मोदी के 25 साल: इंडस्ट्री ने सराहा, IMC अध्यक्ष बोले — 'करिश्माई नेतृत्व ने दी स्थिरता'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सरकार के प्रमुख के रूप में — पहले गुजरात के मुख्यमंत्री, फिर प्रधानमंत्री — 25 वर्ष पूरे होने पर 7 अक्टूबर 2026 को भारतीय उद्योग जगत ने उनके नेतृत्व की सराहना की और कहा कि उन्होंने देश की आर्थिक वृद्धि को गति देने में निर्णायक भूमिका निभाई है। उद्योग विशेषज्ञों ने इस मौके पर आरबीआई की रेपो रेट नीति पर भी अपनी राय रखी।
उद्योग जगत की प्रतिक्रिया
आईएमसी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष प्रोफेसर महेंद्र चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी एक करिश्माई नेता हैं। उन्होंने कहा, 'जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो उन्होंने वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत की, जिसने राज्य में निवेश आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने गिफ्ट सिटी की परिकल्पना को भी साकार किया।'
चौहान ने आगे कहा कि केंद्र में प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने देश की आर्थिक वृद्धि को नई रफ्तार दी है और वैश्विक मंच पर भारत की साख को मज़बूत किया है। उन्होंने कहा, 'जब भी मैं विदेश जाता हूँ, तो यह बात खुद महसूस होती है।'
चौहान के अनुसार, प्रधानमंत्री पद पर मोदी के लंबे कार्यकाल ने देश को नीतिगत स्थिरता प्रदान की है, जिससे कारोबारी जगत अधिक आत्मविश्वास के साथ निवेश संबंधी निर्णय ले पा रहा है।
रेपो रेट पर उद्योग की चिंता
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत करने पर प्रोफेसर चौहान ने कहा कि यह बढ़ोतरी बाज़ार की उम्मीदों के अनुरूप थी। हालाँकि, उन्होंने चेताया कि निकट भविष्य में दरों में कटौती की संभावना को नकारना कारोबारी लागत बढ़ा सकता है।
चौहान ने आरबीआई से अपील की कि आगे का कोई भी नीतिगत कदम ठोस आर्थिक आँकड़ों के आधार पर उठाया जाए। उन्होंने इस संदर्भ में याद दिलाया कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही है, सेवा क्षेत्र के निर्यात में तेज़ी आई है और विदेशी मुद्रा भंडार भी मज़बूत बना हुआ है।
एसबीआई रिसर्च का अनुमान
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के रिसर्च विभाग ने अपनी रिपोर्ट में संकेत दिया है कि आरबीआई दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 50 आधार अंक तक और बढ़ा सकता है, हालाँकि यह काफी हद तक वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि यदि वैश्विक हालात अस्थिर होते हैं, तो आरबीआई के लिए बेहतर होगा कि वह छोटी-छोटी बढ़ोतरी के बजाय एकमुश्त दर वृद्धि का विकल्प चुने।
विशेषज्ञ की राय
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष ने कहा कि 'दिसंबर तक रेपो रेट को 6 प्रतिशत तक ले जाना सबसे उपयुक्त विकल्प हो सकता है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सामने अब मुख्यतः दो ही विकल्प हैं — दरें बढ़ाना या उन्हें स्थिर रखना — और यह निर्णय बदलती वैश्विक परिस्थितियों पर आधारित होगा।
आगे की राह
मोदी के 25 वर्षीय सार्वजनिक प्रशासन के सफर को लेकर उद्योग जगत का यह सकारात्मक मूल्यांकन ऐसे समय में आया है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी अपेक्षाकृत मज़बूत बनी हुई है। आरबीआई की आगामी नीतिगत बैठकों में ब्याज दर का रुख स्पष्ट होने के साथ ही कारोबारी जगत की निवेश योजनाएँ भी आकार लेंगी।