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गैराज से ऑस्कर तक: गुलजार की संघर्ष-गाथा, जिन्होंने बिना फिल्मी पृष्ठभूमि के जीता ज्ञानपीठ

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गैराज से ऑस्कर तक: गुलजार की संघर्ष-गाथा, जिन्होंने बिना फिल्मी पृष्ठभूमि के जीता ज्ञानपीठ

सारांश

न फिल्मी परिवार, न पैसा — सिर्फ कलम और जिद। मुंबई की गैराज से ऑस्कर मंच तक पहुँचने वाले गुलजार की कहानी बताती है कि एक सही पहचानने वाली नज़र पूरी जिंदगी पलट सकती है। 'जय हो' से दुनिया को और ज्ञानपीठ से साहित्य को जीतने वाले इस शायर का असली नाम संपूरण सिंह कालरा है।

मुख्य बातें

गुलजार का जन्म 18 अगस्त 1934 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के दीना (अब पाकिस्तान) में हुआ; असली नाम संपूरण सिंह कालरा ।
मुंबई में आजीविका के लिए मोटर गैराज में कारों पर पेंट करते थे; निर्देशक बिमल रॉय ने प्रतिभा पहचानकर फिल्म जगत में लाया।
साल 1963 में फिल्म 'बंदिनी' से गीतकार के रूप में पदार्पण; गीत 'मोरा गोरा अंग लई ले' को लता मंगेशकर ने गाया।
रहमान के साथ 'जय हो' के लिए ऑस्कर और अगले वर्ष ग्रैमी पुरस्कार जीता।
साहित्य अकादमी ( 2002 ), पद्म भूषण ( 2004 ), दादा साहेब फाल्के ( 2013 ) और ज्ञानपीठ पुरस्कार (2024) से सम्मानित।
बेटी मेघना गुलजार आज एक स्थापित फिल्म निर्देशक हैं।

मशहूर गीतकार, निर्देशक और शायर गुलजार का सफर हिंदी सिनेमा के इतिहास में उन दुर्लभ यात्राओं में से एक है, जो किसी फिल्मी घराने की सीढ़ी के बिना, केवल प्रतिभा और जिद के बल पर तय हुई। मुंबई की एक मोटर गैराज में कारों पर रंग पोतने वाले इस शख्स ने आगे चलकर ऑस्कर, ग्रैमी, दादा साहेब फाल्के और ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसे सर्वोच्च सम्मान अपने नाम किए।

संघर्ष के शुरुआती दिन

गुलजार का जन्म 18 अगस्त 1934 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के दीना इलाके में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका असली नाम संपूरण सिंह कालरा है। भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी ने उन्हें परिवार से बिछड़ने पर मजबूर किया और एक कठिन दौर से गुज़रना पड़ा। मुंबई पहुँचने के बाद रोज़ी-रोटी के लिए उन्होंने एक मोटर गैराज में काम किया, जहाँ वे कारों पर पेंट करते थे। आर्थिक तंगी के बावजूद पढ़ने और लिखने का जुनून उनसे कभी अलग नहीं हुआ।

बिमल रॉय से मुलाकात — एक निर्णायक मोड़

गुलजार की मुलाकात गीतकार शैलेंद्र के माध्यम से प्रख्यात निर्देशक बिमल रॉय से हुई, जो उस समय फिल्म 'बंदिनी' पर काम कर रहे थे। बिमल रॉय ने गुलजार की लेखन-प्रतिभा को पहचाना और उन्हें गैराज छोड़ने के लिए प्रेरित किया। गुलजार ने बाद में एक साक्षात्कार में बिमल रॉय की वह बात याद की थी, जिसमें उन्होंने कहा था — 'गैराज में वापस मत जाओ, अपनी जिंदगी बर्बाद मत करो।' यह वाक्य उनके जीवन का मोड़ बन गया, क्योंकि पहली बार किसी बड़े फिल्मकार ने उनके भीतर के रचनाकार को स्वीकार किया था।

बॉलीवुड में पहचान और फिल्मी करियर

साल 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म 'बंदिनी' से गुलजार ने गीतकार के रूप में अपना पहला कदम रखा। संगीतकार एस.डी. बर्मन के साथ बनी इस फिल्म के लिए उन्होंने 'मोरा गोरा अंग लई ले' गीत लिखा, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया। यह गीत आज भी हिंदी संगीत के क्लासिक्स में गिना जाता है।

