'लग जा गले' को राज खोसला ने किया था नकार, मनोज कुमार की पहल ने बचाया यह कालजयी गीत
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के सबसे अमर गीतों में शुमार 'लग जा गले' की रचना का सफर उतना सहज नहीं था, जितना आज लगता है। 1964 में रिलीज हुई फिल्म 'वो कौन थी' के इस गीत को जब संगीतकार मदन मोहन ने पहली बार निर्देशक राज खोसला को सुनाया, तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया था। अभिनेता मनोज कुमार की सूझबूझ और आग्रह ने इस धुन को फिल्म में जीवित रखा — और भारतीय संगीत के इतिहास को एक अविस्मरणीय नगमा दिया।
राज खोसला: सस्पेंस सिनेमा के उस्ताद
31 मई 1925 को पंजाब में जन्मे राज खोसला हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा निर्देशकों में थे जिन्होंने रहस्य, रोमांस और सस्पेंस को एक साथ परदे पर जीवंत किया। 9 जून को उनकी पुण्यतिथि है। अभिनेत्री साधना के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों में खासी लोकप्रिय रही। 'वो कौन थी', 'मेरा साया' और 'अनीता' जैसी फिल्में आज भी हिंदी सिनेमा की श्रेष्ठ सस्पेंस थ्रिलर में गिनी जाती हैं। उनकी फिल्मों की पहचान थी — कसी हुई कहानी और दर्शक को अंतिम दृश्य तक बाँधे रखने की कला।
धुन और नाराजगी का किस्सा
'वो कौन थी' में साधना और मनोज कुमार मुख्य भूमिका में थे, और फिल्म का संगीत मदन मोहन ने तैयार किया था। लता मंगेशकर की आवाज़ में रिकॉर्ड किए गए 'लग जा गले' की धुन जब मदन मोहन ने पहली बार राज खोसला को सुनाई, तो निर्देशक प्रभावित नहीं हुए। मदन मोहन के पुत्र समीर कोहली ने एक साक्षात्कार में बताया था कि राज खोसला ने धुन सुनने के बाद कहा कि उन्हें मदन मोहन से ऐसे संगीत की उम्मीद नहीं थी — उनका स्पष्ट मत था कि यह धुन फिल्म की ज़रूरत के अनुरूप प्रभावशाली नहीं है।
दूसरी तरफ मदन मोहन को अपनी रचना पर पूरा भरोसा था। उनका विश्वास था कि यह धुन असाधारण है और श्रोताओं के दिलों तक ज़रूर पहुँचेगी। यह मतभेद फिल्म की प्रगति में अड़चन बन सकता था।
मनोज कुमार की निर्णायक भूमिका
इसी दौरान फिल्म से जुड़े लोगों की एक बैठक हुई। मनोज कुमार ने राज खोसला से आग्रह किया कि वे इस धुन को एक बार और ध्यान से सुनें। जब मदन मोहन ने दोबारा वह धुन गाकर सुनाई, तो माहौल बदल गया। इस बार राज खोसला ने गीत की भावनात्मक गहराई और उसकी सुंदरता को महसूस किया। बताया जाता है कि धुन समाप्त होते ही उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि उनका मन कर रहा है कि वे अपना जूता उठाकर खुद को मारें, क्योंकि उन्होंने इतनी शानदार धुन को पहले नकार दिया था।
मनोज कुमार बाद में गर्व के साथ यह किस्सा सुनाते थे कि इस गीत को फिल्म में बनाए रखने में उनकी भूमिका अहम रही।
गीत की विरासत
समय ने साबित किया कि वह निर्णय कितना सही था। 'लग जा गले' आज छह दशक बाद भी संगीत प्रेमियों की पहली पसंद बना हुआ है। यह गीत भारतीय फिल्म संगीत की उस विरासत का हिस्सा है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहती है। यह किस्सा इस बात की भी याद दिलाता है कि महान कला को हमेशा तत्काल स्वीकृति नहीं मिलती — कभी-कभी उसे एक और सुनवाई की ज़रूरत होती है।