फिल्म निर्माता पहलाज निहलानी का 76 वर्ष की उम्र में निधन, सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ने ली अंतिम सांस
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माता और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी का 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। भारतीय फिल्म निर्माताओं के सबसे बड़े संगठन द इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (इम्पा) के अध्यक्ष अभय सिन्हा ने उनके निधन की पुष्टि की है।
इंडस्ट्री में शोक की लहर
निहलानी के निधन की खबर सामने आते ही हिंदी फिल्म जगत में शोक का माहौल है। वे न केवल एक सफल निर्माता थे, बल्कि सेंसर बोर्ड के प्रमुख के तौर पर अपनी सख्त नीतियों के लिए भी पहचाने जाते थे। रिपोर्टों के अनुसार, वे काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे।
हिट फिल्मों की लंबी फेहरिस्त
निहलानी ने अपने करियर में कई यादगार फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें ‘इल्जाम’, ‘आग ही आग’, ‘शोला और शबनम’ और ‘आंखें’ प्रमुख हैं। 1993 में आई ‘आंखें’ उस दौर की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में गिनी जाती है और आज भी इसे नब्बे के दशक की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक माना जाता है। उनकी फिल्मोग्राफी में ‘हथकड़ी’, ‘आंधी-तूफान’, ‘पाप की दुनिया’, ‘आग का गोला’, ‘दिल तेरा दीवाना’, ‘भाई भाई’, ‘जूली 2’ और ‘रंगीला राजा’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं।
स्टार बनाने वाले निर्माता
निहलानी को कई बड़े कलाकारों को बॉलीवुड में पहला अवसर देने का श्रेय जाता है। उन्होंने अभिनेता गोविंदा को 1986 में आई फिल्म ‘इल्जाम’ से लॉन्च किया था, जबकि चंकी पांडे ने उनकी फिल्म ‘आग ही आग’ से बॉलीवुड में कदम रखा। गोविंदा और चंकी पांडे की जोड़ी वाली ‘आंखें’ ने उन्हें कमर्शियल सिनेमा का प्रमुख चेहरा बना दिया।
सेंसर बोर्ड का विवादास्पद कार्यकाल
निर्माता की भूमिका के साथ-साथ निहलानी ने 2015 से 2017 तक CBFC के अध्यक्ष का कार्यभार संभाला। इस दौरान वे अपनी सख्त सेंसरशिप नीतियों के कारण लगातार सुर्खियों में रहे और कई फिल्मों को लेकर विवाद भी सामने आए। आलोचकों का कहना है कि उनके कार्यकाल में फिल्मों के कट्स और शब्दों पर रोक को लेकर बार-बार बहस छिड़ी, हालाँकि उनके समर्थक उन्हें ‘पारंपरिक मूल्यों के पक्षधर’ के रूप में याद करते हैं।
संगठनात्मक भूमिकाएँ
निहलानी लंबे समय तक फिल्म संगठनों से जुड़े रहे और एसोसिएशन ऑफ मोशन पिक्चर एंड टीवी प्रोग्राम प्रोड्यूसर्स के अध्यक्ष भी रहे, जिस पद से उन्होंने 2009 में इस्तीफा दिया था। फिल्म निर्माण, वितरण और नीति-निर्माण — तीनों मोर्चों पर उनकी मौजूदगी ने उन्हें इंडस्ट्री का एक प्रभावशाली नाम बनाए रखा। उनके जाने से बॉलीवुड ने एक ऐसा चेहरा खो दिया है जो व्यावसायिक सिनेमा के स्वर्णिम दौर की पहचान था।