गीतकार अनजान की पुण्यतिथि: 'खइके पान बनारस वाला' लिखने से पहले ट्यूशन पढ़ाकर काटी थीं रातें
सारांश
मुख्य बातें
बॉलीवुड के स्वर्णिम युग के महान गीतकार अनजान — जिनका असली नाम लालजी पांडेय था — की आज 13 सितंबर को पुण्यतिथि है। 28 अक्टूबर 1930 को वाराणसी के निकट ओदार गाँव में जन्मे अनजान ने 1,500 से अधिक गीत और 300 से ज़्यादा फ़िल्मों में अपनी कलम का जादू बिखेरा। 13 सितंबर 1997 को उनके निधन के साथ हिंदी सिनेमा ने एक ऐसा स्वर खो दिया जिसमें बनारस की मिट्टी और आम जन की भाषा का अनूठा संगम था।
बनारस से मुंबई तक: संघर्ष की दास्तान
अनजान के पिता का नाम शिवनाथ पांडेय और माता का नाम इंदिरा देवी था। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से एम.कॉम की डिग्री हासिल की। बचपन से कविता-शायरी का शौक रखने वाले लालजी की रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं, और दोस्तों ने ही उन्हें 'अनजान' की उपाधि दी।
बनारस के एक होटल में आयोजित संगीत समारोह में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध गायक मुकेश से हुई। मुकेश ने उनकी रचनाएँ सुनकर कहा कि उन्हें मुंबई में होना चाहिए। इस प्रेरणा के बाद अनजान 1951 में मुंबई पहुँचे।
मुश्किल दौर: ट्यूशन और रेलवे की सीढ़ियाँ
मुंबई में शुरुआती दौर बेहद कठिन रहा। फ़िल्मों में काम न मिलने पर अनजान बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपना गुज़ारा करते थे। रातें कभी लोकल ट्रेन में तो कभी किसी अपार्टमेंट की सीढ़ियों के नीचे बिताते थे। इस जद्दोजहद के बीच छोटी फ़िल्मों में काम मिला, लेकिन पहचान नहीं।
1953 में उन्होंने प्रेमनाथ प्रोडक्शन की फ़िल्म 'प्रिज़नर ऑफ़ गोलकुंडा' के लिए 'लहर ये डोले कोयल बोले' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी' लिखे। 1960 के दशक में जी.एस. कोहली के साथ फ़िल्म 'लंबे हाथ' का गाना 'मत पूछ मेरा है मेरा कौन वतन' लोकप्रिय हुआ।
सफलता की असली दस्तक आई 1963 में, जब पंडित रविशंकर के संगीत से सजी फ़िल्म 'गोदान' के गीत 'चली आज गोरी पिया की नगरिया' ने उन्हें पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अमिताभ बच्चन की फ़िल्में और शोहरत की बुलंदी
अनजान को सर्वाधिक प्रसिद्धि अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों से मिली। फ़िल्म 'डॉन' का 'खइके पान बनारस वाला', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस' और 'रोटी कपड़ा और मकान' के कालजयी गीतों ने 70-80 के दशक में हिंदी सिनेमा के संगीत को नया आयाम दिया।
उन्होंने ओ.पी. नैयर के साथ 'बहारे फिर भी आईं' में 'आप के हसीन रुख', जी.पी. सिप्पी की 'बंधन' में 'बिना बादरा के बिजुरिया कैसे बरसे' जैसे गीत लिखे। कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन और बप्पी लहरी जैसे शीर्ष संगीतकारों के साथ उनकी जोड़ी ने एक के बाद एक हिट गीत दिए।
1970 के दशक में अनजान ने भोजपुरी फ़िल्मों के लिए भी कलम चलाई। 'बलम परदेसिया' का 'गोरकी पतरकी रे' इसी दौर की देन है।
बनारस की मिट्टी, गीतों में जीवंत
उनके पुत्र, गीतकार समीर अंजान, के अनुसार उनके पिता की कविता में हमेशा भोजपुरी भाषा का रंग और उत्तर प्रदेश की संस्कृति का लोकाचार झलकता था। यही कारण था कि वे 'खाईके पान', 'बिना बदरा के बिजुरिया' जैसे गीत इतनी कुशलता से लिख सके।
अनजान के अपने पसंदीदा गीतों में 'अपने रंग हज़ार' और 'बदलते रिश्ते' के गीत शामिल थे, साथ ही 'गंगा की सौगंध' के 'मानो तो मैं गंगा मां हूँ मानो तो बहता पानी' और 'चल मुसाफिर' उन्हें विशेष प्रिय थे।
अंतिम कृति और विरासत
13 सितंबर 1997 को अपने निधन से कुछ महीने पूर्व, उनका एकमात्र कविता संग्रह 'गंगा तथा का बंजारा' (गंगा के किनारे का एक घुमंतू) का विमोचन स्वयं अमिताभ बच्चन के हाथों हुआ — यह एक ऐसा प्रतीकात्मक क्षण था जो अनजान की पूरी यात्रा को समेटता था: बनारस से मुंबई, संघर्ष से शोहरत तक।
उनके पुत्र समीर अंजान ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाते हुए हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। अनजान का गीत-संसार आज भी हिंदी सिनेमा की आत्मा में बसा है।