शहरयार: 'दिल चीज क्या है' के शायर जिन्होंने उर्दू अदब और सिनेमा दोनों को अमर किया
सारांश
मुख्य बातें
उर्दू साहित्य के शिखर पुरुष अखलाक मुहम्मद खान 'शहरयार' का नाम लेते ही जेहन में गूंज उठता है — 'दिल चीज क्या है, आप मेरी जान लीजिए...' और 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं...' ये गीत आज भी करोड़ों लोगों की जुबान पर हैं। शहरयार महज एक शायर नहीं थे — वे एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने अपनी सादगी, दोस्ती और अदब से पूरी एक पीढ़ी को सींचा।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
16 जून 1936 को उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के आंवला में जन्मे शहरयार का असली नाम अखलाक मुहम्मद खान था। उनके पिता अबू मुहम्मद खान पुलिस अधिकारी थे और चाहते थे कि बेटा भी उसी राह पर चले। लेकिन शहरयार का मन किताबों और शब्दों की दुनिया में रमता था। शुरुआती तालीम के बाद वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) पहुंचे, जहाँ 1961 में उन्होंने उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। बाद में वे उसी विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में अध्यापन से जुड़ गए।
शख्सियत: यारों के यार
AMU के उर्दू विभाग के उनके समकालीनों का कहना था कि शहरयार जितने बड़े शायर थे, उतने ही बेहतरीन इंसान भी थे। हर उम्र के लोगों से दोस्ती करना और नई पीढ़ी के छात्रों को अपनापन देना उनकी खास पहचान थी। यही वजह थी कि लोग उन्हें प्यार से 'यारों का यार' कहते थे। उनकी सादगी उनकी शायरी जितनी ही गहरी थी।
शायरी का सफर और साहित्यिक विरासत
1960 के दशक में शहरयार ने शायरी लिखना शुरू किया। उनकी रचनाओं में जिंदगी की उदासी, इंसानी रिश्तों की जटिलता और समाज की बेचैनी साफ झलकती थी। उनका यह शेर आज भी उतना ही प्रासंगिक है — 'सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।'
उनकी पहली पुस्तक 'इस्म-ए-आजम' 1965 में प्रकाशित हुई। लेकिन 'ख्वाब का दर बंद है' ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई और इसी कृति के लिए उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। बाद में भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें अलंकृत किया गया। वे AMU से जुड़े तीसरे साहित्यकार थे जिन्हें यह गौरव प्राप्त हुआ।
फिल्मी दुनिया में अमर योगदान
शहरयार की पहचान मुख्यतः शायर की थी, लेकिन निर्देशक मुजफ्फर अली की फिल्म 'उमराव जान' के लिए लिखे उनके गीतों ने उन्हें घर-घर तक पहुंचा दिया। 'दिल चीज क्या है', 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं' और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसे गीत आज भी सदाबहार माने जाते हैं। गौरतलब है कि शहरयार खुद को फिल्मी गीतकार नहीं मानते थे — उनका मानना था कि गीत तभी लिखना चाहिए जब वह कहानी का हिस्सा हो और उसमें शायरी की गुंजाइश हो। इसीलिए उन्होंने फिल्मों में बहुत कम काम किया, लेकिन जो लिखा वह इतिहास बन गया।
विरासत और विदाई
13 फरवरी 2012 को कैंसर की बीमारी के कारण शहरयार इस दुनिया से विदा हो गए। लेकिन उनकी गजलें, नज्में और गीत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। यह ऐसे समय में याद करने योग्य है जब उर्दू अदब को नई पीढ़ी से जोड़ने की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस होती है — और शहरयार जैसे शायर वह सेतु बनते हैं जो भाषा, संस्कृति और इंसानियत को एक सूत्र में पिरोते हैं।