गीतकार के रूप में स्थापित होने के बाद गुलजार ने पटकथा और संवाद लेखन भी किया। साल 1971 में फिल्म 'मेरे अपने' से उन्होंने निर्देशन में कदम रखा। इसके बाद 'कोशिश', 'अचानक', 'मौसम', 'आंधी', 'खुशबू', 'किताब' और 'नमकीन' जैसी फिल्मों के ज़रिए उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक अलग और संवेदनशील धारा की नींव रखी। उनकी फिल्मों में रिश्तों की जटिलता, अकेलेपन की पीड़ा और आम जीवन की बारीक भावनाओं को प्रमुखता से उकेरा गया।

ऑस्कर और ग्रैमी — वैश्विक पहचान

गुलजार की कलम का जादू केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के लिए संगीतकार ए.आर. रहमान के साथ मिलकर लिखे गए गीत 'जय हो' ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया। इस गीत के लिए गुलजार और रहमान ने 2009 में ऑस्कर पुरस्कार जीता। अगले वर्ष इसी गीत को ग्रैमी अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया — यह उपलब्धि हिंदी सिनेमा के किसी गीतकार के लिए विरल है।

पुरस्कार और साहित्यिक सम्मान

गुलजार की उपलब्धियाँ फिल्म जगत से कहीं आगे तक फैली हैं। उन्हें 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में पद्म भूषण और 2013 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया। साल 2024 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों में से एक ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी उन्हें विभूषित किया गया। इसके अलावा उनके नाम कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार भी दर्ज हैं।

उनकी बेटी मेघना गुलजार आज खुद एक सफल फिल्म निर्देशक हैं, जो यह दर्शाता है कि गुलजार की विरासत अगली पीढ़ी में भी जीवित है। यह गाथा इस बात का प्रमाण है कि रचनात्मक प्रतिभा को पहचानने वाली एक नज़र पूरी जिंदगी बदल सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो प्रतिभा को तब तक नहीं पहचानती जब तक कोई 'बड़ा नाम' उसे प्रमाणित न करे। बिमल रॉय की एक नज़र न होती, तो शायद हिंदी सिनेमा को यह कलम कभी नहीं मिलती। यह उन हज़ारों प्रतिभाओं की याद दिलाता है जो आज भी किसी 'बिमल रॉय' के इंतज़ार में हैं। विभाजन की पीड़ा से जन्मी यह कलम जब ऑस्कर और ज्ञानपीठ तक पहुँचती है, तो यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं — यह भारतीय सांस्कृतिक लचीलेपन का प्रमाण है।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुलजार का असली नाम क्या है और उनका जन्म कहाँ हुआ था?
गुलजार का असली नाम संपूरण सिंह कालरा है। उनका जन्म 18 अगस्त 1934 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के दीना इलाके में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वे परिवार से बिछड़ गए और मुंबई आ गए।
गुलजार ने बॉलीवुड में करियर कैसे शुरू किया?
गुलजार मुंबई में एक मोटर गैराज में कारों पर पेंट करते थे। गीतकार शैलेंद्र के ज़रिए उनकी मुलाकात निर्देशक बिमल रॉय से हुई, जिन्होंने उनकी प्रतिभा पहचानी और गैराज छोड़ने को कहा। इसके बाद 1963 में फिल्म 'बंदिनी' से उन्होंने गीतकार के रूप में पदार्पण किया।
गुलजार को ऑस्कर पुरस्कार किस गीत के लिए मिला?
गुलजार को 2009 में फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के गीत 'जय हो' के लिए ए.आर. रहमान के साथ ऑस्कर पुरस्कार मिला। अगले वर्ष इसी गीत को ग्रैमी अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया।
गुलजार को ज्ञानपीठ पुरस्कार कब मिला?
गुलजार को साल 2024 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों में से एक ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इससे पहले उन्हें 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में पद्म भूषण और 2013 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
गुलजार ने निर्देशक के रूप में कौन-सी फिल्में बनाईं?
गुलजार ने 1971 में 'मेरे अपने' से निर्देशन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने 'कोशिश', 'अचानक', 'मौसम', 'आंधी', 'खुशबू', 'किताब' और 'नमकीन' जैसी फिल्में बनाईं, जो रिश्तों और आम जीवन की भावनाओं को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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