रुपये की गिरावट लंबी अवधि के निवेशकों के लिए सुनहरा मौका: CEA नागेश्वरन की बड़ी बात
सारांश
Key Takeaways
- CEA वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि रुपया 'अंडरवैल्यूड' है और लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह सुनहरा मौका है।
- रुपया 24 अप्रैल 2026 को 24 पैसे कमजोर होकर 84.25 प्रति डॉलर पर आया — लगातार पांचवीं गिरावट।
- ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है, जो रुपये पर दबाव का प्रमुख कारण है।
- FPI आउटफ्लो अप्रैल 2026 में ही पिछले साल के रिकॉर्ड 18.79 अरब डॉलर को पार कर गया।
- RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने चालू वित्त वर्ष में भारत की GDP 6.9%25 रहने का अनुमान जताया।
- 2026 में रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल हो गया है।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल 2026 — भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि फिलहाल दबाव में चल रहा भारतीय रुपया 'मौलिक रूप से अंडरवैल्यूड' है और यह स्थिति लंबी अवधि के निवेशकों के लिए एक बेहतरीन खरीदारी का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने यह बयान ऐसे समय में दिया जब रुपया 84.25 प्रति डॉलर तक लुढ़क चुका है और 2026 में एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल हो गया है।
नागेश्वरन का निवेशकों को संदेश
ब्लूमबर्ग को दिए एक साक्षात्कार में CEA नागेश्वरन ने स्पष्ट किया कि रुपये का मौजूदा स्तर उन निवेशकों के लिए आदर्श प्रवेश बिंदु है जो भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता पर भरोसा रखते हैं। उनका कहना था कि अल्पकालिक दबाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है।
उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल के बीच धैर्य सबसे जरूरी है, क्योंकि आर्थिक स्थिरता लौटने में कुछ समय लग सकता है। यह बयान उस वक्त और महत्वपूर्ण हो जाता है जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से बड़े पैमाने पर पूंजी निकाल रहे हैं।
रुपये पर दबाव के प्रमुख कारण
शुक्रवार, 24 अप्रैल को रुपया लगातार पांचवें कारोबारी दिन कमजोर हुआ और शुरुआती कारोबार में 24 पैसे की गिरावट के साथ 84.25 रुपये प्रति डॉलर पर आ गया। इस गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं।
सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है, जिसकी वजह पश्चिम एशिया में जारी तनाव है। इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है और मुद्रास्फीति की आशंका गहरी हो गई है।
दूसरी बड़ी वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भारी निकासी है। अप्रैल 2026 में ही FPI आउटफ्लो पिछले साल के रिकॉर्ड 18.79 अरब डॉलर को पार कर चुका है, जो भारतीय शेयर बाजार पर सीधा दबाव डाल रहा है।
भारत की तेल निर्भरता — एक संरचनात्मक कमजोरी
विश्लेषकों का कहना है कि भारत अपनी कुल तेल जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। इस कारण जब भी वैश्विक तेल कीमतें बढ़ती हैं, रुपये पर दबाव अनुपातहीन रूप से बढ़ जाता है। यह एक संरचनात्मक कमजोरी है जो हर वैश्विक संकट में उजागर होती है।
इस महीने की शुरुआत में अमेरिका-भारत स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम के एक कार्यक्रम में CEA नागेश्वरन ने बताया था कि मौजूदा वैश्विक संघर्ष का असर चार प्रमुख माध्यमों से पड़ सकता है — ऊर्जा की ऊंची कीमतें, कच्चे माल की आपूर्ति में बाधा, लॉजिस्टिक्स और बीमा लागत में वृद्धि, और प्रवासी भारतीयों के रेमिटेंस में कमी।
आरबीआई और सरकार का रुख
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में कहा कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की GDP विकास दर 6.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। हालांकि, कुछ स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों ने वैश्विक अनिश्चितता के चलते अपने अनुमान नीचे किए हैं।
नीति-निर्माताओं का समग्र रुख सतर्क लेकिन सकारात्मक है। सरकार का मानना है कि भारत की घरेलू खपत, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विनिर्माण क्षेत्र में हो रहे सुधार दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करेंगे।
आम निवेशकों और अर्थव्यवस्था पर असर
रुपये की कमजोरी का सबसे सीधा असर आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है — खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल और दवाइयां महंगी हो सकती हैं। वहीं, आईटी और निर्यात क्षेत्र के लिए यह स्थिति फायदेमंद है क्योंकि उन्हें डॉलर में आय होती है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि जो निवेशक डॉलर-आधारित संपत्तियों या भारतीय इक्विटी में दीर्घकालिक दांव लगाना चाहते हैं, उनके लिए मौजूदा स्तर ऐतिहासिक रूप से आकर्षक हो सकता है — बशर्ते वे अल्पकालिक उतार-चढ़ाव सहन करने में सक्षम हों।
आने वाले हफ्तों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति, वैश्विक तेल बाजार की दिशा और FPI निवेश प्रवाह रुपये की चाल तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।