सेबी का IPO और री-लिस्टिंग प्राइस डिस्कवरी में बड़ा बदलाव का प्रस्ताव, अपर सर्किट की समस्या होगी दूर
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी / SEBI) ने 21 मई 2026 को जारी एक परामर्श पत्र में IPO लिस्टिंग और री-लिस्टिंग के दौरान शेयरों की कीमत निर्धारण प्रक्रिया में व्यापक सुधारों का प्रस्ताव रखा है। नियामक का मानना है कि मौजूदा प्राइस डिस्कवरी सिस्टम कृत्रिम रूप से शेयर कीमतों को दबा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप ट्रेडिंग शुरू होते ही लगातार अपर सर्किट लग रहे हैं।
मौजूदा व्यवस्था में क्या है समस्या
सेबी के परामर्श पत्र के अनुसार, प्री-ओपन ऑक्शन सत्र में बड़ी संख्या में वास्तविक खरीद ऑर्डर रिजेक्ट हो रहे हैं, क्योंकि बोलियाँ एक्सचेंज द्वारा निर्धारित सीमा से बाहर होती हैं। नियामक ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक री-लिस्टेड शेयर में करीब 90 प्रतिशत खरीद ऑर्डर केवल इसलिए रिजेक्ट हो गए, क्योंकि बोली एक्सचेंज की तय सीमा से बाहर थी। इससे बाजार सही ओपनिंग प्राइस तय करने में विफल रहा।
प्रस्तावित बदलाव: स्वचालित प्राइस बैंड फ्लेक्सिंग
सेबी ने प्रस्ताव दिया है कि जब निवेशकों की मजबूत माँग दिखाई दे, तब प्राइस बैंड को स्वचालित रूप से और तेज़ी से बढ़ाया जाए, ताकि एक्सचेंजों को बार-बार मैन्युअल हस्तक्षेप न करना पड़े। परामर्श पत्र में कहा गया है, "डमी प्राइस बैंड को बढ़ाने का सिस्टम सभी एक्सचेंजों में एक जैसा होना चाहिए और जरूरत पड़ने पर प्राइस बैंड तुरंत बढ़ाया जाना चाहिए।"
सेबी के अनुसार, एक्सचेंजों को पहले से तय नियमों और अन्य एक्सचेंजों से परामर्श के आधार पर 10 प्रतिशत के गुणकों में डमी प्राइस बैंड को स्वचालित रूप से बढ़ाना चाहिए। यह व्यवस्था सुबह 9:35 बजे से 9:45 बजे तक के रैंडम क्लोजर पीरियड के दौरान भी लागू रहनी चाहिए।
री-लिस्टिंग के लिए नई वैल्यूएशन प्रक्रिया
सेबी ने री-लिस्टेड कंपनियों के शुरुआती शेयर मूल्य निर्धारण में भी आमूल बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत पुराने या कृत्रिम रूप से कम रेफरेंस प्राइस की बजाय हालिया बाजार कीमतों या स्वतंत्र वैल्यूएशन रिपोर्ट का उपयोग किया जाएगा। गौरतलब है कि री-लिस्टिंग के मामलों में पुराने रेफरेंस प्राइस के इस्तेमाल से वास्तविक बाजार मूल्य और सूचीबद्ध मूल्य के बीच बड़ी खाई बन जाती थी।
प्राइस डिस्कवरी की सफलता के लिए नया मानदंड
नियामक ने स्पष्ट किया है कि कॉल ऑक्शन सत्र को तभी सफल माना जाएगा, जब प्राइस डिस्कवरी कम से कम 5 अलग-अलग PAN आधारित खरीदारों और विक्रेताओं के ऑर्डर पर आधारित हो। यह प्रावधान बाजार में वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
SME IPO पर विशेष ध्यान
फिलहाल SME IPO के कॉल ऑक्शन सत्र में कोई प्राइस बैंड नहीं होता, लेकिन SME शेयरों में अधिक उतार-चढ़ाव को देखते हुए स्टॉक एक्सचेंजों ने 90 प्रतिशत से अधिक का प्राइस बैंड तय कर रखा है, जिसमें कोई फ्लेक्सिंग मानदंड नहीं है। सेबी के प्रस्तावित बदलाव इस असंगति को भी दूर करने की कोशिश करते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब SME सेगमेंट में IPO की संख्या और निवेशकों की भागीदारी दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं, तो IPO लिस्टिंग के दिन की अनिश्चितता काफी हद तक कम हो सकती है।