13 अगस्त 2026
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'जय हिंद, जय सिंध' के निर्देशक इंद्रजीत लंकेश बोले — सिनेमा नुक्कड़ नाटक की तरह हो, मनोरंजन के साथ मैसेज भी ज़रूरी

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'जय हिंद, जय सिंध' के निर्देशक इंद्रजीत लंकेश बोले — सिनेमा नुक्कड़ नाटक की तरह हो, मनोरंजन के साथ मैसेज भी ज़रूरी

सारांश

इंद्रजीत लंकेश का मानना है कि सिनेमा की असली जड़ें नुक्कड़ नाटक में हैं — और वह धारा आज भी ज़िंदा रहनी चाहिए। विभाजन पर बनी उनकी नई फिल्म 'जय हिंद, जय सिंध' इसी फ़लसफ़े की परीक्षा है: क्या पर्दे पर दर्द को मनोरंजन में लपेटकर पेश किया जा सकता है?

मुख्य बातें

निर्देशक इंद्रजीत लंकेश की आगामी फिल्म 'जय हिंद, जय सिंध: एक प्रेम कहानी' विभाजन पर आधारित ऐतिहासिक-ड्रामा है।
लंकेश के अनुसार सिनेमा को नुक्कड़ नाटक की तरह मनोरंजन के साथ-साथ सशक्त सामाजिक संदेश भी देना चाहिए।
उन्होंने इंडस्ट्री में २६ वर्षों के दौरान कई दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम किया और युवा कलाकारों को प्लेटफॉर्म दिया।
लंकेश केवल तभी फिल्म बनाते हैं जब उनके पास कोई ज़रूरी कहानी हो — व्यावसायिक दबाव उनकी प्राथमिकता नहीं।
उन्होंने माना कि दर्शकों को मनोरंजन के बीच संदेश देना एक निर्देशक के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

निर्देशक इंद्रजीत लंकेश अपनी आगामी ऐतिहासिक-ड्रामा फिल्म 'जय हिंद, जय सिंध: एक प्रेम कहानी' के साथ दर्शकों के सामने आने की तैयारी में हैं। मुंबई में हुई एक विशेष बातचीत में लंकेश ने स्पष्ट किया कि एक फिल्ममेकर की असली ज़िम्मेदारी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण विषयों को पर्दे पर उतारना भी है।

सिनेमा और नुक्कड़ नाटक का रिश्ता

लंकेश ने सिनेमा की जड़ें नुक्कड़ नाटक में देखते हुए कहा, 'मुझे लगता है कि सिनेमा भी स्ट्रीट प्ले की तरह होना चाहिए, जहाँ आप अपना गुस्सा दिखा सकें या मनोरंजन के ज़रिए लोगों को मज़बूत मैसेज दे सकें।' उन्होंने बताया कि नुक्कड़ नाटक कभी भी महज़ मनोरंजन का साधन नहीं थे — वे एक सशक्त माध्यम थे जिससे समाज को संदेश दिया जाता था। स्ट्रीट प्ले से थिएटर और ड्रामा का जन्म हुआ, और अंततः यही विकास विज़ुअल मीडियम यानी सिनेमा तक पहुँचा।

फिल्ममेकर की ज़िम्मेदारी

जब उनसे पूछा गया कि आज के दौर में एक फिल्मकार की भूमिका क्या होनी चाहिए — केवल मनोरंजन, असहज सवाल उठाना, या दोनों के बीच संतुलन — तो लंकेश ने संतुलन की पैरवी की। उन्होंने माना कि दर्शक सिनेमाघर में नैतिक उपदेश सुनने नहीं आते, लेकिन एक ज़िम्मेदार फिल्मकार को मनोरंजन की आड़ में ज़रूरी संदेश देने की कला आनी चाहिए। उनके अनुसार, 'यह एक निर्देशक के लिए चुनौतीपूर्ण काम है।'

विभाजन पर फिल्म क्यों

लंकेश ने बताया कि वे रोमांस, कॉमेडी और बायोपिक जैसी विभिन्न विधाओं में काम कर चुके हैं, और अब विभाजन जैसे संवेदनशील विषय पर फिल्म लेकर आ रहे हैं। उन्होंने कहा, 'एक निर्देशक के तौर पर आपको संवेदनशील कहानियाँ भी बतानी चाहिए, जो चुनौतीपूर्ण हों।' यह फिल्म उसी सोच का विस्तार है।

