मदन मोहन: 'नैन', 'नजर', 'निगाह' से सजी धुनों के 'गजलों के शहजादे' की अनकही दास्तान
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के अमर संगीतकार मदन मोहन की रचनाओं में दर्द की गहराई, प्रेम की कोमलता और शायरी की नज़ाकत एक साथ घुली-मिली थी। उन्हें 'गजलों का शहजादा' कहा जाता है और उनके संगीत की एक अनूठी पहचान यह रही कि उनके सबसे यादगार गीतों में 'नैन', 'नजर' और 'निगाह' जैसे शब्द बार-बार आते थे — मानो आँखें ही उनकी धुनों की आत्मा थीं। नई पीढ़ी आज भी उनके गीतों पर मुग्ध है, और यही उनकी विरासत की असली ताकत है।
बगदाद से बॉलीवुड तक का सफर
मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था। उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल कोहली वहाँ सरकारी सेवा में तैनात थे। कुछ वर्षों बाद परिवार भारत लौट आया। बचपन से ही संगीत के प्रति उनका गहरा झुकाव था — वे घंटों रिकॉर्डिंग सुनते और धुनें सहज ही याद कर लेते। मुंबई में पढ़ाई के दौरान उन्हें ऑल इंडिया रेडियो के बाल कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला, जिसने उनकी संगीत-यात्रा की नींव रखी।
फौज से फिल्मी दुनिया तक
परिवार की इच्छा पर मदन मोहन ने सेना में प्रवेश किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेवा दी। किंतु उनका मन फौजी जीवन में नहीं रमा। युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने सैन्य सेवा छोड़ दी और संगीत को ही अपना भविष्य चुना। इसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में काम किया, जहाँ बेगम अख्तर, तलत महमूद और अली अकबर खान जैसे दिग्गज कलाकारों से उनकी मुलाकात हुई। इन संवादों ने उनकी संगीत-दृष्टि को और परिपक्व किया।
आँखों से शुरू हुई पहचान
साल 1950 में फिल्म 'आंखें' से उन्हें स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहला बड़ा अवसर मिला। यह संयोग नहीं, बल्कि एक सांकेतिक शुरुआत थी — उनकी पहली बड़ी फिल्म का नाम ही 'आंखें' था। आगे चलकर उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध गीतों में आँखों और नजरों का जिक्र उनकी शैली की पहचान बन गया।
यादगार गीत जो बने अमर धरोहर
मदन मोहन ने अपने सुदीर्घ करियर में सैकड़ों गीतों को संगीत दिया। इनमें से जो गीत आज भी श्रोताओं के दिलों में जीवित हैं, वे हैं — 'आपकी नजरों ने समझा', 'नैना बरसे रिमझिम', 'तेरी आंखों के सिवा', 'नैनों में बदरा छाए', 'हाय उनकी वो निगाहें', 'तुमसे नजर मिली दिल को खबर मिली', 'आंखों आंखों में हो गए मस्त इशारे', 'मैं तो तुमसे नैन मिला के हार गई सजना' और 'तेरी चमकती आंखों के आगे'। इन गीतों में उनकी धुनों ने भावनाओं को जो गहराई दी, वह अतुलनीय है।
लता मंगेशकर और अन्य दिग्गजों के साथ साझेदारी
मदन मोहन की सबसे सफल और ऐतिहासिक जुगलबंदी लता मंगेशकर के साथ रही। लता जी ने कई अवसरों पर कहा था कि मदन मोहन की धुनें जितनी खूबसूरत होती थीं, उतनी ही गायकी की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण भी। दोनों ने मिलकर 'लग जा गले', 'नैना बरसे', 'आपकी नजरों ने समझा' और 'रस्म-ए-उल्फत' जैसी अनगिनत रचनाएँ दीं। मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे महान गायकों ने भी उनकी धुनों को अपनी आवाज से अमर किया।
राष्ट्रीय पुरस्कार और विरासत
मदन मोहन ने 'वो कौन थी', 'मेरा साया', 'हकीकत', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'हंसते जख्म' और 'मौसम' जैसी फिल्मों में अविस्मरणीय संगीत दिया। साल 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
असमय विदाई
जीवन के अंतिम वर्षों में मदन मोहन का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। अत्यधिक मद्यपान के कारण उन्हें लिवर की गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया। 14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया — हिंदी संगीत जगत ने एक ऐसा सितारा खो दिया जिसकी रोशनी आज भी फीकी नहीं पड़ी।