ऋषिकेश मुखर्जी की पुण्यतिथि: जैकी श्रॉफ ने 'ऋषि दा' को किया भावभीना नमन
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता जैकी श्रॉफ ने 27 अगस्त 2025 को दिग्गज फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। श्रॉफ ने इंस्टाग्राम पर निर्देशक की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, 'दूरदर्शी कहानीकार, ऋषि दा को उनकी पुण्यतिथि पर दिल से याद करते हैं।' 27 अगस्त 2006 को निधन के बाद से भारतीय सिनेमा जगत हर वर्ष इस दिन उन्हें श्रद्धा से स्मरण करता है।
ऋषि दा का सिनेमाई सफ़र
कोलकाता में जन्मे ऋषिकेश मुखर्जी ने अपने करियर की नींव एक फिल्म संपादक और कैमरामैन के रूप में रखी। 1951 में वे मुंबई आए और महान फिल्मकार बिमल रॉय के सहायक निर्देशक व संपादक बने। इस दौरान उन्होंने 'दो बीघा जमीन' (1953), 'परिणीता' (1953) और 'देवदास' (1955) जैसी कालजयी फिल्मों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
निर्देशक के रूप में उभरना
बतौर निर्देशक उन्होंने 1957 में फिल्म 'मुसाफिर' से शुरुआत की, जो बॉक्स ऑफिस पर सफलता नहीं पा सकी। परंतु 1959 में राज कपूर के साथ आई 'अनाड़ी' ने उन्हें हिंदी सिनेमा में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने मध्यमवर्गीय जीवन, सादगी और मानवीय रिश्तों को केंद्र में रखकर एक के बाद एक यादगार फिल्में बनाईं।
यादगार फिल्में और विरासत
उनकी फिल्मोग्राफी में 'आनंद' (1971), 'गुड्डी' (1971), 'बावर्ची' (1972), 'अभिमान' (1973), 'चुपके-चुपके' (1975), 'गोलमाल' (1979) और 'खूबसूरत' (1980) जैसी फिल्में शामिल हैं, जो आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित हैं। उनकी फिल्मों की विशेषता यह थी कि हल्की-फुल्की कॉमेडी के आवरण में एक गहरा सामाजिक संदेश छिपा होता था।
सम्मान और व्यक्तिगत जीवन
भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण से सम्मानित किया। व्यक्तिगत जीवन में वे पशु-प्रेमी थे — मुंबई के बांद्रा स्थित उनके घर में हमेशा कई पालतू कुत्ते और बिल्लियाँ रहती थीं। जीवन के अंतिम वर्षों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते हुए वे अपने पालतू जानवरों और घरेलू सहायकों के बीच समय बिताते थे।
चार दशकों की अमर विरासत
ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके दौर में था। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब व्यावसायिक सिनेमा की भीड़ में 'ऋषि दा' जैसे संवेदनशील फिल्मकारों की याद दिलाना ज़रूरी है। उनकी कहानियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी दर्शकों से जुड़ती रही हैं और आगे भी जुड़ती रहेंगी।