हेमा मालिनी को 13 साल की उम्र में निर्देशक ने किया था रिजेक्ट, कहा — 'अभिनेत्री नहीं बन सकतीं'
सारांश
मुख्य बातें
हेमा मालिनी — बॉलीवुड की 'ड्रीम गर्ल' — को उनके करियर की शुरुआत में ही एक तमिल फिल्म के निर्देशक ने यह कहते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया था कि वह 'बहुत दुबली-पतली हैं और अभिनेत्री बनने के लायक नहीं हैं।' यह घटना तब की है जब हेमा की उम्र महज 13-14 साल थी और वह पहली बार किसी फिल्म के सेट पर कदम रख रही थीं। हेमा ने खुद इस किस्से का खुलासा अपनी आत्मकथा 'बियॉन्ड द ड्रीमगर्ल' के विमोचन के दौरान किया।
शुरुआती जीवन और फिल्मों की ओर झुकाव
हेमा मालिनी का जन्म 16 अक्टूबर 1948 को तमिलनाडु में हुआ। उनकी माँ जया चक्रवर्ती फिल्म निर्माण से जुड़ी थीं, जिससे घर में कला और सिनेमा का माहौल स्वाभाविक रूप से बना रहा। माँ की चाहत थी कि हेमा एक कुशल शास्त्रीय नृत्यांगना बनें, और इसीलिए उन्होंने बचपन से ही नृत्य की बारीकियाँ सीखनी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे उनकी डांस परफॉर्मेंस ने उन्हें स्थानीय स्तर पर पहचान दिलाई।
पहली फिल्म और वह दर्दनाक रिजेक्शन
कम उम्र में ही हेमा को तमिल फिल्म 'वेन्निरा अदाई' में काम करने का अवसर मिला। इस फिल्म का निर्देशन सीवी श्रीधर कर रहे थे। शुरुआत में हेमा का चयन हो गया और उनके कुछ शॉट्स भी शूट किए गए। लेकिन कुछ ही दिनों की शूटिंग के बाद निर्देशक ने उन्हें फिल्म से बाहर कर दिया। हेमा मालिनी के अनुसार, उन्हें बताया गया कि वह 'बहुत दुबली-पतली हैं' और कभी अभिनेत्री नहीं बन सकतीं। इतनी कम उम्र में यह सुनना उनके लिए किसी बड़े आघात से कम नहीं था।
एक इंटरव्यू में हेमा ने बताया था कि उस वक्त उन्हें खुद समझ नहीं आया कि वह मानसिक रूप से कितनी आहत हो गई थीं। उन्हें डर सताने लगा कि कहीं इस घटना की भनक लगने पर लोग उनके डांस कार्यक्रमों में आना बंद न कर दें। यह ऐसे समय की बात है जब उनका एकमात्र सहारा उनका नृत्य ही था।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
रिजेक्शन के बावजूद हेमा ने हार नहीं मानी। वर्षों के संघर्ष के बाद 1968 में उन्हें राज कपूर के साथ हिंदी फिल्म 'सपनों का सौदागर' में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म के प्रचार अभियान में ही उन्हें पहली बार 'ड्रीम गर्ल' की उपाधि दी गई, जो आगे चलकर उनकी स्थायी पहचान बन गई।
1970 में देव आनंद के साथ 'जॉनी मेरा नाम' की अपार सफलता ने हेमा को बॉलीवुड में स्थापित कर दिया। दोनों की जोड़ी दर्शकों के बीच खूब पसंद की गई।
करियर के मील के पत्थर
1972 में आई फिल्म 'सीता और गीता' हेमा मालिनी के करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने दो जुड़वां बहनों की एकदम अलग-अलग भूमिकाएँ निभाईं और अपनी कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को मोहित किया। इस बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला।
इसके बाद 'शोले', 'ड्रीम गर्ल', 'खुशबू', 'मीरा' और 'किनारा' जैसी फिल्मों ने उनकी बहुमुखी प्रतिभा को और निखारा। जहाँ 'शोले' की बसंती ने हँसाया, वहीं 'मीरा' के गंभीर किरदार ने साबित किया कि वह सिर्फ सौंदर्य नहीं, अभिनय के लिए भी जानी जाती हैं।
सिनेमा से परे: नृत्य, निर्देशन और राजनीति
हेमा मालिनी ने अपने लंबे करियर में करीब 150 फिल्मों में काम किया। अभिनय के अलावा उन्होंने शास्त्रीय नृत्य, फिल्म निर्देशन और राजनीति में भी अपनी छाप छोड़ी। वह मथुरा से लोकसभा सांसद भी हैं। गौरतलब है कि जिस कला — नृत्य — को उनकी माँ ने पहले प्राथमिकता दी, वही आगे चलकर उनकी असली पूँजी बनी और उन्हें बॉलीवुड की सबसे अनोखी अदाकाराओं में से एक बनाया।