एमएसएमई के लिए NPA मानदंड बदले जाएं, 90 दिन की एकसमान सीमा अनुचित: CEA नागेश्वरन
सारांश
मुख्य बातें
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने 9 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) वर्गीकरण के मानदंडों की फिर से समीक्षा करनी चाहिए। उनका तर्क है कि विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले उद्यमों की नकदी प्रवाह संरचना एकसमान नहीं होती, इसलिए सभी के लिए 90 दिनों की एक ही समयसीमा तर्कसंगत नहीं है।
मुख्य घटनाक्रम
नागेश्वरन ने 'सा-धन' के राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए कहा, 'जिस समय आपको एसएमए (स्पेशल मेंशन अकाउंट) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, आप लगभग वास्तविक रूप से — भले ही कानूनी रूप से नहीं — पहले ही NPA बन जाते हैं। मुझे लगता है कि इसमें बदलाव की ज़रूरत है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि एकसमान मानक अपनाने के बजाय कारोबारी प्रथाओं और नकदी प्रवाह के पैटर्न के अनुसार अलग-अलग मानदंड विकसित किए जाने चाहिए।
यह ऐसे समय में आया है जब एमएसएमई क्षेत्र में ऋण तनाव को लेकर बहस तेज़ है और सूक्ष्म वित्त संस्थाओं पर अत्यधिक कर्ज़ देने के आरोप भी सामने आ रहे हैं।
मौजूदा NPA ढाँचा और उसकी सीमाएँ
वर्तमान में बैंक भुगतान देरी के आधार पर ऋण खातों को तीन श्रेणियों में रखते हैं: 0 से 30 दिन की देरी पर SMA-0, 31 से 60 दिन पर SMA-1, और 61 से 90 दिन पर SMA-2। 90 दिन से अधिक की देरी होने पर खाता औपचारिक रूप से NPA घोषित कर दिया जाता है।
नागेश्वरन का कहना है कि SMA वर्गीकरण के साथ ही कर्जदार को गंभीर व्यावहारिक परिणाम झेलने पड़ते हैं — नई ऋण सुविधा बंद हो जाती है, साख प्रभावित होती है, और कारोबार संकट में आ जाता है — जबकि कानूनी रूप से खाता तब तक NPA नहीं होता जब तक 90 दिन पूरे न हो जाएं। यह विरोधाभास एमएसएमई के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह है।
क्षेत्र-विशिष्ट नकदी चक्र की दलील
CEA ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत में एमएसएमई खेती, कपड़ा, इंजीनियरिंग, खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं। प्रत्येक क्षेत्र की कार्यशील पूंजी का चक्र अलग होता है — कुछ उद्योगों में भुगतान प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से 90 दिनों से अधिक की होती है। ऐसे में एकसमान समयसीमा का अनुचित दबाव कारोबार को वास्तविक संकट की स्थिति में पहुँचा सकता है, भले ही उद्यम मौलिक रूप से व्यवहार्य हो।
गौरतलब है कि एमएसएमई भारत की GDP में लगभग 30% का योगदान देते हैं और देश में 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार देते हैं। इस क्षेत्र के लिए ऋण नीति में किसी भी बदलाव का असर व्यापक होगा।
सूक्ष्म वित्त पर सावधानी की सलाह
नागेश्वरन ने यह भी कहा कि सूक्ष्म वित्त क्षेत्र को ज़रूरत से अधिक कर्ज़ लेने से बचना चाहिए और अपने कारोबार के वित्तपोषण के लिए आंतरिक बचत पर अधिक निर्भर रहना चाहिए। यह टिप्पणी उस चिंता को रेखांकित करती है कि अत्यधिक ऋण-निर्भरता खुद एमएसएमई की वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
आगे क्या
CEA की यह टिप्पणी RBI नीति-निर्माताओं और बैंकिंग नियामकों के लिए एक स्पष्ट संकेत है। हालाँकि अभी तक RBI की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि एमएसएमई के लिए क्षेत्र-आधारित NPA मानदंड लागू करने में ऋण-जोखिम प्रबंधन और डेटा उपलब्धता एक बड़ी चुनौती होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी RBI मौद्रिक नीति समिति की बैठकों में यह मुद्दा चर्चा में आ सकता है।