२६ साल का सफर और युवा प्रतिभाओं को मौका

इंडस्ट्री में २६ वर्षों का अनुभव रखने वाले लंकेश ने बताया कि उन्होंने कई दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम किया है और अपनी अधिकांश फिल्मों में युवा कलाकारों को प्लेटफॉर्म दिया है। उन्होंने कहा, 'मेरी फिल्में इसलिए बनाईं क्योंकि मैं कुछ कहना चाहता था। अगर मेरे पास बताने के लिए कोई कहानी नहीं होती, तो मैं कभी फिल्म नहीं बनाता।'

कहानी होगी तो फिल्म होगी

लंकेश ने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे दौर भी आए जब उन्होंने तीन साल तक कोई फिल्म नहीं बनाई, और ऐसे मौके भी आए जब उन्होंने एक साल में दो फिल्में बनाईं। उनके लिए रचनात्मकता का पैमाना व्यावसायिक दबाव नहीं, बल्कि कहानी की ज़रूरत है। 'जय हिंद, जय सिंध: एक प्रेम कहानी' उनकी इसी सोच की अगली कड़ी है, जो जल्द ही दर्शकों तक पहुँचेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या विभाजन जैसे भावनात्मक रूप से विस्फोटक विषय को एक 'प्रेम कहानी' के फ्रेम में रखना उसके साथ न्याय करता है या उसे सुपाच्य बनाने की कोशिश में उसकी धार कुंद कर देता है। बॉलीवुड में विभाजन पर बनी फिल्मों का इतिहास मिला-जुला रहा है — 'गदर' ने भावनाएँ जगाईं, लेकिन इतिहास की जटिलता को सरल कर दिया। लंकेश का दावा है कि वे 'संवेदनशील' कहानियाँ बताते हैं, लेकिन संवेदनशीलता और व्यावसायिक सफलता के बीच का तनाव ही इस फिल्म की असली परीक्षा होगी।
RashtraPress
13 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'जय हिंद, जय सिंध: एक प्रेम कहानी' किस विषय पर आधारित है?
यह फिल्म भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी एक ऐतिहासिक-ड्रामा प्रेम कहानी है। निर्देशक इंद्रजीत लंकेश ने इसे एक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण विषय बताया है।
इंद्रजीत लंकेश के अनुसार सिनेमा की ज़िम्मेदारी क्या है?
लंकेश का मानना है कि सिनेमा को नुक्कड़ नाटक की तरह मनोरंजन के साथ-साथ सशक्त सामाजिक संदेश भी देना चाहिए। उनके अनुसार दर्शकों को मनोरंजन के ज़रिए ज़रूरी बात पहुँचाना एक फिल्मकार की सबसे बड़ी चुनौती है।
इंद्रजीत लंकेश इंडस्ट्री में कितने समय से काम कर रहे हैं?
इंद्रजीत लंकेश फिल्म इंडस्ट्री में २६ वर्षों से सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने रोमांस, कॉमेडी, बायोपिक और दक्षिण भारतीय फिल्मों सहित विभिन्न विधाओं में काम किया है।
लंकेश युवा कलाकारों को किस तरह मौका देते हैं?
लंकेश ने बताया कि उनकी अधिकांश फिल्मों में युवा कलाकार शामिल रहे हैं और उन्होंने उनके लिए एक प्लेटफॉर्म बनाने की कोशिश की है। वे केवल तभी फिल्म बनाते हैं जब उनके पास कोई ज़रूरी कहानी हो।
क्या इंद्रजीत लंकेश व्यावसायिक दबाव में फिल्में बनाते हैं?
नहीं। लंकेश ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी-कभी तीन साल तक कोई फिल्म नहीं बनाई, और कभी एक साल में दो फिल्में बनाईं। उनके लिए फिल्म बनाने का एकमात्र कारण कहानी की ज़रूरत है, न कि व्यावसायिक दबाव।
राष्ट्र प्रेस
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