आशा पारेख की आत्मकथा: गीता बाली ने रानीखेत शूटिंग पर किया था मेकअप, शम्मी कपूर से जताई थी गोद लेने की इच्छा
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री आशा पारेख की आत्मकथा 'द हिट गर्ल' में दर्ज एक भावुक किस्से के अनुसार, दिग्गज अभिनेत्री गीता बाली ने एक समय उन्हें गोद लेने की इच्छा शम्मी कपूर के सामने ज़ाहिर की थी। यह उस दौर की बात है जब आशा पारेख फ़िल्म उद्योग में नई थीं और 1959 की फ़िल्म 'दिल देके देखो' की शूटिंग कर रही थीं।
फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत
आशा पारेख ने अपने अभिनय की पहली सीढ़ी तब चढ़ी, जब वह पाँचवीं कक्षा में थीं। निर्देशक बिमल रॉय की फ़िल्म 'माँ' में उन्होंने बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी। हालाँकि उनकी असली पहचान 1959 में शम्मी कपूर के साथ 'दिल देके देखो' में लीड रोल से बनी। इस फ़िल्म ने उनके करियर को एक नई दिशा दी और साथ ही शम्मी कपूर के परिवार से एक ख़ास रिश्ते की नींव भी रखी।
गीता बाली से पहली मुलाक़ात
'दिल देके देखो' की शूटिंग के दौरान आशा पारेख की मुलाक़ात शम्मी कपूर की पत्नी और मशहूर अभिनेत्री गीता बाली से हुई। उस समय आशा उद्योग में नई थीं, जबकि गीता बाली पहले से अपनी एक अलग पहचान बना चुकी थीं। 'द हिट गर्ल' में आशा ने लिखा है कि गीता बाली उनके साथ हमेशा स्नेह और अपनेपन से पेश आती थीं।
रानीखेत की यादगार सुबह
आत्मकथा के अनुसार, रानीखेत में 'दिल देके देखो' की शूटिंग के पहले दिन गीता बाली ने स्वयं आशा पारेख का मेकअप किया था। उद्योग में नई होने के कारण यह पल आशा के लिए बेहद विशेष था। गीता बाली ने उन्हें शूटिंग के माहौल और काम करने के तौर-तरीक़ों से परिचित कराने में भी मदद की। धीरे-धीरे दोनों के बीच एक गहरा और प्यारा रिश्ता विकसित हो गया।
गोद लेने की अनोखी इच्छा
दोनों के बीच रिश्ते में इतना अपनापन आ गया कि गीता बाली ने एक अवसर पर शम्मी कपूर के सामने आशा को गोद लेने की इच्छा व्यक्त की। यह किस्सा आशा पारेख की ज़िंदगी की सबसे दिलचस्प यादों में शुमार है। आशा पारेख ने अपनी आत्मकथा में यह भी बताया है कि वह शम्मी कपूर को 'चाचा' और गीता बाली को 'चाची' कहकर बुलाती थीं।
करियर की उड़ान
'दिल देके देखो' की सफलता के बाद आशा पारेख के पास फ़िल्मों की कोई कमी नहीं रही। 1960 और 1970 के दशक में वह हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं। 'जब प्यार किसी से होता है', 'फिर वही दिल लाया हूँ', 'तीसरी मंज़िल', 'प्यार का मौसम', 'कटी पतंग' और 'कारवाँ' जैसी फ़िल्मों ने उन्हें दर्शकों के दिलों में एक स्थायी जगह दिलाई। उनकी आत्मकथा में दर्ज ये किस्से भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर की मानवीय और भावुक झलकियाँ प्रस्तुत करते हैं।