सेबी का ऐतिहासिक फैसला: एफपीआई को एक ही दिन के ट्रेड में फंड नेटिंग की मंजूरी, लागत होगी कम
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने शुक्रवार, 24 अप्रैल 2025 को एक महत्वपूर्ण नियामकीय निर्णय लेते हुए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को एक ही कारोबारी दिन के कैश मार्केट ट्रेड में फंड नेटिंग की अनुमति प्रदान कर दी है। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य विदेशी निवेशकों के लिए परिचालन प्रक्रिया को सरल बनाना, लागत घटाना और विदेशी मुद्रा जोखिम को कम करना है — खासतौर पर इंडेक्स रीबैलेंसिंग जैसे उच्च-कारोबार वाले दिनों में।
क्या है नई व्यवस्था?
नए नियम के अनुसार, एफपीआई अब उसी कारोबारी दिन शेयरों की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग उसी दिन की खरीद के लिए कर सकेंगे। सरल शब्दों में, अब हर लेनदेन को अलग-अलग सेटल करने की बाध्यता नहीं रहेगी — केवल नेट (शेष) राशि का भुगतान करना होगा।
पहले की व्यवस्था में एफपीआई को प्रत्येक ट्रेड का पूरा भुगतान अलग-अलग करना अनिवार्य था। इससे न केवल अधिक पूंजी की आवश्यकता होती थी, बल्कि लेनदेन लागत और विदेशी मुद्रा रूपांतरण में नुकसान भी उठाना पड़ता था।
किन परिस्थितियों में मिलेगी यह सुविधा?
सेबी ने स्पष्ट किया है कि यह सुविधा केवल 'आउट्राइट ट्रांजैक्शन' पर लागू होगी — अर्थात जब किसी एक सिक्योरिटी में केवल खरीद या केवल बिक्री की गई हो। यदि किसी एक ही सिक्योरिटी में उसी दिन एक साथ खरीद और बिक्री दोनों होती है, तो उस पर यह सुविधा लागू नहीं होगी और पुरानी ग्रॉस सेटलमेंट प्रक्रिया ही अपनाई जाएगी।
नियामक ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बिक्री की राशि खरीद से कम होती है, तो शेष अंतर का भुगतान एफपीआई को स्वयं करना होगा। इसके विपरीत, यदि बिक्री की राशि अधिक है, तो उस अतिरिक्त धनराशि का उपयोग किसी अन्य खरीद को एडजस्ट करने के लिए नहीं किया जा सकेगा।
शेयर सेटलमेंट और करों पर क्या होगा असर?
सेबी ने यह भी स्पष्ट किया कि फंड नेटिंग की अनुमति मिलने के बावजूद, शेयरों का सेटलमेंट पूर्ववत ग्रॉस बेसिस पर ही होता रहेगा। यानी प्रत्येक शेयर लेनदेन अलग-अलग सेटल किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) और स्टाम्प ड्यूटी जैसे करों पर कोई परिवर्तन नहीं होगा — ये पहले की भांति लागू रहेंगे।
बाजार की पुरानी मांग और व्यापक संदर्भ
बाजार सहभागियों और विदेशी निवेशक समूहों ने लंबे समय से इस समस्या को उठाया था। विशेष रूप से इंडेक्स रीबैलेंसिंग के दिनों में — जब एमएससीआई, एफटीएसई जैसे वैश्विक सूचकांकों में भारतीय शेयरों का भार बदलता है — एफपीआई को एक ही दिन में अरबों रुपये के लेनदेन करने पड़ते हैं। उस स्थिति में अलग-अलग ग्रॉस सेटलमेंट की बाध्यता से भारी पूंजी फंसती थी और लागत बढ़ती थी।
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक निवेशकों के लिए अपने बाजार को अधिक सुलभ और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में लगातार कदम उठा रहा है। गौरतलब है कि हाल के वर्षों में सेबी ने एफपीआई पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाने, केवाईसी नियमों में छूट देने और रिपोर्टिंग बोझ घटाने जैसे कई सुधार किए हैं।
कब से लागू होगा नया नियम?
सेबी ने घोषणा की है कि यह नई व्यवस्था 31 दिसंबर 2026 तक पूरी तरह लागू कर दी जाएगी। इससे एफपीआई को अपनी आंतरिक प्रणालियों और कस्टोडियन बैंकों के साथ समन्वय करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
यह कदम भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी निवेश को और अधिक आकर्षक बनाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। आने वाले महीनों में सेबी द्वारा इस संदर्भ में विस्तृत परिचालन दिशानिर्देश जारी किए जाने की संभावना है, जिसमें कस्टोडियन और क्लियरिंग कॉर्पोरेशन की भूमिका स्पष्ट की जाएगी।