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सेबी का ऐतिहासिक फैसला: एफपीआई को एक ही दिन के ट्रेड में फंड नेटिंग की मंजूरी, लागत होगी कम

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सेबी का ऐतिहासिक फैसला: एफपीआई को एक ही दिन के ट्रेड में फंड नेटिंग की मंजूरी, लागत होगी कम

सारांश

सेबी ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को एक ही दिन के कैश मार्केट ट्रेड में फंड नेटिंग की अनुमति दी। यह सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक लागू होगी। इससे इंडेक्स रीबैलेंसिंग के दौरान लागत, पूंजी की आवश्यकता और विदेशी मुद्रा जोखिम में उल्लेखनीय कमी आएगी।

मुख्य बातें

सेबी ने 24 अप्रैल 2025 को एफपीआई को एक ही दिन के कैश मार्केट ट्रेड में फंड नेटिंग की अनुमति दी।
नई व्यवस्था से एफपीआई की परिचालन लागत, पूंजी की आवश्यकता और विदेशी मुद्रा जोखिम में कमी आएगी।
यह सुविधा केवल 'आउट्राइट ट्रांजैक्शन' पर लागू होगी; एक ही सिक्योरिटी में एक साथ खरीद-बिक्री पर नहीं।
शेयरों का सेटलमेंट पूर्ववत ग्रॉस बेसिस पर होगा; एसटीटी और स्टाम्प ड्यूटी में कोई बदलाव नहीं।
नई व्यवस्था 31 दिसंबर 2026 तक पूरी तरह लागू हो जाएगी।
यदि बिक्री राशि खरीद से अधिक है, तो अतिरिक्त धनराशि किसी अन्य खरीद में एडजस्ट नहीं की जा सकेगी।

मुंबई, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने शुक्रवार, 24 अप्रैल 2025 को एक महत्वपूर्ण नियामकीय निर्णय लेते हुए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को एक ही कारोबारी दिन के कैश मार्केट ट्रेड में फंड नेटिंग की अनुमति प्रदान कर दी है। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य विदेशी निवेशकों के लिए परिचालन प्रक्रिया को सरल बनाना, लागत घटाना और विदेशी मुद्रा जोखिम को कम करना है — खासतौर पर इंडेक्स रीबैलेंसिंग जैसे उच्च-कारोबार वाले दिनों में।

क्या है नई व्यवस्था?

नए नियम के अनुसार, एफपीआई अब उसी कारोबारी दिन शेयरों की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग उसी दिन की खरीद के लिए कर सकेंगे। सरल शब्दों में, अब हर लेनदेन को अलग-अलग सेटल करने की बाध्यता नहीं रहेगी — केवल नेट (शेष) राशि का भुगतान करना होगा।

पहले की व्यवस्था में एफपीआई को प्रत्येक ट्रेड का पूरा भुगतान अलग-अलग करना अनिवार्य था। इससे न केवल अधिक पूंजी की आवश्यकता होती थी, बल्कि लेनदेन लागत और विदेशी मुद्रा रूपांतरण में नुकसान भी उठाना पड़ता था।

किन परिस्थितियों में मिलेगी यह सुविधा?

सेबी ने स्पष्ट किया है कि यह सुविधा केवल 'आउट्राइट ट्रांजैक्शन' पर लागू होगी — अर्थात जब किसी एक सिक्योरिटी में केवल खरीद या केवल बिक्री की गई हो। यदि किसी एक ही सिक्योरिटी में उसी दिन एक साथ खरीद और बिक्री दोनों होती है, तो उस पर यह सुविधा लागू नहीं होगी और पुरानी ग्रॉस सेटलमेंट प्रक्रिया ही अपनाई जाएगी।

नियामक ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बिक्री की राशि खरीद से कम होती है, तो शेष अंतर का भुगतान एफपीआई को स्वयं करना होगा। इसके विपरीत, यदि बिक्री की राशि अधिक है, तो उस अतिरिक्त धनराशि का उपयोग किसी अन्य खरीद को एडजस्ट करने के लिए नहीं किया जा सकेगा।

शेयर सेटलमेंट और करों पर क्या होगा असर?

