चंकी पांडे का बाथरूम वाला किस्सा: जब पहलाज निहलानी की मदद ने दिलाई पहली फिल्म
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता चंकी पांडे का बॉलीवुड में प्रवेश किसी पारंपरिक ऑडिशन या स्क्रीन टेस्ट से नहीं, बल्कि एक फाइव स्टार होटल के बाथरूम में हुई एक अजीबोगरीब मुसीबत से हुआ। उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में इस किस्से का खुलासा किया, जिसे वह चार दशक बाद भी भूले नहीं हैं।
बाथरूम में फंसे और मिल गया करियर
चंकी पांडे ने बताया कि एक बार वह मुंबई के एक फाइव स्टार होटल में आयोजित वेडिंग पार्टी में शामिल हुए थे। उन्होंने चुड़ीदार पायजामा पहना हुआ था, लेकिन थोड़ी ज़्यादा बीयर पी लेने के बाद नाड़े की गाँठ खुलना उनके बस की बात नहीं रही। उनके अपने शब्दों में — 'मेरी एक दिक्कत है, मैं नाड़ा बांध सकता हूँ लेकिन खोल नहीं पाता। मैं मदद के लिए चिल्ला रहा था कि तभी पहलाज निहलानी आए और मदद की।'
यह मुलाकात महज संयोग नहीं, बल्कि उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। मदद के बाद हुई बातचीत में फिल्म प्रोड्यूसर पहलाज निहलानी ने जब पूछा कि वह क्या करते हैं, तो चंकी ने बताया कि वह मॉडल हैं और फिल्मों में ब्रेक की तलाश में हैं। निहलानी ने उन्हें अगले ही दिन अपने ऑफिस बुलाया और फिल्म 'आग ही आग' ऑफर कर दी।
संघर्ष के वे साल
26 सितंबर 1962 को मुंबई में जन्मे चंकी पांडे का असली नाम सुयश पांडे है। उनके पिता डॉ. शरद पांडे एक प्रतिष्ठित हार्ट सर्जन थे। परिवार में डॉक्टरी का माहौल होने के बावजूद चंकी पढ़ाई में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए, इसलिए उस राह पर नहीं चल सके। फिल्मों से पहले उन्होंने मॉडलिंग की और जीवन-यापन के लिए मार्बल, पुरानी कारें तथा घरेलू सामान बेचने जैसे काम भी किए।
यह ऐसे समय में आया जब बॉलीवुड में नए चेहरों को स्थान पाना बेहद मुश्किल था। कई ऑडिशन में उन्हें यही जवाब मिलता रहा कि वह किरदार के लिए 'सही नहीं हैं'।
पहली फिल्म से 'तेजाब' तक का सफर
चंकी ने 1987 में फिल्म 'आग ही आग' से बॉलीवुड में कदम रखा। इसके बाद 'पाप की दुनिया' में उनकी भूमिका ने ध्यान खींचा। असली मुकाम तब मिला जब 1988 में आई 'तेजाब' ने दर्शकों के बीच उन्हें पहचान दिलाई। अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित अभिनीत इस फिल्म में चंकी ने अनिल के दोस्त बब्बन का किरदार निभाया, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के नॉमिनेशन से नवाज़ा गया।
बांग्लादेश का दौर और वापसी
'विश्वात्मा', 'लुटेरे', 'आंखें' और 'डॉन' जैसी फिल्मों में काम करने के बाद 90 के दशक के मध्य में जब बॉलीवुड की धाराएँ बदलीं और उनके लिए मनपसंद भूमिकाएँ कम होती गईं, तो उन्होंने बांग्लादेश की फिल्मों का रुख किया। वहाँ उन्होंने करीब सात-आठ साल काम किया। पत्नी भावना की प्रेरणा पर वह फिर बॉलीवुड लौटे।
वापसी के बाद 'हाउसफुल' सीरीज़ में उनका 'आखिरी पास्ता' वाला किरदार दर्शकों के बीच खासा लोकप्रिय हुआ। इसके अलावा 'बेगम जान', 'साहो' और 'अभय 2' जैसे प्रोजेक्ट्स में उन्होंने विभिन्न रंगों की भूमिकाएँ निभाईं।
अब सिर्फ 'याद रहने वाले सीन' की चाहत
चंकी ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट कहा कि अब उनकी प्राथमिकता बदल चुकी है — वह सिर्फ हीरो वाली सोच से आगे बढ़ चुके हैं और ऐसे किरदार चाहते हैं जिनके कुछ सीन दर्शकों की यादों में स्थायी जगह बना सकें। करीब चार दशक के इस सफर में बाथरूम में पड़ी एक गाँठ से मिले ब्रेक की कहानी उनकी ज़िंदगी की सबसे अनोखी कड़ी बनी हुई है।