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ऋषिकेश मुखर्जी जयंती: वो 5 कालजयी फ़िल्में जिन्होंने हिंदी सिनेमा को नई दिशा दी

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ऋषिकेश मुखर्जी जयंती: वो 5 कालजयी फ़िल्में जिन्होंने हिंदी सिनेमा को नई दिशा दी

सारांश

30 सितंबर को ऋषिकेश मुखर्जी की जयंती है — वो निर्देशक जिन्होंने करीब 50 फ़िल्मों में आम आदमी की कहानी को सिनेमा की ज़ुबान दी। 'सत्यकाम' से 'मिली' तक, उनकी पाँच कालजयी फ़िल्में आज भी भारतीय दर्शकों के दिलों में ज़िंदा हैं।

मुख्य बातें

30 सितंबर को निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की जयंती है; उन्होंने करीब 50 फ़िल्मों का निर्देशन किया।
'सत्यकाम' (1969) और 'आनंद' (1971) दोनों को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म इन हिंदी का सम्मान मिला।
'आनंद' को फ़िल्मफ़ेयर में बेस्ट फ़िल्म, बेस्ट कहानी और बेस्ट एडिटिंग सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए।
'बावर्ची' (1972) उस साल की सबसे अधिक कमाई करने वाली फ़िल्मों में शामिल थी; इसमें राजेश खन्ना , जया भादुड़ी और ए.के.
'अभिमान' (1973) में अमिताभ बच्चन और जया बच्चन ने पति-पत्नी के अहंकार और सफलता की जटिलता को परदे पर उतारा।
'मिली' (1975) की कहानी का विचार मुखर्जी को वास्तविक जीवन की एक गंभीर बीमारी से पीड़ित लड़की से मिला था।

निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्में हिंदी सिनेमा में मध्यवर्गीय जीवन की सबसे प्रामाणिक आवाज़ रही हैं। 30 सितंबर को उनकी जयंती के अवसर पर उन पाँच फ़िल्मों की चर्चा ज़रूरी है जिन्होंने न केवल बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी दर्ज की, बल्कि भारतीय दर्शकों की सामूहिक स्मृति में स्थायी जगह बनाई। एक इंटरव्यू में मुखर्जी ने स्वयं कहा था कि वे एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे और उसी दुनिया को सबसे बेहतर समझते थे — यही उनके सिनेमा की असली ताकत थी।

करियर की पहचान: करीब 50 फ़िल्मों की विरासत

ऋषिकेश मुखर्जी ने अपने करियर में करीब 50 फ़िल्मों का निर्देशन किया। 'आनंद', 'सत्यकाम', 'बावर्ची', 'अभिमान', 'चुपके चुपके', 'मिली' और 'गोल माल' जैसी फ़िल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा का एक ऐसा स्तंभ बनाया जिसकी बराबरी आज भी मुश्किल है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा पर बड़े बजट और मसाला मनोरंजन का दबाव हावी था — मुखर्जी ने उस धारा के विरुद्ध आम आदमी की सच्ची कहानियाँ परदे पर उतारीं।

सत्यकाम (1969): सच और ईमानदारी की अटूट लड़ाई

1969 में प्रदर्शित 'सत्यकाम' में धर्मेंद्र ने सत्यप्रिय आचार्य का किरदार निभाया — एक ऐसा युवक जो हर परिस्थिति में सच और ईमानदारी के साथ जीने का संकल्प रखता है। जैसे-जैसे वह दुनिया की जटिलताओं से टकराता है, उसे अहसास होता है कि समाज उसके आदर्शों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता। मुखर्जी ने खुद बताया था कि समाज में बढ़ती नैतिक गिरावट पर उनके भीतर गहरा आक्रोश था, जिसे वे इस फ़िल्म के माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे। फ़िल्म को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म इन हिंदी का सम्मान मिला।

आनंद (1971): 'ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं'

1971 में आई 'आनंद' में राजेश खन्ना ने आनंद सहगल और अमिताभ बच्चन ने डॉक्टर भास्कर का किरदार निभाया। फ़िल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी कहती है जिसे अपनी असाध्य बीमारी का पता है, फिर भी वह हर पल को उत्सव की तरह जीता है। डॉक्टर भास्कर की जीवन और मृत्यु के प्रति गंभीर दृष्टि इस दोस्ती में धीरे-धीरे बदलती है।

'बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं' — यह संवाद आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराया जाता है। फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म इन हिंदी मिला और फ़िल्मफ़ेयर में बेस्ट फ़िल्म, बेस्ट कहानी और बेस्ट एडिटिंग सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए।