सेबी ने यह भी स्पष्ट किया कि फंड नेटिंग की अनुमति मिलने के बावजूद, शेयरों का सेटलमेंट पूर्ववत ग्रॉस बेसिस पर ही होता रहेगा। यानी प्रत्येक शेयर लेनदेन अलग-अलग सेटल किया जाएगा।

इसके अतिरिक्त, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) और स्टाम्प ड्यूटी जैसे करों पर कोई परिवर्तन नहीं होगा — ये पहले की भांति लागू रहेंगे।

बाजार की पुरानी मांग और व्यापक संदर्भ

बाजार सहभागियों और विदेशी निवेशक समूहों ने लंबे समय से इस समस्या को उठाया था। विशेष रूप से इंडेक्स रीबैलेंसिंग के दिनों में — जब एमएससीआई, एफटीएसई जैसे वैश्विक सूचकांकों में भारतीय शेयरों का भार बदलता है — एफपीआई को एक ही दिन में अरबों रुपये के लेनदेन करने पड़ते हैं। उस स्थिति में अलग-अलग ग्रॉस सेटलमेंट की बाध्यता से भारी पूंजी फंसती थी और लागत बढ़ती थी।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक निवेशकों के लिए अपने बाजार को अधिक सुलभ और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में लगातार कदम उठा रहा है। गौरतलब है कि हाल के वर्षों में सेबी ने एफपीआई पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाने, केवाईसी नियमों में छूट देने और रिपोर्टिंग बोझ घटाने जैसे कई सुधार किए हैं।

कब से लागू होगा नया नियम?

सेबी ने घोषणा की है कि यह नई व्यवस्था 31 दिसंबर 2026 तक पूरी तरह लागू कर दी जाएगी। इससे एफपीआई को अपनी आंतरिक प्रणालियों और कस्टोडियन बैंकों के साथ समन्वय करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।

यह कदम भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी निवेश को और अधिक आकर्षक बनाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। आने वाले महीनों में सेबी द्वारा इस संदर्भ में विस्तृत परिचालन दिशानिर्देश जारी किए जाने की संभावना है, जिसमें कस्टोडियन और क्लियरिंग कॉर्पोरेशन की भूमिका स्पष्ट की जाएगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं। जब वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता है और एफपीआई भारत से पूंजी निकालने की प्रवृत्ति दिखा रहे हैं, तब परिचालन लागत घटाना और प्रक्रिया सरल करना विदेशी निवेश को बनाए रखने की एक व्यावहारिक रणनीति है। विडंबना यह है कि भारतीय बाजार में एफपीआई की भागीदारी बढ़ाने के लिए नियामक जितनी तेजी से सुधार कर रहा है, उतनी ही तेजी से वैश्विक भू-राजनीतिक और व्यापारिक तनाव विदेशी पूंजी को अस्थिर बनाए हुए हैं। असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये सुधार दीर्घकालिक एफपीआई प्रवाह को स्थिर कर पाते हैं, या ये महज छोटी राहत बनकर रह जाते हैं।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सेबी ने एफपीआई को फंड नेटिंग की अनुमति क्यों दी?
सेबी ने एफपीआई को फंड नेटिंग की अनुमति इसलिए दी ताकि उनकी परिचालन लागत, पूंजी की आवश्यकता और विदेशी मुद्रा जोखिम कम हो सके। खासकर इंडेक्स रीबैलेंसिंग जैसे उच्च-कारोबार वाले दिनों में यह सुविधा बेहद उपयोगी होगी।
एफपीआई फंड नेटिंग का क्या मतलब है?
फंड नेटिंग का अर्थ है कि एफपीआई एक ही दिन की शेयर बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग उसी दिन की खरीद के लिए कर सकेंगे। उन्हें केवल शेष (नेट) राशि का ही भुगतान करना होगा, न कि हर लेनदेन का अलग-अलग पूरा भुगतान।
सेबी की नई फंड नेटिंग व्यवस्था कब से लागू होगी?
सेबी ने घोषणा की है कि यह नई व्यवस्था 31 दिसंबर 2026 तक पूरी तरह लागू कर दी जाएगी। इससे एफपीआई और उनके कस्टोडियन बैंकों को अपनी प्रणालियां अपडेट करने का पर्याप्त समय मिलेगा।
क्या शेयर सेटलमेंट और टैक्स पर भी कोई बदलाव होगा?
नहीं, शेयरों का सेटलमेंट पूर्ववत ग्रॉस बेसिस पर ही होगा। सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) और स्टाम्प ड्यूटी भी पहले की तरह ही लागू रहेंगे।
किन लेनदेन पर फंड नेटिंग की सुविधा लागू नहीं होगी?
यदि किसी एक ही सिक्योरिटी में उसी दिन एक साथ खरीद और बिक्री दोनों होती है, तो उस पर यह सुविधा लागू नहीं होगी। ऐसे लेनदेन पर पुरानी ग्रॉस सेटलमेंट प्रक्रिया ही अपनाई जाएगी।
राष्ट्र प्रेस
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