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गीतकार अनजान की पुण्यतिथि: 'खइके पान बनारस वाला' लिखने से पहले ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारी थी ज़िंदगी

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गीतकार अनजान की पुण्यतिथि: 'खइके पान बनारस वाला' लिखने से पहले ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारी थी ज़िंदगी

सारांश

बनारस के ओदार गाँव से मुंबई की लोकल ट्रेन में रातें गुज़ारने तक — गीतकार अनजान का सफर सिर्फ फिल्मी नहीं, इंसानी हौसले की दास्तान है। 1500 से ज़्यादा गीत, 300 से अधिक फिल्में, और 'खइके पान बनारस वाला' जैसी अमर रचनाएँ — 13 सितंबर उस कलम को याद करने का दिन है।

मुख्य बातें

गीतकार अनजान का असली नाम लालजी पांडेय था; जन्म 28 अक्टूबर 1930 को वाराणसी के पास ओदार गाँव में हुआ।
मुंबई पहुँचने पर काम न मिलने पर वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे और लोकल ट्रेन व सीढ़ियों के नीचे रातें गुज़ारते थे।
सफलता मिलने में करीब 20 साल लगे; 1963 में फिल्म 'गोदान' के गीत से असली पहचान मिली।
अमिताभ बच्चन की फिल्मों — 'डॉन', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस' — के गीतों ने उन्हें शीर्ष पर पहुँचाया।
300 से अधिक फिल्मों के लिए 1500 से ज़्यादा गीत लिखे; गीतकार समीर अंजान उनके बेटे हैं।
13 सितंबर 1997 को निधन; निधन से पहले कविता-संग्रह 'गंगा तथा का बंजारा' का विमोचन अमिताभ बच्चन ने किया।

बॉलीवुड के स्वर्णिम युग के महान गीतकार अनजान — जिनका असली नाम लालजी पांडेय था — ने अपनी सरल, मिट्टी से जुड़ी भाषा से हिंदी सिनेमा के संगीत को एक अलग पहचान दी। 13 सितंबर 1997 को उनके निधन के बाद से हर साल यह तारीख उस आवाज़ की याद दिलाती है, जिसने 'खइके पान बनारस वाला' जैसे गीतों से करोड़ों दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। बनारस के एक छोटे से गाँव से मुंबई के फिल्मी दुनिया तक का उनका सफर संघर्ष, धैर्य और अटूट लगन की कहानी है।

वाराणसी से मुंबई तक का सफर

28 अक्टूबर 1930 को वाराणसी के निकट ओदार गाँव में पिता शिवनाथ पांडेय और माता इंदिरा देवी के घर जन्मे लालजी पांडेय को बचपन से ही कविता और शायरी का गहरा शौक था। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से एम.कॉम की डिग्री हासिल की। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ छपने लगीं और उनके दोस्तों ने ही उन्हें 'अनजान' नाम दिया, जो आगे चलकर उनकी असली पहचान बन गया।

बनारस के एक होटल में एक संगीत समारोह के दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध गायक मुकेश से हुई। मुकेश ने उनकी रचनाएँ सुनकर कहा कि उन्हें मुंबई में होना चाहिए। इस प्रोत्साहन ने अनजान को 1951 में मुंबई जाने पर प्रेरित किया।

संघर्ष के वे मुश्किल बरस

मुंबई में शुरुआती दौर बेहद कठिन रहा। फिल्मों में काम न मिलने के कारण अनजान बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारा करते थे। रातें कभी लोकल ट्रेन में तो कभी अपार्टमेंट की सीढ़ियों के नीचे बितानी पड़ती थीं। 1953 में प्रेमनाथ प्रोडक्शन की फिल्म 'प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा' के लिए उन्होंने 'लहर ये डोले कोयल बोले' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी' जैसे गीत लिखे, लेकिन व्यापक पहचान मिलने में करीब 20 साल और लगे।

इस बीच छोटी फिल्मों और नॉन-फिल्म एल्बमों के लिए लिखते रहे। 1960 के दशक में जी.एस. कोहली के साथ फिल्म 'लंबे हाथ' का गाना 'मत पूछ मेरा है मेरा कौन वतन' लोकप्रिय हुआ। असली मोड़ आया 1963 में जब पंडित रविशंकर के संगीत से सजी फिल्म 'गोदान' का गीत 'चली आज गोरी पिया की नगरिया' ने उन्हें एक नई पहचान दिलाई।

संगीतकारों की पहली पसंद बने अनजान

प्रसिद्धि मिलने के बाद अनजान ने ओ.पी. नैयर के साथ 'बहारे फिर भी आईं' में 'आप के हसीन रुख' और जी.पी. सिप्पी की फिल्म 'बंधन' में 'बिना बादरा के बिजुरिया कैसे बरसे' जैसे गीत लिखे। धीरे-धीरे वे कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन और बप्पी लहरी जैसे दिग्गज संगीतकारों की पहली पसंद बन गए।

