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मदन मोहन: 'नैन', 'नजर', 'निगाह' से सजी धुनों के 'गजलों के शहजादे' की अनकही दास्तान

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मदन मोहन: 'नैन', 'नजर', 'निगाह' से सजी धुनों के 'गजलों के शहजादे' की अनकही दास्तान

सारांश

बगदाद में जन्मे, फौज में सेवा दी और फिर हिंदी सिनेमा को 'नैन', 'नजर', 'निगाह' से सजी ऐसी धुनें दीं जो आज भी दिलों में बसती हैं। मदन मोहन की कहानी सिर्फ एक संगीतकार की नहीं, एक ऐसे फनकार की है जिसने 51 साल की उम्र में दुनिया छोड़ी, पर अपना संगीत हमेशा के लिए छोड़ गए।

मुख्य बातें

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद, इराक में हुआ था।
उन्हें 'गजलों का शहजादा' कहा जाता है; उनके गीतों में 'नैन', 'नजर', 'निगाह' शब्द उनकी खास पहचान बने।
पहली बड़ी फिल्म 'आंखें' (1950) थी; 'दस्तक' (1971) के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
लता मंगेशकर के साथ उनकी जुगलबंदी हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार संगीत साझेदारियों में गिनी जाती है।
14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में लिवर की बीमारी के कारण उनका निधन हुआ।

हिंदी सिनेमा के अमर संगीतकार मदन मोहन की रचनाओं में दर्द की गहराई, प्रेम की कोमलता और शायरी की नज़ाकत एक साथ घुली-मिली थी। उन्हें 'गजलों का शहजादा' कहा जाता है और उनके संगीत की एक अनूठी पहचान यह रही कि उनके सबसे यादगार गीतों में 'नैन', 'नजर' और 'निगाह' जैसे शब्द बार-बार आते थे — मानो आँखें ही उनकी धुनों की आत्मा थीं। नई पीढ़ी आज भी उनके गीतों पर मुग्ध है, और यही उनकी विरासत की असली ताकत है।

बगदाद से बॉलीवुड तक का सफर

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था। उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल कोहली वहाँ सरकारी सेवा में तैनात थे। कुछ वर्षों बाद परिवार भारत लौट आया। बचपन से ही संगीत के प्रति उनका गहरा झुकाव था — वे घंटों रिकॉर्डिंग सुनते और धुनें सहज ही याद कर लेते। मुंबई में पढ़ाई के दौरान उन्हें ऑल इंडिया रेडियो के बाल कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला, जिसने उनकी संगीत-यात्रा की नींव रखी।

फौज से फिल्मी दुनिया तक

परिवार की इच्छा पर मदन मोहन ने सेना में प्रवेश किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेवा दी। किंतु उनका मन फौजी जीवन में नहीं रमा। युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने सैन्य सेवा छोड़ दी और संगीत को ही अपना भविष्य चुना। इसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में काम किया, जहाँ बेगम अख्तर, तलत महमूद और अली अकबर खान जैसे दिग्गज कलाकारों से उनकी मुलाकात हुई। इन संवादों ने उनकी संगीत-दृष्टि को और परिपक्व किया।

आँखों से शुरू हुई पहचान

साल 1950 में फिल्म 'आंखें' से उन्हें स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहला बड़ा अवसर मिला। यह संयोग नहीं, बल्कि एक सांकेतिक शुरुआत थी — उनकी पहली बड़ी फिल्म का नाम ही 'आंखें' था। आगे चलकर उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध गीतों में आँखों और नजरों का जिक्र उनकी शैली की पहचान बन गया।

