फिराक गोरखपुरी: ICS छोड़ी, जेल काटी, फिर बने उर्दू के पहले ज्ञानपीठ विजेता
सारांश
मुख्य बातें
फिराक गोरखपुरी — असली नाम रघुपति सहाय — उर्दू शायरी के उस नक्षत्र का नाम है जिसने गजल को महज़ रोमानियत की विधा से उठाकर इंसानी संवेदनाओं का आईना बना दिया। 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे फिराक की जिंदगी शायरी के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम, जेल और शिक्षा के लंबे सफर से गुज़री। वह उर्दू साहित्य के पहले भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बने — एक ऐसा सम्मान जो उनकी पूरी साहित्यिक यात्रा की स्वीकृति थी।
प्रारंभिक जीवन और साहित्यिक जागरण
फिराक का परिवार पढ़ा-लिखा और साहित्य-प्रेमी था। उनके पिता गोरख प्रसाद स्वयं कविता लिखते थे। बचपन से ही उर्दू और फारसी की तालीम मिली, और गोरखपुर तथा इलाहाबाद में उच्च शिक्षा के दौरान उनकी प्रतिभा निखरती गई। बीए की परीक्षा में उन्होंने पूरे प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया।
1916 में, जब वह करीब 20 वर्ष के थे, उन्होंने अपनी पहली गजल कही। उस दौर में मशहूर कथाकार प्रेमचंद भी गोरखपुर में थे। प्रेमचंद ने फिराक की प्रतिभा को पहचाना और उनकी शुरुआती गजलें 'जमाना' पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम तक पहुँचाईं। यही वह मोड़ था जब फिराक के भीतर का शायर सार्वजनिक रूप से उभरने लगा।
ICS की नौकरी और आज़ादी की राह
पढ़ाई पूरी होने के बाद फिराक का चयन पीसीएस के साथ-साथ प्रतिष्ठित आईसीएस (Indian Civil Service) के लिए भी हुआ — उस ज़माने में यह किसी भी युवा के लिए सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती थी। लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने उनके भीतर राष्ट्रीय चेतना जगाई और उन्होंने सुरक्षित सरकारी करियर को ठुकराकर स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा।
यह फैसला सस्ता नहीं पड़ा। राजनीतिक गतिविधियों के चलते उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब डेढ़ साल जेल में बिताने पड़े। जेल से निकलने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस के कार्यों से जोड़ा और वह कुछ समय तक कांग्रेस कार्यालय में अवर सचिव के रूप में काम करते रहे।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय और साहित्य की स्थायी पारी
राजनीति से विराम लेकर फिराक ने शिक्षा और साहित्य को अपना केंद्र बनाया। 1930 के आसपास वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े और वहाँ अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने लगे। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी — तीनों भाषाओं में दक्ष फिराक ने गजल के अलावा नज्म, रुबाई और अन्य काव्य विधाओं में भी लिखा। उनकी शायरी में प्रेम, इंसानी भावनाएँ और समाज की बहुरंगी तस्वीरें एक साथ उभरती हैं।
प्रमुख रचनाएँ और पुरस्कार
फिराक की प्रमुख कृतियों में 'रूह-ए-कायनात', 'गुले-नग्मा', 'गुले-राना', 'शबनमिस्तान' और 'रूप' शामिल हैं। उनके संग्रह 'गुले-नग्मा' ने उन्हें साहित्य की बुलंदियों तक पहुँचाया — इसी कृति के लिए उन्हें 1960 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1969 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया। वह उर्दू साहित्य के पहले ज्ञानपीठ विजेता बने।
इससे पहले 1968 में उन्हें पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1970 में साहित्य अकादमी फेलोशिप और बाद में गालिब अकादमी पुरस्कार भी उन्हें मिला। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ।
विरासत जो आज भी जीवित है
3 मार्च 1982 को नई दिल्ली में करीब 85 वर्ष की आयु में फिराक गोरखपुरी का निधन हुआ। लेकिन उनकी शायरी आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों के दिलों में उतनी ही ताज़ा है। यह ऐसे समय में याद करने योग्य है जब उर्दू साहित्य की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की ज़रूरत पहले से कहीं अधिक महसूस होती है।