बावर्ची (1972) और अभिमान (1973): परिवार और रिश्तों की परत-दर-परत पड़ताल

1972 की 'बावर्ची' में राजेश खन्ना ने रघु का किरदार निभाया — एक ऐसा रसोइया जो एक बिखरे हुए परिवार में अपने व्यवहार और स्नेह से एकता की नई नींव रखता है। जया भादुड़ी, असरानी, ए.के. हंगल और दुर्गा खोटे जैसे दिग्गज कलाकारों ने इसे और समृद्ध किया। यह फ़िल्म उस साल की सबसे अधिक कमाई करने वाली फ़िल्मों में शामिल रही।

1973 की 'अभिमान' में अमिताभ बच्चन और जया बच्चन ने एक ऐसे दंपती की भूमिका निभाई जहाँ पत्नी की लोकप्रियता पति के अहंकार को चुनौती देती है। पति-पत्नी के बीच सफलता और बराबरी से उपजे तनाव को मुखर्जी ने बेहद संयत और मार्मिक तरीके से दर्शाया — यह विषय उस दौर के हिंदी सिनेमा में बेहद विरल था।

मिली (1975): बीमारी के बीच उम्मीद की रोशनी

1975 की 'मिली' में जया बच्चन ने एक ऐसी खुशमिजाज़ लड़की का किरदार निभाया जो गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी अपने आसपास के लोगों में खुशियाँ बाँटती है। अमिताभ बच्चन भी महत्त्वपूर्ण भूमिका में थे। मुखर्जी ने बताया था कि इस कहानी का विचार उन्हें वास्तविक जीवन की एक ऐसी लड़की की कहानी से मिला था जो इसी तरह की बीमारी से पीड़ित थी। फ़िल्म में बीमारी, प्यार और उम्मीद को जिस सहजता से पिरोया गया, वह मुखर्जी की कथा-दृष्टि की मिसाल है।

ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमाई योगदान महज़ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा — उन्होंने दर्शकों को अपने ही जीवन का आईना दिखाया। उनकी फ़िल्में आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह आज के OTT युग की कहानियों का अग्रदूत था। दिलचस्प यह भी है कि उनकी सबसे बड़ी व्यावसायिक और पुरस्कार-प्राप्त फ़िल्में एक ही दशक — 1969 से 1975 — में सिमटी हैं, जो यह सवाल उठाता है कि क्या उस खास सामाजिक-सांस्कृतिक जलवायु ने उनकी रचनात्मकता को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया था।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऋषिकेश मुखर्जी की जयंती कब है?
ऋषिकेश मुखर्जी की जयंती 30 सितंबर को मनाई जाती है। वे भारतीय हिंदी सिनेमा के उन दिग्गज निर्देशकों में से हैं जिन्होंने मध्यवर्गीय जीवन को परदे पर सबसे प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत किया।
ऋषिकेश मुखर्जी की सबसे प्रसिद्ध फ़िल्में कौन-सी हैं?
'आनंद' (1971), 'सत्यकाम' (1969), 'बावर्ची' (1972), 'अभिमान' (1973) और 'मिली' (1975) उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्मों में गिनी जाती हैं। इनके अलावा 'चुपके चुपके' और 'गोल माल' भी उनकी कालजयी रचनाएँ हैं।
क्या ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं?
हाँ, 'सत्यकाम' (1969) और 'आनंद' (1971) दोनों को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म इन हिंदी का सम्मान मिला। 'आनंद' को फ़िल्मफ़ेयर में बेस्ट फ़िल्म, बेस्ट कहानी और बेस्ट एडिटिंग सहित कई अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए।
'आनंद' फ़िल्म किस विषय पर आधारित है?
'आनंद' (1971) एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो असाध्य बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद ज़िंदगी के हर पल को खुशी से जीता है। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जोड़ी और 'बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं' जैसे संवाद इसे अमर बनाते हैं।
'अभिमान' फ़िल्म में क्या संदेश दिया गया है?
'अभिमान' (1973) पति-पत्नी के बीच सफलता और बराबरी को लेकर उभरने वाले तनाव की कहानी है। जब पत्नी उमा की लोकप्रियता पति सुबीर से अधिक हो जाती है, तो अहंकार उनके रिश्ते को तोड़ने लगता है — मुखर्जी ने इस विषय को उस दौर में बेहद संवेदनशीलता से उठाया था।
राष्ट्र प्रेस
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