संगीतकार मदन मोहन: 'लग जा गले' के रचयिता जिन्होंने सेना में भी दी सेवा, 51 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में मदन मोहन कोहली — जिन्हें दुनिया मदन मोहन के नाम से जानती है — एक ऐसे संगीतकार थे जिनकी धुनों ने गजल को भारतीय सिनेमा में नई ऊँचाई दी। 'लग जा गले', 'दिल ढूंढता है' और 'तू जहाँ-जहाँ चलेगा' जैसी रचनाएँ आज भी श्रोताओं के दिलों में उतनी ही गहराई से उतरती हैं जितनी दशकों पहले। 1950 से 1970 के दशक तक तीन पीढ़ियों के संगीत-प्रेमियों को मंत्रमुग्ध करने वाले इस संगीतकार का जीवन संघर्ष, साधना और असाधारण प्रतिभा की अनूठी दास्तान है।
बगदाद से बॉलीवुड तक का सफर
मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था, जहाँ उनके पिता राय बहादुर चुनीलाल कोहली उस समय कार्यरत थे। परिवार बाद में भारत लौटा और लाहौर तथा मुंबई में बस गया। बचपन से ही संगीत के प्रति उनकी रुचि असाधारण थी। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली, लेकिन उनका अधिकांश संगीत-ज्ञान अनुभव, अभ्यास और महान कलाकारों की संगत से निखरा।
सेना से संगीत तक — एक असामान्य यात्रा
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मदन मोहन ने वर्ष 1943 में भारतीय सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेवा आरंभ की। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने लगभग दो वर्ष के कार्यकाल के बाद सेना छोड़ दी और संगीत को अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया। इसके उपरांत वे ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ और दिल्ली केंद्रों में कार्यक्रम सहायक के रूप में जुड़े। इस दौर में उन्हें उस्ताद फैयाज खान, उस्ताद अली अकबर खान, बेगम अख्तर और तलत महमूद जैसी महान विभूतियों के साथ काम करने और सीखने का दुर्लभ अवसर मिला — एक ऐसा अनुभव जिसने उनकी संगीत-दृष्टि को गहराई से आकार दिया।
फिल्मी करियर और कालजयी रचनाएँ
फिल्म जगत में उन्होंने सहायक संगीतकार के रूप में कदम रखा। वर्ष 1950 में फिल्म 'आंखें' से उन्हें स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहचान मिली। इसके बाद 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'हकीकत', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'मौसम' और 'लैला मजनूं' जैसी फिल्मों में उनका संगीत आज भी अमर है। 1960 और 1970 का दशक उनके करियर का सबसे स्वर्णिम काल माना जाता है। 'लग जा गले', 'नैना बरसे', 'कर चले हम फ़िदा' और 'ये दुनिया ये महफिल' जैसे गीत आज भी सदाबहार हैं। वर्ष 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार — सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन — से सम्मानित किया गया।
गायकों और गीतकारों के साथ अमर जोड़ियाँ
मदन मोहन ने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ कालजयी रचनाएँ दीं। लता मंगेशकर के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से अविस्मरणीय रही — लता जी ने उन्हें 'गजल का शहजादा' की उपाधि दी, जो उनकी प्रतिभा का सर्वोच्च सम्मान मानी जाती है। गीतकारों में राजा मेहदी अली खान, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ उनका रचनात्मक सहयोग अत्यंत सफल रहा।
विरासत जो आज भी जीवित है
14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की अल्पायु में मदन मोहन का निधन हो गया। उनका जीवन भले ही संक्षिप्त रहा, किंतु उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को एक ऐसी अमूल्य धरोहर सौंपी जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित है। यह ऐसे समय में स्मरणीय है जब आज की फिल्म इंडस्ट्री में गजल की वह गहराई दुर्लभ होती जा रही है जिसे मदन मोहन ने मुख्यधारा सिनेमा में स्थापित किया था।