जितेंद्र के करियर को नया मोड़ देने वाली फ़िल्म, 'परिचय': 'जंपिंग जैक' की छवि को तोड़ने में मिली सफलता
सारांश
Key Takeaways
- जितेंद्र का असली नाम रवि कुमार है।
- फ़िल्म 'परिचय' ने उन्हें गंभीर कलाकार के रूप में स्थापित किया।
- उन्होंने 200 से अधिक फ़िल्में की हैं।
- गुलज़ार ने उनके अभिनय में नया मोड़ दिया।
- जितेंद्र का जन्मदिन 7 अप्रैल को है।
मुंबई, 6 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सिनेमा में कुछ ऐसे अदाकार हैं, जिन्होंने न केवल बड़े पर्दे पर जादू बिखेरा है, बल्कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की दिशा को भी बदलकर रख दिया है।
इन अदाकारों में से एक हैं जितेंद्र, जिनका असली नाम रवि कुमार है। उन्होंने फ़िल्मों में करियर बनाने के लिए अपना नाम बदला। जितेंद्र ने अपने करियर में 200 से अधिक फ़िल्में कीं, लेकिन उन्हें 1972 में फ़िल्म 'परिचय' से जो सफलता मिली, वह किसी और फ़िल्म में नहीं मिल पाई। इसी फ़िल्म ने उनके फ़िल्मी करियर को नई दिशा दी। अभिनेता 7 अप्रैल को अपना जन्मदिन मना रहे हैं।
गुलज़ार द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'परिचय', जो 1972 में आई, ने सुपरस्टार जितेंद्र के लिए एक नई संजीवनी का काम किया। जब उन्होंने अपनी 'जंपिंग जैक' की छवि को छोड़ते हुए चश्मा पहनकर गंभीरता से अभिनय किया, तो दर्शकों ने उन्हें एक नए रूप में देखा। 'मुसाफिर हूँ यारों' जैसे गानों पर थिरकते हुए और सादगी भरे रवि के किरदार में, जितेंद्र ने यह साबित किया कि वे केवल एक सितारे नहीं, बल्कि एक कुशल कलाकार भी हैं।
'परिचय' जितेंद्र के लिए आसान नहीं था, क्योंकि फ़िल्म इंडस्ट्री में उनके बारे में धारणा थी कि वे केवल अच्छा नृत्य करते हैं और गंभीर अभिनय उनके लिए मुश्किल है। जब गुलज़ार ने उन्हें 'परिचय' के लिए साइन किया, तो कई लोगों ने कहा, "जितेंद्र लकड़ी के लट्ठे जैसे हैं," जिसका मतलब था सीधे और भावहीन। खुद जितेंद्र को भी यह चिंता थी कि वे फ़िल्म के लिए खुद को कैसे तैयार करेंगे, लेकिन उन्होंने बंद कमरे में आँखों और चेहरे के साथ संवाद करने का अभ्यास किया।
कहा जाता है कि गुलज़ार ने उन्हें बिना डायलॉग के केवल आँखों और चेहरे के भावों से संवाद करने के लिए कहा था, जिससे उनके चेहरे पर भावनाएँ उभर सकें। इस तकनीक ने काम किया और फ़िल्म में जितेंद्र का किरदार, जो सफेद कुर्ते और पतली मूछों में था, दर्शकों को अपना दीवाना बना दिया। यह फ़िल्म एक क्लासिक फैमिली ड्रामा बन गई और साल की सबसे सफल फ़िल्मों में शामिल हुई।
1972 से पहले भी जितेंद्र की फ़िल्में पसंद की जाती थीं, लेकिन उन फ़िल्मों में उनका किरदार अक्सर मनचले लड़के का होता था, जो सफेद जूतों में ऊर्जा के साथ नृत्य करता था। उनकी पहली फ़िल्म 'गीत गाया पत्थरों ने', 'फर्ज', और 'हमजोली' में उनके किरदार एक जैसे थे, लेकिन 'परिचय' ने उनके जीवन को नया परिचय दे दिया।