1970 के दशक में उन्होंने भोजपुरी फिल्मों की ओर भी रुख किया। फिल्म 'बलम परदेसिया' का 'गोरकी पतरकी रे' उस दौर का सुपरहिट गाना बना।

अमिताभ बच्चन की फिल्मों ने दिलाई शीर्ष पहचान

अनजान को सर्वाधिक प्रसिद्धि अमिताभ बच्चन की फिल्मों से मिली। 'डॉन' का 'खइके पान बनारस वाला', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस' और 'रोटी कपड़ा और मकान' जैसी फिल्मों के कालजयी गीतों ने 1970-80 के दशक में हिंदी सिनेमा के संगीत को नया आयाम दिया। अपने करियर में उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों के लिए 1500 से ज़्यादा गीत लिखे।

उनके बेटे और जाने-माने गीतकार समीर अंजान के अनुसार, अनजान के गीतों में भोजपुरी भाषा का रंग और उत्तर प्रदेश की लोक-संस्कृति की झलक हमेशा बनी रही, जो उन्हें भीड़ से अलग करती थी। अनजान के अपने पसंदीदा गीतों में 'अपने रंग हज़ार', 'मानो तो मैं गंगा माँ हूँ मानो तो बहता पानी' और 'चल मुसाफिर' ('गंगा की सौगंध') शामिल थे।

13 सितंबर 1997 को उनके निधन से कुछ महीने पहले उनके एकमात्र कविता-संग्रह 'गंगा तथा का बंजारा' का विमोचन स्वयं अमिताभ बच्चन के हाथों हुआ था — एक ऐसी साहित्यिक विरासत जो उनके गीतों से भी गहरी थी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस पूरी पीढ़ी की कहानी है जिसने हिंदी सिनेमा को साहित्यिक गहराई दी — बिना किसी 'फिल्मी परिवार' की पृष्ठभूमि के। आज जब बॉलीवुड में गीतकारों की भूमिका सिकुड़ती जा रही है और 'लिरिक्स' की जगह 'बीट' ले रही है, तब अनजान जैसे रचनाकारों को याद करना केवल भावुकता नहीं — यह यह समझने की ज़रूरत है कि लोक-भाषा और सांस्कृतिक जड़ें किस तरह संगीत को सार्वकालिक बनाती हैं। बेटे समीर अंजान की सफलता यह भी बताती है कि वह विरासत जीवित है — पर क्या उसी गहराई के साथ, यह बहस का विषय है।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीतकार अनजान कौन थे?
अनजान का असली नाम लालजी पांडेय था, जो वाराणसी के पास ओदार गाँव में 28 अक्टूबर 1930 को जन्मे थे। उन्होंने 300 से अधिक हिंदी फिल्मों के लिए 1500 से ज़्यादा गीत लिखे और 'खइके पान बनारस वाला' जैसी अमर रचनाओं से हिंदी सिनेमा में विशेष स्थान हासिल किया।
अनजान की मृत्यु कब हुई थी?
गीतकार अनजान का निधन 13 सितंबर 1997 को हुआ था। उनके निधन से कुछ महीने पहले उनके एकमात्र कविता-संग्रह 'गंगा तथा का बंजारा' का विमोचन अमिताभ बच्चन ने किया था।
अनजान ने मुंबई में संघर्ष के दौरान क्या किया?
1951 में मुंबई आने के बाद शुरुआती वर्षों में फिल्मों में काम न मिलने पर अनजान बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारा करते थे। रातें कभी लोकल ट्रेन में तो कभी अपार्टमेंट की सीढ़ियों के नीचे गुज़ारनी पड़ती थीं।
अनजान के सबसे प्रसिद्ध गीत कौन-से हैं?
अनजान के सबसे प्रसिद्ध गीतों में 'डॉन' का 'खइके पान बनारस वाला', 'बहारे फिर भी आईं' का 'आप के हसीन रुख', 'गोदान' का 'चली आज गोरी पिया की नगरिया' और 'गंगा की सौगंध' का 'मानो तो मैं गंगा माँ हूँ' शामिल हैं। अमिताभ बच्चन की फिल्मों के उनके गीत विशेष रूप से लोकप्रिय हुए।
गीतकार समीर अंजान का अनजान से क्या संबंध है?
जाने-माने बॉलीवुड गीतकार समीर अंजान, अनजान (लालजी पांडेय) के बेटे हैं। समीर के अनुसार, उनके पिता के गीतों में भोजपुरी भाषा और उत्तर प्रदेश की लोक-संस्कृति की झलक ही उन्हें अनूठा बनाती थी।
राष्ट्र प्रेस
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