हेमंत कुमार पुण्यतिथि: रेशमी आवाज़ के उस जादूगर को याद करते हैं, जो 35 साल बाद भी दिलों में ज़िंदा है
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी और बंगाली सिनेमा के सुनहरे युग की आत्मा कहे जाने वाले हेमंत कुमार मुखोपाध्याय की आज, 26 सितंबर 2026 को, 37वीं पुण्यतिथि है। गायक, संगीतकार और फिल्म निर्माता की तिहरी भूमिका निभाने वाले हेमंत कुमार ने अपनी रेशमी, गहरी आवाज़ से ऐसी छाप छोड़ी जो दशकों बाद भी फीकी नहीं पड़ी। 26 सितंबर 1989 को कोलकाता में उनका निधन हुआ था, लेकिन उनके गीत आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुने जाते हैं।
जन्म, परवरिश और कोलकाता से नाता
हेमंत कुमार मुखोपाध्याय का जन्म वाराणसी में हुआ था, जबकि उनके परिवार की मूल जड़ें पश्चिम बंगाल के बहारू गाँव से जुड़ी थीं। बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उनका परिवार कोलकाता आकर बस गया और यहीं उनका बचपन बीता और शिक्षा हुई। इसी शहर में उनकी मुलाकात प्रख्यात कवि और लेखक सुभाष मुखोपाध्याय से हुई, जो आगे चलकर उनके घनिष्ठ मित्र बने।
इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय में अभियांत्रिकी में दाखिला लिया, परंतु संगीत का खिंचाव इतना प्रबल था कि उन्होंने यह राह छोड़ दी। कुछ समय साहित्य में भी हाथ आजमाया — उनकी कई लघुकथाएँ उस दौर की प्रतिष्ठित बाँग्ला पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। अंततः संगीत ही उनका जीवन और पहचान बन गया।
संघर्ष से शिखर तक का सफर
संगीत की दुनिया में शुरुआत उनके लिए कठिन रही। कई जगह स्वर-परीक्षाओं में असफलता मिली और अनेक संगीत निर्देशक उन्हें काम देने को तैयार नहीं थे। 1933 में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया। बंगाली संगीतकार शैलेश दासगुप्ता से उन्हें गहरी प्रेरणा मिली। 1980 के दशक में एक टेलीविजन साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि उन्होंने उस्ताद फैयाज खान से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी, किंतु उस्ताद के निधन के बाद यह प्रशिक्षण आगे नहीं बढ़ सका।
1937 में उन्होंने कोलंबिया लेबल के लिए अपना पहला गैर-फिल्मी रिकॉर्ड जारी किया, जिसमें संगीत शैलेश दासगुप्ता का और गीत नरेश भट्टाचार्य ने लिखा था। इसके बाद उन्होंने ग्रामोफोन कंपनी ऑफ इंडिया के लिए लंबे समय तक गैर-फिल्मी गीत रिकॉर्ड किए। इसी कंपनी के लिए उनका पहला हिंदी रिकॉर्ड भी जारी हुआ, जिसमें 'कितना दुख भुलाया तुमने' और 'ओ प्रीत निभाने वाली' जैसे गीत शामिल थे।
रवींद्र संगीत और बाँग्ला सिनेमा में योगदान
हेमंत कुमार को रवींद्र संगीत के प्रमुख गायकों में भी गिना जाता है। 1944 में उन्होंने बाँग्ला फिल्म 'प्रिया बंधाबी' के लिए पहली बार रवींद्र संगीत रिकॉर्ड किया और उसी वर्ष कोलंबिया लेबल के लिए गैर-फिल्मी रवींद्र संगीत भी रिकॉर्ड किया। 1947 में बाँग्ला फिल्म 'अभियात्री' के लिए उन्होंने संगीत निर्देशन किया — इस प्रकार वे गायक से संगीतकार की भूमिका में भी उतरे।
गौरतलब है कि हेमंत कुमार उन विरले कलाकारों में से एक थे जिन्होंने हिंदी और बाँग्ला — दोनों भाषाओं के सिनेमा में समान रूप से अपनी पहचान बनाई।
हिंदी सिनेमा में अमिट छाप
हिंदी फिल्म संगीत में हेमंत कुमार की आवाज़ ने एक अलग संसार रच दिया। 'है अपना दिल तो आवारा', 'बेकरार करके हमें यूँ न जाइए', 'याद किया दिल ने' और 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ' जैसे गीत उनकी स्थायी पहचान बन गए। उनके गायन में भावुकता, ठहराव और सहजता का एक ऐसा मेल था जो उन्हें समकालीनों से अलग करता था।
यही कारण है कि उनकी आवाज़ एक नहीं, कई पीढ़ियों के श्रोताओं के दिलों तक पहुँची और आज भी पहुँचती है। 26 सितंबर 1989 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संगीत यह साबित करता रहेगा कि सच्चे कलाकार कभी नहीं जाते।