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'दो बदन' ने बदली आशा पारेख की 'ग्लैमर गर्ल' छवि, राज खोसला ने दिखाई असली अभिनय प्रतिभा

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'दो बदन' ने बदली आशा पारेख की 'ग्लैमर गर्ल' छवि, राज खोसला ने दिखाई असली अभिनय प्रतिभा

सारांश

'दो बदन' सिर्फ एक फिल्म नहीं थी — यह आशा पारेख के लिए एक करियर-बदलने वाला क्षण था। राज खोसला ने वह देखा जो इंडस्ट्री नहीं देख पाई: ग्लैमर की आड़ में एक गहरी अभिनेत्री। उनकी यही दूरदृष्टि उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे विशिष्ट निर्देशकों में अमर बनाती है।

मुख्य बातें

निर्देशक राज खोसला का जन्म 31 मई, 1925 को हुआ था।
1966 में रिलीज 'दो बदन' ने आशा पारेख की 'ग्लैमर गर्ल' छवि को तोड़कर उन्हें गंभीर अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया।
आशा पारेख ने स्वयं स्वीकार किया कि इस फिल्म ने उन्हें भावनात्मक किरदार निभाने का आत्मविश्वास दिया।
राज खोसला और आशा पारेख ने 'चिराग' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' में भी साथ काम किया।
राज खोसला ने गुरुदत्त के सहायक के रूप में करियर शुरू किया और 'सीआईडी' , 'वो कौन थी?' , 'मेरा साया' जैसी कालजयी फिल्में दीं।

निर्देशक राज खोसला ने 1966 में रिलीज फिल्म 'दो बदन' के ज़रिए अभिनेत्री आशा पारेख की उस छवि को तोड़ा, जो उन्हें केवल एक ग्लैमरस और डांसिंग स्टार तक सीमित रखती थी। इस फिल्म के बाद आलोचकों को भी अपनी राय बदलनी पड़ी और आशा पारेख को एक गंभीर अभिनेत्री के रूप में स्वीकार किया गया।

ग्लैमर की आड़ में दबी प्रतिभा

एक दौर था जब हिंदी सिनेमा में आशा पारेख की पहचान मुख्यतः उनके नृत्य और ग्लैमरस किरदारों से बनी थी। उनकी लोकप्रियता निर्विवाद थी, लेकिन गंभीर और भावनात्मक भूमिकाओं को लेकर उनकी क्षमता पर अक्सर सवाल उठाए जाते थे। खुद आशा पारेख ने कई अवसरों पर स्वीकार किया है कि उस दौर में लोगों को यकीन ही नहीं था कि वह भावनात्मक और जटिल किरदारों को प्रभावशाली ढंग से निभा सकती हैं।

राज खोसला का भरोसा और 'दो बदन' का सफर

31 मई, 1925 को जन्मे राज खोसला उन विरले निर्देशकों में से थे जिन्हें कलाकारों की छिपी प्रतिभा पहचानने की असाधारण दृष्टि प्राप्त थी। अभिनेत्री साधना के साथ कई सफल फिल्में देने के बाद उन्होंने आशा पारेख पर भरोसा जताया और उन्हें 'दो बदन' में एक चुनौतीपूर्ण किरदार सौंपा। यह फिल्म 1966 में रिलीज हुई और इसने आशा पारेख के करियर को नई दिशा दी।

फिल्म की रिलीज के बाद दर्शकों ने जिस तरह उनके अभिनय को सराहा, वह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था। आशा पारेख ने कहा था कि 'दो बदन' ने उन्हें वह आत्मविश्वास दिया, जिससे उन्हें एहसास हुआ कि वह केवल मनोरंजक भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं — गंभीर किरदार भी उनकी पहुँच में हैं।

राज खोसला और आशा पारेख की यादगार जोड़ी

'दो बदन' की सफलता के बाद इस जोड़ी ने 'चिराग' और फिर 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' में भी साथ काम किया। 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' को हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म ने रिश्तों, त्याग और आत्मसम्मान जैसे विषयों को असाधारण संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा।

हिंदी सिनेमा में राज खोसला की विरासत

महान फ़िल्मकार गुरुदत्त के सहायक निर्देशक के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले और देव आनंद के करीबी मित्र राज खोसला ने हिंदी सिनेमा को 'सीआईडी', 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'दो रास्ते', 'मेरा गांव मेरा देश', 'दोस्ताना' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' जैसी कालजयी फिल्में दीं। सस्पेंस, सामाजिक और पारिवारिक विषयों पर उनकी समान पकड़ ने उन्हें अपने दौर के सबसे बहुमुखी निर्देशकों में स्थापित किया।

यह ऐसे समय में उल्लेखनीय है जब हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों को अक्सर एक ही साँचे में ढाल दिया जाता था। राज खोसला ने उस रूढ़िवादी सोच को चुनौती देते हुए कलाकारों के भीतर के अभिनेता को पहचाना और उसे निखारा — यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ अभिनेत्रियों को उनकी पहली सफलता के साँचे में जड़ दिया जाता था। यह विडंबना है कि आशा पारेख जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्री को अपनी गंभीर क्षमता साबित करने के लिए एक निर्देशक के 'भरोसे' का इंतज़ार करना पड़ा। राज खोसला की असली उपलब्धि फिल्में बनाना नहीं, बल्कि उन कलाकारों को उनकी पूरी संभावना तक पहुँचाना था जिन्हें इंडस्ट्री ने एक खाँचे में बंद कर दिया था। आज जब ओटीटी के दौर में अभिनेत्रियों की बहुमुखी प्रतिभा को पहचान मिल रही है, राज खोसला का यह योगदान और भी प्रासंगिक लगता है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राज खोसला ने आशा पारेख की छवि कैसे बदली?
राज खोसला ने 1966 की फिल्म 'दो बदन' में आशा पारेख को एक भावनात्मक और चुनौतीपूर्ण किरदार दिया, जबकि उस समय उन्हें केवल ग्लैमरस और डांसिंग स्टार माना जाता था। फिल्म की सफलता के बाद आलोचकों को भी उनके बारे में अपनी राय बदलनी पड़ी।
'दो बदन' फिल्म कब रिलीज हुई थी?
'दो बदन' 1966 में रिलीज हुई थी। यह राज खोसला और आशा पारेख की पहली साझा फिल्म थी, जिसने आशा पारेख के करियर को नई दिशा दी।
राज खोसला और आशा पारेख ने कौन-कौन सी फिल्में साथ कीं?
राज खोसला और आशा पारेख ने 'दो बदन' (1966), 'चिराग' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' जैसी फिल्मों में साथ काम किया। इनमें 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' को हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में गिना जाता है।
राज खोसला का जन्म कब हुआ था और उनका करियर कैसे शुरू हुआ?
राज खोसला का जन्म 31 मई, 1925 को हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत महान फ़िल्मकार गुरुदत्त के सहायक निर्देशक के रूप में की थी और देव आनंद के करीबी मित्र भी रहे।
राज खोसला की प्रमुख फिल्में कौन-सी हैं?
राज खोसला ने 'सीआईडी', 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'दो रास्ते', 'मेरा गांव मेरा देश', 'दोस्ताना' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' जैसी कालजयी फिल्में दीं। सस्पेंस से लेकर पारिवारिक विषयों तक उनकी समान पकड़ थी।
राष्ट्र प्रेस
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