जगजीत सिंह पुण्यतिथि: गज़ल सम्राट ने कुमार सानू को दिया था पहला मंच, बदल दी थी किस्मत
सारांश
मुख्य बातें
गज़ल सम्राट जगजीत सिंह की आज 10 अक्टूबर 2026 को 15वीं पुण्यतिथि है। मुंबई में 10 अक्टूबर 2011 को 70 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली थी। उनकी विरासत आज भी उतनी ही जीवंत है — और उनके व्यक्तित्व का एक कम चर्चित पहलू यह है कि उन्होंने कई उभरते गायकों को बॉलीवुड की दुनिया में प्रवेश का रास्ता दिखाया, जिनमें सबसे उल्लेखनीय नाम है 90 के दशक के स्टार गायक कुमार सानू।
स्टूडियो में हुई वह ऐतिहासिक मुलाकात
कुमार सानू मुंबई में अपने संघर्ष के शुरुआती दिनों में होटलों और रेस्टोरेंट में गाकर गुज़ारा करते थे। एक दिन वे मुंबई के एक स्टूडियो में किशोर कुमार के गाने रिकॉर्ड कर रहे थे। संयोग से उसी इमारत के पास के स्टूडियो में जगजीत सिंह अपनी रिकॉर्डिंग में व्यस्त थे। उन्होंने सानू की आवाज़ सुनी और तत्काल प्रभावित हो गए।
जगजीत सिंह ने सानू को अगले दिन अपने घर बुलाया। वहाँ सानू ने किशोर कुमार का क्लासिक गाना 'मेरे सामने वाली खिड़की में' सुनाया। जगजीत सिंह ने उसी क्षण उन्हें एक नया गाना सीखने को दिया और दो दिन बाद होने वाले एक शो में शामिल होने का न्योता दिया।
मंच पर वह ऐतिहासिक 'पहला चांस'
कुमार सानू ने स्वयं इस किस्से का ज़िक्र द कपिल शर्मा शो के सीजन 2 में किया था। उन्होंने बताया था, 'जगजीत सिंह ने मुझे अपने घर पर कहा था कि परसों एक शो है, तुम वहाँ आ जाओ। वहाँ से शुरू करते हैं, देखते हैं तुम कैसे गाते हो। उस वक्त तो मैं एकदम से डर गया।'
सानू ने आगे बताया था, 'स्टेज पर जाकर जगजीत सिंह कहते हैं कि कोलकाता से आया हुआ एक लड़का है सानू, इसको हम पहला चांस दे रहे हैं। अगर आप लोगों ने पास कर दिया तो ये पास हो जाएगा, नहीं तो ये फेल हो जाएगा। मैं स्टेज पर गया, सुर देने को बोला और जैसे ही मैंने गाना शुरू किया तो सारे लोग वहाँ खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे।'
उस शो के बाद जगजीत सिंह सानू को अपनी कार में बैठाकर फेमस स्टूडियो ले गए, वहाँ उनका गाना रिकॉर्ड कराया, अपनी जेब से ₹1,500 दिए और फिर मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी से मिलवाया। यहीं से कुमार सानू के लिए बॉलीवुड के दरवाज़े खुले।
जगजीत सिंह की अपनी संघर्षगाथा
जगजीत सिंह का सफ़र भी आसान नहीं था। उन्होंने पंडित छगनलाल शर्मा और उस्ताद जमाल खान से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली। करियर की शुरुआत उन्होंने 1961 में जालंधर में ऑल इंडिया रेडियो से की, जिसके बाद जिंगल्स और प्लेबैक संगीत की तलाश में बॉम्बे आ गए।
उन्होंने गज़ल को एलीट महफिलों की सीमाओं से मुक्त कर आम जनमानस तक पहुँचाया। उनका 'बोल-प्रधान' अंदाज़ — जिसमें शब्दों की स्पष्टता, गहरी भावनाएँ और मधुर धुनें एकाकार होती थीं — लोगों के दिलों में उतर गया। पत्नी चित्रा सिंह के साथ 1970 और 1980 के दशक में उन्होंने एक यादगार गायक जोड़ी बनाई।
तकनीक और परंपरा का अनूठा संगम
1976 में आया उनका एल्बम 'द अनफॉरगेटेबल्स' एक बड़ा मील का पत्थर था। 1987 में उन्होंने भारत की पहली डिजिटली रिकॉर्डेड ऑडियो सीडी 'बियॉन्ड टाइम' रिलीज़ की और गज़ल उत्पादन में आधुनिक मल्टी-ट्रैकिंग तकनीक की नींव रखी। उन्होंने 'अर्थ' (1982), 'साथ साथ' (1982), 'प्रेम गीत' (1981) जैसी फिल्मों और क्लासिक टीवी श्रृंखला 'मिर्जा गालिब' (1988) के लिए संगीत दिया।
सम्मान और विरासत
2003 में उन्हें भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाज़ा गया। मिर्जा गालिब की रचनाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 2012 में राजस्थान सरकार ने उन्हें मरणोपरांत राजस्थान रत्न से सम्मानित किया। 2014 में भारतीय डाक ने उन पर डाक टिकट जारी किया और 2013 में उनके 72वें जन्मदिन पर गूगल ने उनके सम्मान में डूडल बनाया।
उनकी अमर गज़लें — 'तुमको देखा तो ये ख्याल आया', 'वो कागज़ की कश्ती', 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो', 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी' और 'चिट्ठी ना कोई संदेश' — आज भी करोड़ों दिलों की धड़कन हैं। जगजीत सिंह की पुण्यतिथि पर उनकी यह विरासत हमें याद दिलाती है कि असली कलाकार वह होता है जो न केवल खुद चमकता है, बल्कि दूसरों को भी रोशनी देता है।