आरबीआई ने कैपिटल मार्केट एक्सपोजर नियमों की समयसीमा 1 जुलाई तक बढ़ाई

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आरबीआई ने कैपिटल मार्केट एक्सपोजर नियमों की समयसीमा 1 जुलाई तक बढ़ाई

सारांश

आरबीआई ने कैपिटल मार्केट एक्सपोजर से जुड़े नए नियमों को लागू करने की समयसीमा को 1 जुलाई 2026 तक बढ़ा दिया है। यह निर्णय बैंकों और औद्योगिक संगठनों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर लिया गया है। जानें क्या हैं नए नियमों में बदलाव।

Key Takeaways

  • आरबीआई ने नियमों की समयसीमा बढ़ाई है।
  • नए नियम 1 जुलाई 2026 से लागू होंगे।
  • अधिग्रहण फाइनेंस में मर्जर और विलय को शामिल किया गया है।
  • बैंकों को नई प्रक्रियाओं के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।
  • कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरी को कुछ राहत दी गई है।

नई दिल्ली, 31 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कैपिटल मार्केट एक्सपोजर से संबंधित अपने संशोधित नियमों को लागू करने की समयसीमा 3 महीने बढ़ा दी है। अब ये नियम 1 जुलाई 2026 से लागू होंगे, जबकि पहले इन्हें 1 अप्रैल से लागू किया जाना था।

यह निर्णय बैंकों, कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरी (सीएमआई) और औद्योगिक संगठनों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर लिया गया है। इन संगठनों ने नए नियमों को लागू करने में ऑपरेशनल और समझ से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख किया था।

आरबीआई ने इन नियमों का प्रारूप 13 फरवरी 2026 को जारी किया था, जिसके बाद सार्वजनिक परामर्श भी संपन्न हुआ।

इन नए नियमों में अधिग्रहण वित्तपोषण, वित्तीय परिसंपत्तियों के खिलाफ लोन और सीएमआई को दिए जाने वाले क्रेडिट एक्सपोजर से संबंधित मामलों में कुछ स्पष्टता भी प्रदान की गई है।

नए नियमों के तहत अधिग्रहण फाइनेंस के दायरे में मर्जर और अमलगमेशन (विलय) को भी शामिल किया गया है, जिससे पहले की अस्पष्टता समाप्त हो गई है। हालांकि, यह फाइनेंस केवल उन्हीं मामलों में दिया जाएगा जहां किसी गैर-वित्तीय कंपनी पर नियंत्रण स्थापित करना उद्देश्य हो।

यदि लक्षित कंपनी एक होल्डिंग कंपनी है, तो बैंकों को सुनिश्चित करना होगा कि संभावित लाभ (सिनर्जी) उसकी सभी सब्सिडियरी कंपनियों में भी दिखाई दे, न कि केवल मुख्य कंपनी में।

नए नियमों के अनुसार कंपनियों को अब अधिग्रहण फाइनेंस भारतीय या विदेशी सहायक कंपनियों के माध्यम से लेने की अनुमति भी दी गई है।

इस बीच, रीफाइनेंसिंग के नियमों को सख्त किया गया है। बैंक अब अधिग्रहण लोन का रीफाइनेंस तभी कर सकेंगे जब डील पूरी हो जाए और कंपनी पर नियंत्रण स्थापित हो जाए। साथ ही, यह पैसा केवल पुराने अधिग्रहण लोन को चुकाने के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इसके अलावा, यदि अधिग्रहण फाइनेंस किसी सब्सिडियरी या स्पेशल पर्पस व्हीकल (एसपीवी) को दिया जाता है, तो अधिग्रहण करने वाली कंपनी की कॉर्पोरेट गारंटी आवश्यक होगी, जिससे बैंकों की सुरक्षा मजबूत होगी।

इस फैसले से बैंकों को अपने सिस्टम और प्रक्रियाओं को नए नियमों के अनुसार ढालने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा। साथ ही, नए नियमों में स्पष्टता आने से कानूनी विवाद और जोखिम भी कम होने की आशा है।

निवेश करने वाली कंपनियों के लिए यह ढांचा अधिग्रहण फाइनेंस के नए रास्ते खोलता है, लेकिन साथ ही नियंत्रण आधारित निवेश और सख्त रीफाइनेंसिंग नियमों के जरिए सीमाएं भी निर्धारित करता है।

कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरी के लिए आरबीआई ने कुछ राहत भी दी है। अब बैंक 100 प्रतिशत नकद या नकद-जैसे कोलैटरल के बदले प्रोपरायटरी ट्रेडिंग के लिए फंडिंग दे सकेंगे। साथ ही, बाजार निर्माण गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने वाली सिक्योरिटीज के खिलाफ फाइनेंसिंग पर लगी पाबंदियां भी हटा दी गई हैं।

Point of View

NationPress
02/04/2026

Frequently Asked Questions

आरबीआई के नए नियमों का उद्देश्य क्या है?
आरबीआई के नए नियमों का उद्देश्य कैपिटल मार्केट में बैंकों और अन्य संस्थाओं के लिए स्पष्टता और सुरक्षा बढ़ाना है।
क्या बैंकों को नए नियमों के तहत अधिग्रहण फाइनेंस की अनुमति होगी?
हाँ, बैंकों को नए नियमों के तहत अधिग्रहण फाइनेंस भारतीय या विदेशी सहायक कंपनियों के माध्यम से लेने की अनुमति दी गई है।
रीफाइनेंसिंग के नियमों में क्या बदलाव हुआ है?
रीफाइनेंसिंग के नियमों को सख्त किया गया है, और यह केवल तब संभव होगा जब डील पूरी हो जाए।
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