ख्वाजा अहमद अब्बास: समानांतर सिनेमा के अग्रदूत जिन्होंने अमिताभ बच्चन को पहचाना
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सिनेमा के इतिहास में ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम उन विरले फिल्मकारों में शुमार है, जिन्होंने पर्दे की चकाचौंध से परे समाज के यथार्थ को कला का माध्यम बनाया। लेखक, निर्देशक, पत्रकार और विचारक के रूप में अपनी बहुआयामी पहचान बनाने वाले अब्बास ने भारतीय समानांतर सिनेमा को नई दिशा दी और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को वह कलाकार दिया जिसे आज दुनिया 'सदी का महानायक' कहती है — अमिताभ बच्चन।
जन्म, शिक्षा और पत्रकारिता की नींव
7 जून 1914 को हरियाणा के पानीपत में जन्मे ख्वाजा अहमद अब्बास का जीवन साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा के त्रिकोण पर टिका था। प्रारंभिक शिक्षा पानीपत में पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक और कानून की डिग्री हासिल की। शिक्षा पूरी होते ही उन्होंने पत्रकारिता की राह चुनी और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक कलम से पहचान बनाई।
यह ऐसे समय में आया जब भारत औपनिवेशिक शासन के अंतिम दौर में था और बौद्धिक वर्ग की आवाज़ साहित्य व पत्रकारिता के ज़रिये समाज तक पहुँच रही थी। अब्बास ने इसी धारा को सिनेमा से जोड़ा।
समानांतर सिनेमा को नई दिशा
सिनेमा की दुनिया में अब्बास का प्रवेश 1930 के दशक में हुआ। उन्होंने पटकथा लेखन से शुरुआत की और धीरे-धीरे निर्देशन की ओर कदम बढ़ाए। उनकी फिल्मों में आम लोगों का संघर्ष, सामाजिक असमानता और देश के बदलते हालात केंद्र में रहते थे — यही वजह है कि उन्हें भारतीय समानांतर सिनेमा के अग्रदूतों में गिना जाता है।
उनकी निर्देशित फिल्म 'धरती के लाल' ने इस यात्रा की नींव रखी। इसके बाद 'शहर और सपना' ने उन्हें एक संवेदनशील फिल्मकार के रूप में स्थापित किया — इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाज़ा गया। गौरतलब है कि उस दौर में व्यावसायिक सिनेमा के वर्चस्व के बीच इस तरह की सामाजिक फिल्में बनाना साहस का काम था।
'सात हिंदुस्तानी' और अमिताभ बच्चन की खोज
अब्बास की सबसे चर्चित फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' (1969) वह ऐतिहासिक कृति है जिसने भारतीय सिनेमा का भविष्य बदल दिया। नए कलाकारों की तलाश के दौरान अब्बास की नज़र एक लंबे, दुबले-पतले युवक पर पड़ी। उस समय शायद ही किसी ने अनुमान लगाया हो कि यह युवक आगे चलकर भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा नाम बनेगा — लेकिन अब्बास ने अमिताभ बच्चन में वह संभावना देख ली थी जो बाद में पूरी दुनिया ने स्वीकार की।
अमिताभ बच्चन ने बाद में कई अवसरों पर याद किया कि मुंबई में पहली मुलाकात के दौरान अब्बास ने उनसे लंबी बातचीत की और कुछ ही समय में उनकी क्षमता भाँप ली। शूटिंग के दौरान पूरी टीम एक परिवार की तरह रहती थी — सभी कलाकार साथ यात्रा करते, साथ ठहरते और समान सुविधाओं का उपयोग करते। अब्बास का दृढ़ मत था कि कलाकार को अपने किरदार और कहानी से जुड़ने के लिए ज़मीन से जुड़े रहना ज़रूरी है।
राज कपूर की फिल्मों में लेखन की छाप
अब्बास ने केवल निर्देशन तक खुद को सीमित नहीं रखा। राज कपूर की कालजयी फिल्मों — 'आवारा', 'श्री 420', 'जागते रहो', 'मेरा नाम जोकर' और 'बॉबी' — की पटकथाओं में उनके लेखन की गहरी छाप दिखती है। इन फिल्मों ने न केवल भारत बल्कि सोवियत संघ और मध्य एशिया में भी भारतीय सिनेमा की धाक जमाई।
यह वह दौर था जब भारतीय सिनेमा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान बना रहा था और अब्बास की कलम उस पहचान को धार दे रही थी।
विरासत और सम्मान
सिनेमा और समाज के प्रति उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 1 जून 1987 को उनका निधन हो गया, किंतु भारतीय सिनेमा में उनका नाम उस दूरदर्शी फिल्मकार के रूप में अमर है जिसने कला को सामाजिक दायित्व से जोड़ा। उनकी जन्म-शताब्दी के बाद भी उनकी फिल्में और लेखन नई पीढ़ी के फिल्मकारों को प्रेरणा देते हैं।