दीप्ति नवल ने 'यात्रा' की तस्वीर शेयर कर नाना पाटेकर संग यादें कीं ताज़ा
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री दीप्ति नवल ने दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के साथ बिताए पुराने पलों को इंस्टाग्राम पर साझा कर फिल्मी दुनिया में नॉस्टेल्जिया की एक लहर दौड़ा दी है। उन्होंने निर्देशक गौतम घोष की फिल्म 'यात्रा' के एक दृश्य की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा, 'नाना और मेरे बीच का एक पल, गौतम घोष की फिल्म यात्रा से।' यह तस्वीर दोनों कलाकारों की अद्भुत केमिस्ट्री और उस दौर की सिनेमाई गहराई की याद दिलाती है।
तस्वीर में क्या है ख़ास
इंस्टाग्राम पर शेयर की गई इस तस्वीर में दीप्ति नवल पारंपरिक नीली नौवारी साड़ी और पीले ब्लाउज में एक पारंपरिक पत्थर की चक्की के पास ज़मीन पर बैठी नज़र आ रही हैं। उनके बगल में नाना पाटेकर सादे ऑफ-व्हाइट आउटफिट में हैं, कंधे पर मरून रंग का कपड़ा लपेटे हुए। तस्वीर की सादगी और परिवेश ही फिल्म के भावनात्मक गहराव का परिचय देते हैं।
फिल्म 'यात्रा' की पृष्ठभूमि
निर्देशक गौतम घोष द्वारा निर्देशित फिल्म 'यात्रा' ने 2006 में मॉन्ट्रियल वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल में अपना वर्ल्ड प्रीमियर किया था। इसके बाद यह फिल्म 4 मई 2007 को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। यह फिल्म कला, वास्तविकता और कल्पना के बीच के जटिल संबंध को बड़े ही संवेदनशील तरीके से उकेरती है।
किरदार और कहानी
फिल्म में नाना पाटेकर ने 'दशरथ जोगलेकर' नामक एक प्रतिष्ठित लेखक की भूमिका निभाई, जो एक साहित्य पुरस्कार ग्रहण करने के लिए हैदराबाद से दिल्ली की यात्रा पर निकलते हैं। इस यात्रा के दौरान उनका अतीत और वर्तमान आमने-सामने आ खड़े होते हैं।
दीप्ति नवल ने दशरथ की सौम्य और ज़िम्मेदार पत्नी 'स्मिता' का किरदार निभाया — जो परिवार और ज़मीनी वास्तविकता का प्रतीक है और लेखक की भावनाओं का एक शांत आधार बनती है। वहीं अभिनेत्री रेखा ने 'लाजवंती' नामक एक तवायफ की भूमिका अदा की, जो दशरथ के उपन्यास की नायिका है और उनके अतीत व कल्पना का प्रतिनिधित्व करती है।
फिल्म का सामाजिक संदेश
गौरतलब है कि 'यात्रा' केवल एक रोड-ट्रिप फिल्म नहीं थी — यह एक लेखक के भीतरी द्वंद्व और समाज के मानस पर तवायफ जैसे हाशिए के किरदारों के प्रभाव की गहन पड़ताल थी। फिल्म में नाना पाटेकर, दीप्ति नवल और रेखा की त्रिकोणीय भूमिकाएँ इस कथा को एक अलग ही ऊँचाई पर ले जाती हैं।
दीप्ति नवल की यह पोस्ट भारतीय समानांतर सिनेमा के उस स्वर्णिम दौर की याद दिलाती है, जब फिल्में व्यावसायिक सफलता से परे सामाजिक और साहित्यिक प्रश्न उठाने का साहस रखती थीं।