क्या दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में फिल्म निर्माता बीरेंद्र भगत ने कहा कि अच्छी फिल्में बनाना मुश्किल हो गया है?
सारांश
Key Takeaways
- दिल्ली शब्दोत्सव में फिल्म निर्माता और निर्देशक की चर्चा महत्वपूर्ण है।
- समाज की कुरीतियों को चुनौती देने वाली फिल्में अक्सर विवादों में रहती हैं।
- अच्छी फिल्में बनाना और रिलीज कराना आज के समय में कठिन हो गया है।
- जनसंख्या नियंत्रण पर चर्चा आवश्यक है।
- निर्माताओं को अपनी आवाज उठाने का मौका मिलना चाहिए।
नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। हिंदी फिल्म उद्योग में विभिन्न प्रकार की फिल्में बनाई जाती हैं। कुछ फिल्में मनोरंजन के लिए होती हैं, जिनमें रोमांस और एक्शन शामिल होता है, जबकि अन्य फिल्में समाज की कुरीतियों को चुनौती देती हैं। ये फिल्में अक्सर विवादों में रहती हैं। ऐसी ही फिल्मों पर दिल्ली शब्दोत्सव में निर्देशक और लेखक एम.के. शिवाक्ष और फिल्म निर्माता बीरेंद्र भगत ने गहन चर्चा की।
एम.के. शिवाक्ष ने बताया कि ऐसे कार्यक्रमों का होना आवश्यक है, क्योंकि ये छोटे निर्देशकों और निर्माताओं को अपनी बात कहने का मौका देते हैं, जो समाज से संबंधित फिल्में बनाते हैं।
अपनी फिल्म 'गोधरा' पर चर्चा करते हुए, उन्होंने कहा कि यह फिल्म 2024 में रिलीज हुई थी, लेकिन इसे प्रोपेगेंडा बताकर नजरअंदाज किया गया और ओटीटी प्लेटफॉर्म नहीं मिले। अब जल्द ही यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म जी फाइव पर रिलीज होने जा रही है।
इस फिल्म को बनाने में 5 वर्ष लगे और सेंसर बोर्ड से पास कराने में भी बहुत मेहनत करनी पड़ी। मैं दर्शकों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस फिल्म को एक बार अवश्य देखें।
'हम दो हमारे बारह' फिल्म के निर्माता बीरेंद्र भगत ने भी दिल्ली शब्दोत्सव में उन फिल्मों की चर्चा की, जो समाज का दर्पण होती हैं, लेकिन ये फिल्में रिलीज से पहले ही विवादों में घिर जाती हैं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी भी देश में जनसंख्या नियंत्रण की बात करते हैं, और हमने भी देशहित से संबंधित फिल्म बनाई है। महिलाओं की दुर्दशा को दर्शाया गया है, लेकिन हमारी फिल्म पर एक विशेष समुदाय को टारगेट करने का आरोप लगाया गया, जबकि ऐसा नहीं है। आज के समय में अच्छी फिल्में बनाना और रिलीज कराना अत्यंत कठिन हो गया है।
उन्होंने आगे कहा कि जनसंख्या के मामले में हम पहले ही चीन को पीछे छोड़ चुके हैं और हमें समझना चाहिए कि जनसंख्या नियंत्रण कितना महत्वपूर्ण है। इससे हमारे संसाधनों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पहले के समय में महंगाई इतनी नहीं थी, जितनी आज है। ऐसे में अधिक बच्चों को पालना कठिन हो रहा है।