उसी झोली पर सात किलोमीटर वापस ले जाया गया।
दूसरी घटना गढ़चिरोली जिले की है, जहाँ शोकाकुल माता-पिता को अपने दो मृत बच्चों के शव कंधों पर उठाकर 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, क्योंकि स्थानीय प्रशासन ने न एम्बुलेंस उपलब्ध कराई और न शव वाहन। संपादकीय के अनुसार, ये घटनाएँ प्रशासनिक विफलता के मानवीय मूल्य को रेखांकित करती हैं।
संरचनात्मक समस्याओं की लंबी फेहरिस्त
'सामना' के संपादकीय में आदिवासी जिलों की कई दीर्घकालिक समस्याओं का उल्लेख किया गया। इनमें स्कूली बच्चों का रस्सी के पुलों से नदियाँ पार करना, छात्रावासों में बिस्तर न होने के कारण फर्श पर सोने वाली छात्राओं की सर्पदंश से मौत, और मेलघाट जैसे क्षेत्रों में कुपोषण से बाल मृत्यु की लगातार घटनाएँ शामिल हैं।
संपादकीय में कहा गया, 'महाराष्ट्र के शासक दिन-रात सुधारों का ढोल पीटते रहते हैं, फिर भी यह प्रगति राज्य के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाई है।'
बॉम्बे उच्च न्यायालय की फटकार का संदर्भ
ठाकरे खेमे ने बॉम्बे उच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का हवाला दिया जिसमें न्यायालय ने कहा था कि 'आदिवासियों में बाल कुपोषण एक अलग-थलग समस्या नहीं है, बल्कि सरकारी तंत्र की विफलता है।' संपादकीय के अनुसार, इस न्यायिक चेतावनी के बावजूद राज्य प्रशासन 'खतरनाक रूप से सुस्त और अनुत्तरदायी' बना हुआ है।
गौरतलब है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने आदिवासी कुपोषण के मामले में पहले भी राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर बदलाव कथित तौर पर सीमित ही रहा है।
मुख्यमंत्री फडणवीस के 'डिजिटल स्वास्थ्य' दावों पर निशाना
संपादकीय ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा 'स्मार्ट' और 'डिजिटल' स्वास्थ्य सेवाओं की शुरुआत के हालिया दावों पर सीधा प्रहार किया। इसमें कहा गया, 'डिजिटल और स्मार्ट स्वास्थ्य सेवा का ढोल उड़ाने से पहले, राज्य सरकार को सबसे पहले आदिवासी समुदायों के दैनिक संघर्षों को रोकना होगा, बुनियादी सड़कें बनानी होंगी और आपातकालीन परिवहन सुनिश्चित करना होगा।'
यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र सरकार अपने डिजिटल अवसंरचना निवेश को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोर रही है, जबकि आलोचकों का कहना है कि राज्य के हाशिये पर मौजूद आदिवासी समुदाय अभी भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
आगे क्या होगा
शिवसेना (UBT) की इस आलोचना के बाद राज्य सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विपक्ष की माँग है कि नंदुरबार और गढ़चिरोली जैसे जिलों में तत्काल आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा, सड़क निर्माण और स्वास्थ्य कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए। आदिवासी अधिकार संगठनों ने भी इन घटनाओं की स्वतंत्र जाँच की माँग की है।