अमिताभ बच्चन को पहली मुलाकात में ही पहचान गए थे ख्वाजा अहमद अब्बास, 'सात हिंदुस्तानी' से दिलाया था बॉलीवुड में पहला ब्रेक
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय समानांतर सिनेमा के अग्रदूत ख्वाजा अहमद अब्बास की सबसे बड़ी विरासतों में से एक यह है कि उन्होंने 1969 में अपनी फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' के ज़रिए अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा में पहला मौका दिया। पहली ही मुलाकात में अब्बास साहब ने अमिताभ की प्रतिभा को भाँप लिया था और उन्हें फिल्म में शामिल कर लिया था। यह फैसला भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
पहली मुलाकात और वह ऐतिहासिक फैसला
अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू में इस मुलाकात को याद करते हुए बताया था कि जब अब्बास साहब नए चेहरों की तलाश में थे, उस वक्त वे कलकत्ता की नौकरी छोड़कर दिल्ली आए हुए थे। मुंबई के जुहू स्थित तारा रोड पर अब्बास के अपार्टमेंट में दोनों की मुलाकात हुई। अमिताभ के अनुसार, आधे घंटे की बातचीत के बाद अब्बास साहब के असिस्टेंट ने बाहर आकर बताया कि उनकी तस्वीर के साथ-साथ उनकी शैली भी पसंद आई और उन्हें फिल्म में ले लिया गया है।
शूटिंग का अनुभव: परिवार जैसा माहौल
अमिताभ बच्चन ने यह भी साझा किया था कि 'सात हिंदुस्तानी' की शूटिंग के दौरान पूरी कास्ट और क्रू एक परिवार की तरह रहे। वे थर्ड क्लास डिब्बे में सफर करते, जंगलों में सर्किट हाउस में ठहरते और सब मिलकर फर्श पर सोते थे। अब्बास साहब की सोच थी कि कलाकार को अपने किरदार के अनुसार जीवन जीना चाहिए — उन्होंने कभी किसी तरह का भेदभाव नहीं किया।
ख्वाजा अहमद अब्बास: एक बहुआयामी शख्सियत
ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पानीपत के हाली मुस्लिम हाई स्कूल में हुई और बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बी.ए. और एलएलबी की डिग्री हासिल की। करियर की शुरुआत पत्रकारिता से करने वाले अब्बास 1936 में बॉम्बे टॉकीज से जुड़े। 1941 में उन्होंने फिल्म 'नया संसार' की पटकथा लिखी और 1945 में 'धरती के लाल' का निर्देशन कर पहली बार निर्देशक की कुर्सी संभाली।
राज कपूर की फिल्मों की आत्मा
अब्बास साहब राज कपूर के सबसे प्रिय पटकथा लेखकों में से एक थे। उन्होंने 'आवारा', 'श्री 420', 'जागते रहो', 'मेरा नाम जोकर' और 'बॉबी' जैसी कालजयी फिल्मों की पटकथाएँ लिखीं। उनकी फिल्म 'शहर और सपना' ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। गौरतलब है कि उनकी कलम हमेशा आम आदमी की पीड़ा और सामाजिक सरोकारों की आवाज़ बनती रही।
विरासत जो आज भी जीवित है
1 जून 1987 को 72 वर्ष की आयु में ख्वाजा अहमद अब्बास का निधन हो गया, लेकिन उनकी फिल्में, उनका लेखन और उनकी दृष्टि आज भी भारतीय सिनेमा को दिशा देती है। अमिताभ बच्चन को उद्योग में लाने से लेकर समानांतर सिनेमा की नींव रखने तक — अब्बास साहब की भूमिका भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में अमिट है।