महाराष्ट्र आदिवासी स्कूलों में 2 साल में 584 छात्रों की मौत, सीजेपी ने छेड़ा 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र सरकार द्वारा आदिवासी आवासीय स्कूलों में पिछले दो वर्षों में 584 छात्रों की मौत स्वीकार किए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। नागपुर में बुधवार, 16 सितंबर 2026 को 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) ने 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान की औपचारिक शुरुआत की, जो इन मौतों के लिए सरकारी जवाबदेही सुनिश्चित करने की माँग करता है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, इन दो वर्षों में औसतन प्रतिदिन एक बच्चे की जान गई।
अभियान की शुरुआत और नेतृत्व
सीजेपी के राष्ट्रीय संयोजक एवं संस्थापक अभिजीत दिपके ने नागपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस अभियान की घोषणा की। उनके साथ राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे और संयुक्त सचिव अक्षय शिंदे भी उपस्थित रहे। दिपके ने आवासीय स्कूलों में लगातार हो रही आदिवासी छात्रों की मौतों पर सरकार से सीधे जवाब माँगे।
गढ़चिरौली कांड और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का नोटिस
यह अभियान विशेष रूप से उस घटना के बाद महत्वपूर्ण हो गया है जब अगस्त 2026 में गढ़चिरौली के एक हॉस्टल में तीन आदिवासी लड़कियों की सर्पदंश से मृत्यु हो गई। बताया गया कि खाट न होने के कारण उन्हें जमीन पर सोना पड़ा था और एक ही कमरे में 79 लड़कियाँ रह रही थीं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले में नोटिस जारी किया है।
दिपके के तीखे सवाल: 'बकरी या इंसान?'
प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिपके ने कहा, 'हमारे आदिवासी और वंचित समुदायों की लगातार अनदेखी हमारे देश की अंतरात्मा पर एक गहरा दाग है।' उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी कोई त्रासदी होती है, सरकार ₹2 लाख के चेक या पशु-धन देकर मानवीय क्षति को नज़रअंदाज़ करती है। उन्होंने पूछा कि किसी मंत्री के परिजन को ऐसा मुआवज़ा स्वीकार्य होता? उन्होंने बालाघाट में 30 से अधिक बच्चों की मौत का भी ज़िक्र किया और कहा कि ये बच्चे दूषित पानी पीने और रोकी जा सकने वाली फूड पॉइजनिंग से मर रहे हैं, जबकि संविधान उन्हें समान अधिकार देता है।
संसदीय समिति के निष्कर्ष और योजनाओं की विफलता
सीजेपी ने रेखांकित किया कि ये मौतें एकल घटनाएँ नहीं, बल्कि एक स्थापित पैटर्न हैं। संसद की एक स्थायी समिति के निष्कर्षों के अनुसार, बीस वर्षों में आश्रम-स्कूल योजना केवल 14 राज्यों तक पहुँच पाई है। नई एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल (EMRS) योजना के तहत मंजूर 720 स्कूलों में से केवल 477 ही संचालित हो रहे हैं। पिछले वर्ष मंत्रालय ने अपने मंजूर EMRS बजट का मात्र तीन-चौथाई हिस्सा ही खर्च किया, जबकि हज़ारों शिक्षण पद रिक्त हैं।
सीजेपी की माँगें और आगे की राह
पार्टी ने माँग की है कि तीन महीनों के भीतर देश के प्रत्येक आदिवासी आवासीय स्कूल का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए, परिणाम सार्वजनिक किए जाएँ और पिछले दस वर्षों में हुई मौतों की राज्य-वार जानकारी जारी की जाए। साथ ही मंजूर बनाम संचालित स्कूलों का सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाने की माँग भी रखी गई है। यह अभियान आने वाले हफ्तों में राज्यभर में विस्तार पाने की संभावना है।