क्या फिराक गोरखपुरी ने उर्दू शायरी को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया?

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क्या फिराक गोरखपुरी ने उर्दू शायरी को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया?

सारांश

फिराक गोरखपुरी, जिनका असली नाम रघुपति सहाय था, ने अपनी शायरी के माध्यम से इश्क और जीवन की गहराइयों को छुआ। उनकी रचनाएं आज भी दिलों को छूती हैं और उर्दू साहित्य में अद्वितीय स्थान रखती हैं। जानिए उनके जीवन और लेखनी के बारे में।

Key Takeaways

  • फिराक गोरखपुरी ने उर्दू शायरी को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
  • उनकी रचनाएं आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं।
  • उन्होंने भारतीय संस्कृति और मानवीय भावनाओं को अपनी शायरी में समाहित किया।
  • फिराक का साहित्यिक योगदान अद्वितीय है।
  • उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं।

नई दिल्ली, 27 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। "बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं", ये शब्द हैं, उर्दू के प्रसिद्ध शायर फिराक गोरखपुरी के, जिनका असली नाम रघुपति सहाय था। उन्होंने अपनी गजलों, नज्मों और रुबाइयों के माध्यम से उर्दू शायरी को नई ऊचाइयों पर पहुंचाया। उन्होंने इश्क, जीवन और भावनाओं को इतनी खूबसूरती से व्यक्त किया कि वह अपने समय के सबसे मशहूर शायरों में गिने जाते हैं।

"मैं हूं दिल है तन्हाई है, तुम भी होते अच्छा होता" जैसी शायरी को सृजन करने वाले फिराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ। फिराक ने भारतीय संस्कृति, लोक जीवन और मानवीय भावनाओं को अपनी शायरी में इस खूबसूरती से पिरोया कि उनकी रचनाएं आज भी दिलों में गूंजती हैं। उनकी कृतियों में इश्क, दर्शन और सामाजिक सच्चाइयां का अनूठा संगम मिलता है, जो उन्हें आधुनिक उर्दू गज़ल के संस्थापकों में से एक बनाता है।

फिराक के पिता मुंशी गोरख प्रसाद "इबरत" एक प्रसिद्ध वकील और उर्दू-फारसी के शायर थे, जिनसे उन्हें साहित्य के प्रति लगाव विरासत में मिला। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज से प्राप्त की और बाद में उर्दू, फारसी और अंग्रेजी साहित्य में मास्टर्स डिग्री हासिल की।

फिराक ने अपने साहित्यिक करियर की शुरुआत गज़ल से की, लेकिन उनकी रचनाएं नज्म, रुबाई और दोहा जैसी विभिन्न शैलियों में भी फैलीं। उनकी प्रमुख कृतियां जैसे "गुल-ए-नगमा", "रूह-ए-कायनात", "शबनमिस्तान" और "रूप" ने उर्दू साहित्य को समृद्ध किया।

उनकी शायरी में फारसी, हिंदी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ झलकती है, जिसने उर्दू शायरी को लोकजीवन और प्रकृति से जोड़ा। उन्होंने सामाजिक दुख-दर्द को व्यक्तिगत अनुभूति के साथ प्रस्तुत किया, जिससे उनकी रचनाएं आम और खास दोनों के लिए प्रासंगिक बनीं।

फिराक ने "मौत का भी इलाज हो शायद, जिंदगी का कोई इलाज नहीं", "एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें, और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं", "तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो, तुम को देखें कि तुम से बात करें", "तेरे आने की क्या उमीद मगर, कैसे कह दूं कि इंतिजार नहीं" जैसी शायरी को अमर किया।

फिराक को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया। 1960 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1968 में पद्म भूषण और 1969 में ज्ञानपीठ पुरस्कार (गुल-ए-नगमा के लिए) से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ। 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी का सदस्य भी मनोनीत किया गया।

फिराक ने शायरी के साथ-साथ आजादी की लड़ाई में भी योगदान दिया। कहा जाता है कि 1918 के "सविनय अवज्ञा आंदोलन" में उन्होंने भाग लिया और 1926 में ब्रिटिश सरकार द्वारा राजनीतिक बंदी भी बनाए गए। उन्होंने "असहयोग आंदोलन" के दौरान सिविल सर्विस की नौकरी छोड़ दी और जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में अवर सचिव के रूप में कार्य किया। बाद में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1930 से 1959 तक अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दीं।

फिराक एक हाजिरजवाब, विद्रोही और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी शायरी में भारतीय संस्कृति, गंगा-जमुनी तहजीब और लोकजीवन की झलक नजर आती है। लंबी बीमारी के बाद 3 मार्च 1982 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

Point of View

बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। उनकी शायरी में मानवीय भावनाओं की गहराई और सामाजिक सच्चाइयों का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
NationPress
30/08/2025

Frequently Asked Questions

फिराक गोरखपुरी का असली नाम क्या था?
फिराक गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था।
फिराक गोरखपुरी ने कौन से पुरस्कार प्राप्त किए?
उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार, और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड मिला।
फिराक गोरखपुरी का जन्म कहाँ हुआ?
उनका जन्म 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ।
फिराक गोरखपुरी ने किस प्रकार की शायरी की?
उन्होंने गज़ल, नज्म, रुबाई और दोहा जैसी विभिन्न शैलियों में शायरी की।
फिराक गोरखपुरी का निधन कब हुआ?
फिराक गोरखपुरी का निधन 3 मार्च 1982 को नई दिल्ली में हुआ।