यादगार गीत जो बने अमर धरोहर

मदन मोहन ने अपने सुदीर्घ करियर में सैकड़ों गीतों को संगीत दिया। इनमें से जो गीत आज भी श्रोताओं के दिलों में जीवित हैं, वे हैं — 'आपकी नजरों ने समझा', 'नैना बरसे रिमझिम', 'तेरी आंखों के सिवा', 'नैनों में बदरा छाए', 'हाय उनकी वो निगाहें', 'तुमसे नजर मिली दिल को खबर मिली', 'आंखों आंखों में हो गए मस्त इशारे', 'मैं तो तुमसे नैन मिला के हार गई सजना' और 'तेरी चमकती आंखों के आगे'। इन गीतों में उनकी धुनों ने भावनाओं को जो गहराई दी, वह अतुलनीय है।

लता मंगेशकर और अन्य दिग्गजों के साथ साझेदारी

मदन मोहन की सबसे सफल और ऐतिहासिक जुगलबंदी लता मंगेशकर के साथ रही। लता जी ने कई अवसरों पर कहा था कि मदन मोहन की धुनें जितनी खूबसूरत होती थीं, उतनी ही गायकी की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण भी। दोनों ने मिलकर 'लग जा गले', 'नैना बरसे', 'आपकी नजरों ने समझा' और 'रस्म-ए-उल्फत' जैसी अनगिनत रचनाएँ दीं। मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे महान गायकों ने भी उनकी धुनों को अपनी आवाज से अमर किया।

राष्ट्रीय पुरस्कार और विरासत

मदन मोहन ने 'वो कौन थी', 'मेरा साया', 'हकीकत', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'हंसते जख्म' और 'मौसम' जैसी फिल्मों में अविस्मरणीय संगीत दिया। साल 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

असमय विदाई

जीवन के अंतिम वर्षों में मदन मोहन का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। अत्यधिक मद्यपान के कारण उन्हें लिवर की गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया। 14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया — हिंदी संगीत जगत ने एक ऐसा सितारा खो दिया जिसकी रोशनी आज भी फीकी नहीं पड़ी।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह मदन मोहन को कम मिली — फिर भी उनकी धुनें आज 'एवरग्रीन' की श्रेणी में सबसे ऊपर हैं। यह विरोधाभास इस सवाल को जन्म देता है कि क्या हिंदी फिल्म उद्योग ने अपने जीवनकाल में उन्हें वह सम्मान दिया जिसके वे हकदार थे। उनकी असमय मृत्यु और उसके पीछे की परिस्थितियाँ यह भी याद दिलाती हैं कि कलाकारों की मानसिक और शारीरिक सेहत की अनदेखी उस दौर की एक बड़ी कमी थी।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मदन मोहन कौन थे और उन्हें 'गजलों का शहजादा' क्यों कहा जाता है?
मदन मोहन हिंदी सिनेमा के प्रतिष्ठित संगीतकार थे जिन्होंने 1950 से 1975 के बीच अनगिनत यादगार गीत दिए। गज़ल और ठुमरी की शैली में उनकी अद्वितीय पकड़ के कारण उन्हें 'गजलों का शहजादा' की उपाधि दी जाती है।
मदन मोहन का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था। उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल कोहली वहाँ सरकारी सेवा में थे, और कुछ वर्षों बाद परिवार भारत लौट आया।
मदन मोहन के सबसे प्रसिद्ध गीत कौन-से हैं?
'आपकी नजरों ने समझा', 'नैना बरसे रिमझिम', 'लग जा गले', 'तेरी आंखों के सिवा', 'नैनों में बदरा छाए' और 'रस्म-ए-उल्फत' उनके सबसे चर्चित गीतों में शामिल हैं। इन अधिकांश गीतों में 'नैन', 'नजर' या 'निगाह' शब्द उनकी विशिष्ट शैली की पहचान बने।
मदन मोहन को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार किस फिल्म के लिए मिला?
मदन मोहन को साल 1971 में फिल्म 'दस्तक' के संगीत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह उनके करियर की सबसे बड़ी औपचारिक स्वीकृति थी।
मदन मोहन का निधन कब और कैसे हुआ?
14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में मदन मोहन का निधन हो गया। अत्यधिक मद्यपान के कारण लिवर की गंभीर बीमारी ने उनके जीवन को असमय समाप्त कर दिया।
राष्ट्र प्रेस
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