'जय हिंद, जय सिंध' के निर्देशक इंद्रजीत लंकेश बोले — सिनेमा नुक्कड़ नाटक की तरह हो, मनोरंजन के साथ मैसेज भी ज़रूरी
सारांश
मुख्य बातें
निर्देशक इंद्रजीत लंकेश अपनी आगामी ऐतिहासिक-ड्रामा फिल्म 'जय हिंद, जय सिंध: एक प्रेम कहानी' के साथ दर्शकों के सामने आने की तैयारी में हैं। मुंबई में हुई एक विशेष बातचीत में लंकेश ने स्पष्ट किया कि एक फिल्ममेकर की असली ज़िम्मेदारी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण विषयों को पर्दे पर उतारना भी है।
सिनेमा और नुक्कड़ नाटक का रिश्ता
लंकेश ने सिनेमा की जड़ें नुक्कड़ नाटक में देखते हुए कहा, 'मुझे लगता है कि सिनेमा भी स्ट्रीट प्ले की तरह होना चाहिए, जहाँ आप अपना गुस्सा दिखा सकें या मनोरंजन के ज़रिए लोगों को मज़बूत मैसेज दे सकें।' उन्होंने बताया कि नुक्कड़ नाटक कभी भी महज़ मनोरंजन का साधन नहीं थे — वे एक सशक्त माध्यम थे जिससे समाज को संदेश दिया जाता था। स्ट्रीट प्ले से थिएटर और ड्रामा का जन्म हुआ, और अंततः यही विकास विज़ुअल मीडियम यानी सिनेमा तक पहुँचा।
फिल्ममेकर की ज़िम्मेदारी
जब उनसे पूछा गया कि आज के दौर में एक फिल्मकार की भूमिका क्या होनी चाहिए — केवल मनोरंजन, असहज सवाल उठाना, या दोनों के बीच संतुलन — तो लंकेश ने संतुलन की पैरवी की। उन्होंने माना कि दर्शक सिनेमाघर में नैतिक उपदेश सुनने नहीं आते, लेकिन एक ज़िम्मेदार फिल्मकार को मनोरंजन की आड़ में ज़रूरी संदेश देने की कला आनी चाहिए। उनके अनुसार, 'यह एक निर्देशक के लिए चुनौतीपूर्ण काम है।'
विभाजन पर फिल्म क्यों
लंकेश ने बताया कि वे रोमांस, कॉमेडी और बायोपिक जैसी विभिन्न विधाओं में काम कर चुके हैं, और अब विभाजन जैसे संवेदनशील विषय पर फिल्म लेकर आ रहे हैं। उन्होंने कहा, 'एक निर्देशक के तौर पर आपको संवेदनशील कहानियाँ भी बतानी चाहिए, जो चुनौतीपूर्ण हों।' यह फिल्म उसी सोच का विस्तार है।
२६ साल का सफर और युवा प्रतिभाओं को मौका
इंडस्ट्री में २६ वर्षों का अनुभव रखने वाले लंकेश ने बताया कि उन्होंने कई दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम किया है और अपनी अधिकांश फिल्मों में युवा कलाकारों को प्लेटफॉर्म दिया है। उन्होंने कहा, 'मेरी फिल्में इसलिए बनाईं क्योंकि मैं कुछ कहना चाहता था। अगर मेरे पास बताने के लिए कोई कहानी नहीं होती, तो मैं कभी फिल्म नहीं बनाता।'
कहानी होगी तो फिल्म होगी
लंकेश ने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे दौर भी आए जब उन्होंने तीन साल तक कोई फिल्म नहीं बनाई, और ऐसे मौके भी आए जब उन्होंने एक साल में दो फिल्में बनाईं। उनके लिए रचनात्मकता का पैमाना व्यावसायिक दबाव नहीं, बल्कि कहानी की ज़रूरत है। 'जय हिंद, जय सिंध: एक प्रेम कहानी' उनकी इसी सोच की अगली कड़ी है, जो जल्द ही दर्शकों तक पहुँचेगी।