6 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

अनवर जलालपुरी: 1976 के लखनऊ मुशायरे ने बदली उर्दू शायर की तक़दीर, राष्ट्रपति की मौजूदगी में मिली पहचान

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
अनवर जलालपुरी: 1976 के लखनऊ मुशायरे ने बदली उर्दू शायर की तक़दीर, राष्ट्रपति की मौजूदगी में मिली पहचान

सारांश

एक साधारण कस्बे से निकले अनवर जलालपुरी के लिए 1976 का लखनऊ मुशायरा महज एक कार्यक्रम नहीं था — वह उनकी तक़दीर बदलने वाली रात थी। राष्ट्रपति की मौजूदगी में मिले उस एक मौके ने उन्हें उर्दू साहित्य के उस शायर में बदल दिया, जिसने आगे चलकर भगवद्गीता को उर्दू शायरी की ज़बान दी।

मुख्य बातें

अनवर जलालपुरी का जन्म 6 जुलाई 1947 को अंबेडकरनगर, उत्तर प्रदेश के जलालपुर कस्बे में हुआ था।
1976 के लखनऊ मुशायरे में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की उपस्थिति में पहली बार राष्ट्रीय मंच पर शायरी पेश की।
उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और रवींद्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' का उर्दू में काव्यानुवाद किया।
प्रमुख काव्य-संग्रहों में 'खारे पानी का सिलसिला' , 'खुशबू की रिश्तेदारी' और 'रोशनाई के सफीर' शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार के यश भारती पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित।
2 जनवरी 2018 को 70 वर्ष की आयु में निधन।

उर्दू शायर अनवर जलालपुरी के करियर का सबसे निर्णायक मोड़ 1976 में लखनऊ के एक ऐतिहासिक मुशायरे पर आया, जहाँ तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की उपस्थिति में उन्होंने पहली बार किसी बड़े राष्ट्रीय मंच पर अपनी शायरी पेश की। उस एक रात ने उन्हें क्षेत्रीय मंच-संचालक से देशभर में चर्चित शायर बना दिया।

साधारण शुरुआत, असाधारण सफर

6 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के जलालपुर कस्बे में जन्मे अनवर जलालपुरी का असली नाम अनवर अहमद था। एक साधारण परिवार में पले-बढ़े अनवर को बचपन से ही पढ़ने-लिखने का गहरा शौक था, भले ही संसाधन सीमित रहे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अपने जिले में ही पूरी की, फिर आजमगढ़ से पढ़ाई की और अंततः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।

मंच-संचालन से शायरी तक का सफर

उच्च शिक्षा के बाद उन्होंने साहित्य की दुनिया को अपना कार्यक्षेत्र चुना। शुरुआती दौर में वे छोटे-छोटे कार्यक्रमों में मंच-संचालन करते थे। उनकी मखमली आवाज़ और बोलने का अनोखा अंदाज़ श्रोताओं को बाँध लेता था। वे शायरों के मंच पर आने से पहले ऐसा माहौल तैयार करते थे कि पूरा कार्यक्रम जीवंत हो उठता था।

1976 का लखनऊ मुशायरा — करियर का टर्निंग पॉइंट

1976 में लखनऊ में आयोजित एक बड़े मुशायरे में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे। उस अवसर पर उनके उस्ताद ने उन पर विश्वास जताते हुए उन्हें इस विशाल मंच पर शायरी पढ़ने का मौका दिया — यह उनके जीवन का पहला बड़ा अवसर था। जैसे ही उन्होंने मंच संभाला, उनकी शायरी और प्रस्तुति ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस एक कार्यक्रम के बाद वे पूरे देश में एक उभरते हुए शायर के रूप में पहचाने जाने लगे।

साहित्यिक योगदान और उपलब्धियाँ

इस सफलता के बाद उनका साहित्यिक सफर तेज़ी से आगे बढ़ा। उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि रही श्रीमद्भगवद्गीता का उर्दू में काव्यानुवाद, जिसने इस धर्मग्रंथ को उर्दू पाठकों के लिए सुलभ बनाया। इसके अलावा उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की कालजयी रचना 'गीतांजलि' का भी उर्दू में अनुवाद किया। उनके काव्य-संग्रह 'खारे पानी का सिलसिला', 'खुशबू की रिश्तेदारी' और 'रोशनाई के सफीर' उर्दू साहित्य प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय रहे।

सम्मान और विरासत

उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित यश भारती पुरस्कार से सम्मानित किया। राष्ट्रीय स्तर पर उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें पद्मश्री से भी नवाज़ा गया। जीवन के अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते हुए 2 जनवरी 2018 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी काव्य-विरासत — विशेषकर भगवद्गीता और गीतांजलि के उर्दू काव्यानुवाद — उर्दू-हिंदी सांस्कृतिक सेतु के रूप में आज भी अमर है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो अंबेडकरनगर के एक साधारण कस्बे से निकला था। यह विडंबना ध्यान देने योग्य है कि उनके जैसे सेतु-निर्माता साहित्यकारों को मुख्यधारा मीडिया में उनके निधन के बाद ही व्यापक जगह मिलती है। उनकी विरासत यह भी याद दिलाती है कि भाषाई विभाजन की राजनीति के बीच, साहित्य ने हमेशा अपना रास्ता खुद बनाया है।
RashtraPress
6 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अनवर जलालपुरी कौन थे?
अनवर जलालपुरी एक प्रसिद्ध उर्दू शायर और साहित्यकार थे, जिनका जन्म 6 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के जलालपुर कस्बे में हुआ था। उन्होंने भगवद्गीता और गीतांजलि के उर्दू काव्यानुवाद से विशेष ख्याति अर्जित की और पद्मश्री से सम्मानित हुए।
1976 का लखनऊ मुशायरा अनवर जलालपुरी के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?
1976 के लखनऊ मुशायरे में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की उपस्थिति में अनवर जलालपुरी को पहली बार किसी बड़े राष्ट्रीय मंच पर शायरी पेश करने का अवसर मिला। इस कार्यक्रम के बाद वे पूरे देश में एक उभरते शायर के रूप में पहचाने जाने लगे, और यही उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
अनवर जलालपुरी ने भगवद्गीता का उर्दू अनुवाद क्यों किया?
अनवर जलालपुरी ने श्रीमद्भगवद्गीता का उर्दू में काव्यानुवाद इसलिए किया ताकि उर्दू पाठकों के लिए इस धर्मग्रंथ को सुलभ और बोधगम्य बनाया जा सके। उन्होंने इस अनुवाद को शायरी की शक्ल दी, जिससे यह आम पाठकों तक भी पहुँच सका।
अनवर जलालपुरी को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
अनवर जलालपुरी को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रतिष्ठित यश भारती पुरस्कार और राष्ट्रीय स्तर पर पद्मश्री से सम्मानित किया गया। ये सम्मान उर्दू साहित्य और सांस्कृतिक सेतु-निर्माण में उनके असाधारण योगदान की मान्यता थे।
अनवर जलालपुरी की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में 'खारे पानी का सिलसिला', 'खुशबू की रिश्तेदारी' और 'रोशनाई के सफीर' शामिल हैं। इसके अलावा श्रीमद्भगवद्गीता और रवींद्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' के उर्दू काव्यानुवाद उनकी सबसे उल्लेखनीय साहित्यिक उपलब्धियाँ मानी जाती हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 21 घंटे पहले
  2. 21 घंटे पहले
  3. 21 घंटे पहले
  4. 3 सप्ताह पहले
  5. 6 महीने पहले
  6. 7 महीने पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले