ऋषिकेश मुखर्जी अमिताभ बच्चन को कहते थे 'महाराज', दुर्गा खोटे को मानते थे अपना लकी चार्म
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के अप्रतिम फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी ने अपने पाँच दशक लंबे करियर में आम ज़िंदगी की छोटी-बड़ी कहानियों को पर्दे पर ऐसी संजीदगी से उतारा कि 'आनंद', 'गुड्डी', 'बावर्ची', 'अभिमान', 'चुपके चुपके', 'मिली' और 'गोलमाल' जैसी फ़िल्में आज भी दर्शकों के दिलों में ज़िंदा हैं। 30 सितंबर 1922 को जन्मे ऋषिकेश दा का फ़िल्मों के प्रति नज़रिया केवल उनकी कहानियों में नहीं, बल्कि अपने कलाकारों के साथ उनके निजी रिश्तों में भी झलकता था। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया था कि वह अमिताभ बच्चन को 'महाराज' कहकर बुलाते थे और अभिनेत्री दुर्गा खोटे को अपनी फ़िल्मों का लकी चार्म मानते थे।
गणित के शिक्षक से महान फिल्मकार तक का सफर
ऋषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म निर्देशन से पहले एक लंबा और संघर्षपूर्ण रास्ता तय किया। शुरुआती दिनों में वह गणित और विज्ञान पढ़ाते थे, लेकिन उनका सपना कैमरे की दुनिया में उतरने का था। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने लैब असिस्टेंट के तौर पर फ़िल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। धीरे-धीरे वह एडिटिंग की ओर बढ़े और महान फिल्मकार बिमल रॉय के साथ काम करने का अवसर मिला, जिन्हें उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में अपना 'फिल्मी पिता' बताया था।
बिमल रॉय के साथ काम करते हुए ऋषिकेश मुखर्जी ने 'दो बीघा जमीन', 'देवदास' और 'मधुमती' जैसी कालजयी फ़िल्मों की एडिटिंग की। इसी दौरान उन्होंने फ़िल्म निर्माण की बारीकियाँ सीखीं और निर्देशन का आत्मविश्वास जुटाया।
पहली फिल्म 'मुसाफिर' और दिलीप कुमार का भरोसा
मित्र दिलीप कुमार के प्रोत्साहन पर ऋषिकेश मुखर्जी ने निर्देशन की दिशा में कदम बढ़ाया। उनकी पहली फ़िल्म 'मुसाफिर' 1957 में प्रदर्शित हुई, जिसमें एक ही घर में रहने वाले अलग-अलग परिवारों के ज़रिए जन्म, विवाह और मृत्यु — ज़िंदगी के तीन अहम पड़ावों को दर्शाया गया था। उन्होंने बाद में बताया था कि लोग उन्हें इस विषय पर फ़िल्म बनाने से रोक रहे थे, लेकिन दिलीप कुमार के भरोसे ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी। 'मुसाफिर' को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अमिताभ बच्चन, दुर्गा खोटे और खास रिश्ते
ऋषिकेश दा का अपने कलाकारों के साथ रिश्ता बेहद आत्मीय था। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह अमिताभ बच्चन को स्नेहपूर्वक 'महाराज' कहकर बुलाते थे। यह संबोधन उनके बीच के गहरे पेशेवर और व्यक्तिगत सम्मान को दर्शाता है।
जब उनसे उनकी पसंदीदा अभिनेत्री के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के दुर्गा खोटे का नाम लिया। उनका कहना था कि दुर्गा खोटे एक असाधारण कलाकार थीं और उनकी कई फ़िल्मों में काम कर चुकी थीं। ऋषिकेश दा का विश्वास था कि यदि दुर्गा खोटे उनकी फ़िल्म में हों, तो फ़िल्म अवश्य सफल होगी — वह इसे उनका आशीर्वाद मानते थे।
'आनंद' से 'गोलमाल' तक — हिंदी सिनेमा की अमर विरासत
1971 में आई 'आनंद' ने हिंदी सिनेमा में उनकी पहचान को और गहरा किया। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन अभिनीत इस फ़िल्म को दोस्ती और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण की अमर कहानी के रूप में याद किया जाता है। 'आनंद' के लिए ऋषिकेश मुखर्जी को फ़िल्मफेयर में बेस्ट स्टोरी और बेस्ट एडिटिंग के पुरस्कार मिले, साथ ही फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
इसके बाद 'बावर्ची', 'अभिमान', 'नमक हराम', 'मिली', 'चुपके चुपके', 'गोलमाल' और 'खूबसूरत' जैसी फ़िल्मों ने उनके करियर को नई ऊँचाइयाँ दीं। वह गंभीर विषयों के साथ-साथ हल्की-फुल्की कॉमेडी भी उतनी ही सहजता से बना सकते थे। उनकी फ़िल्मों में मध्यमवर्गीय परिवार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी बार-बार नज़र आती थी, क्योंकि वह इस दुनिया को सबसे करीब से समझते थे।
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और विरासत
अपने लंबे करियर में ऋषिकेश मुखर्जी ने करीब 50 फ़िल्मों का निर्देशन किया। 2000 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। अपने अंतिम वर्षों में उन्होंने टेलीविज़न की ओर भी रुख किया और 'तलाश', 'हम हिंदुस्तानी' और 'उजाले की ओर' जैसे धारावाहिकों सहित करीब 84 सीरियल एपिसोड निर्देशित किए। 1998 में 'झूठ बोले कौवा काटे' के साथ उन्होंने लंबे अंतराल के बाद फ़िल्म निर्देशन में वापसी की।
27 अगस्त 2006 को 83 वर्ष की आयु में ऋषिकेश मुखर्जी का निधन हो गया, लेकिन उनकी फ़िल्मों के किरदार और उनकी बनाई दुनिया आज भी दर्शकों के दिलों में उतनी ही ताज़ी है — यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।