13 जुलाई 2026
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संगीतकार मदन मोहन: 'लग जा गले' के रचयिता जिन्होंने सेना में भी दी सेवा, 51 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा

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संगीतकार मदन मोहन: 'लग जा गले' के रचयिता जिन्होंने सेना में भी दी सेवा, 51 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा

सारांश

बगदाद में जन्मे, सेना में सेवा देने वाले और फिर 'गजल के शहजादे' बने मदन मोहन की कहानी सिर्फ संगीत की नहीं — एक असाधारण जीवन-यात्रा की है। मात्र 51 वर्ष में दुनिया छोड़ने वाले इस संगीतकार की धुनें आज भी उतनी ही ताज़ी हैं।

मुख्य बातें

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद, इराक में हुआ था।
वर्ष 1943 में उन्होंने भारतीय सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में लगभग दो वर्ष सेवा दी।
वर्ष 1950 में फिल्म 'आंखें' से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में करियर की शुरुआत हुई।
1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार — सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन — प्राप्त हुआ।
लता मंगेशकर ने उन्हें 'गजल का शहजादा' की उपाधि दी।
14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में निधन हुआ।

हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में मदन मोहन कोहली — जिन्हें दुनिया मदन मोहन के नाम से जानती है — एक ऐसे संगीतकार थे जिनकी धुनों ने गजल को भारतीय सिनेमा में नई ऊँचाई दी। 'लग जा गले', 'दिल ढूंढता है' और 'तू जहाँ-जहाँ चलेगा' जैसी रचनाएँ आज भी श्रोताओं के दिलों में उतनी ही गहराई से उतरती हैं जितनी दशकों पहले। 1950 से 1970 के दशक तक तीन पीढ़ियों के संगीत-प्रेमियों को मंत्रमुग्ध करने वाले इस संगीतकार का जीवन संघर्ष, साधना और असाधारण प्रतिभा की अनूठी दास्तान है।

बगदाद से बॉलीवुड तक का सफर

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था, जहाँ उनके पिता राय बहादुर चुनीलाल कोहली उस समय कार्यरत थे। परिवार बाद में भारत लौटा और लाहौर तथा मुंबई में बस गया। बचपन से ही संगीत के प्रति उनकी रुचि असाधारण थी। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली, लेकिन उनका अधिकांश संगीत-ज्ञान अनुभव, अभ्यास और महान कलाकारों की संगत से निखरा।

सेना से संगीत तक — एक असामान्य यात्रा

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मदन मोहन ने वर्ष 1943 में भारतीय सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेवा आरंभ की। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने लगभग दो वर्ष के कार्यकाल के बाद सेना छोड़ दी और संगीत को अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया। इसके उपरांत वे ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ और दिल्ली केंद्रों में कार्यक्रम सहायक के रूप में जुड़े। इस दौर में उन्हें उस्ताद फैयाज खान, उस्ताद अली अकबर खान, बेगम अख्तर और तलत महमूद जैसी महान विभूतियों के साथ काम करने और सीखने का दुर्लभ अवसर मिला — एक ऐसा अनुभव जिसने उनकी संगीत-दृष्टि को गहराई से आकार दिया।

फिल्मी करियर और कालजयी रचनाएँ

फिल्म जगत में उन्होंने सहायक संगीतकार के रूप में कदम रखा। वर्ष 1950 में फिल्म 'आंखें' से उन्हें स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहचान मिली। इसके बाद 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'हकीकत', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'मौसम' और 'लैला मजनूं' जैसी फिल्मों में उनका संगीत आज भी अमर है। 1960 और 1970 का दशक उनके करियर का सबसे स्वर्णिम काल माना जाता है। 'लग जा गले', 'नैना बरसे', 'कर चले हम फ़िदा' और 'ये दुनिया ये महफिल' जैसे गीत आज भी सदाबहार हैं। वर्ष 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार — सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन — से सम्मानित किया गया।

गायकों और गीतकारों के साथ अमर जोड़ियाँ

मदन मोहन ने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ कालजयी रचनाएँ दीं। लता मंगेशकर के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से अविस्मरणीय रही — लता जी ने उन्हें 'गजल का शहजादा' की उपाधि दी, जो उनकी प्रतिभा का सर्वोच्च सम्मान मानी जाती है। गीतकारों में राजा मेहदी अली खान, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ उनका रचनात्मक सहयोग अत्यंत सफल रहा।

विरासत जो आज भी जीवित है

14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की अल्पायु में मदन मोहन का निधन हो गया। उनका जीवन भले ही संक्षिप्त रहा, किंतु उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को एक ऐसी अमूल्य धरोहर सौंपी जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित है। यह ऐसे समय में स्मरणीय है जब आज की फिल्म इंडस्ट्री में गजल की वह गहराई दुर्लभ होती जा रही है जिसे मदन मोहन ने मुख्यधारा सिनेमा में स्थापित किया था।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसे अपने जीवनकाल में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीत पुरस्कार कभी नहीं मिला — यह उद्योग की उस प्रवृत्ति का प्रमाण है जो व्यावसायिक सफलता को कलात्मक श्रेष्ठता से ऊपर रखती है। आज जब रीमिक्स और रीक्रिएशन के नाम पर उनकी धुनों को बार-बार उठाया जाता है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम मूल रचनाकार को उचित श्रेय और स्थान दे रहे हैं।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मदन मोहन कौन थे और उन्हें क्यों याद किया जाता है?
मदन मोहन कोहली हिंदी सिनेमा के प्रमुख संगीतकार थे जिन्होंने 1950 से 1970 के दशक तक 'लग जा गले', 'दिल ढूंढता है' और 'नैना बरसे' जैसी कालजयी गजलें दीं। लता मंगेशकर ने उन्हें 'गजल का शहजादा' कहा था।
मदन मोहन ने सेना में कब और किस पद पर सेवा दी?
मदन मोहन ने वर्ष 1943 में भारतीय सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेवा आरंभ की। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद लगभग दो वर्ष के कार्यकाल के बाद उन्होंने सेना छोड़ी और संगीत को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
मदन मोहन को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कब और किस फिल्म के लिए मिला?
मदन मोहन को वर्ष 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया। यह उनके करियर का सर्वोच्च सरकारी सम्मान था।
मदन मोहन का जन्म कहाँ हुआ था?
मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था, जहाँ उनके पिता राय बहादुर चुनीलाल कोहली उस समय कार्यरत थे। बाद में परिवार भारत लौटकर लाहौर और मुंबई में बस गया।
मदन मोहन का निधन कब हुआ और उनकी विरासत क्या है?
14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में मदन मोहन का निधन हो गया। उन्होंने 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'हीर रांझा', 'मौसम' जैसी फिल्मों में अमर संगीत दिया, जो आज भी हिंदी सिनेमा की अमूल्य धरोहर है।
राष्ट्र प्रेस
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