लक्ष्मीकांत: ऊंची कुर्सी पर मंडोलिन बजाने वाले बच्चे से 750 फिल्मों के महान संगीतकार तक का सफर
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के महान संगीतकार लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर का जन्म 3 नवंबर 1937 को मुंबई में हुआ था। वह वही कलाकार हैं जिन्हें एक समय फिल्मी रिकॉर्डिंग के दौरान अपनी छोटी कद-काठी के कारण ऊंची कुर्सी पर बैठकर मंडोलिन बजाना पड़ता था — और जो आगे चलकर प्यारेलाल शर्मा के साथ मिलकर करीब 750 फिल्मों के लिए संगीत रचने वाले दिग्गज बन गए। उनकी यह जीवन-यात्रा संघर्ष, लगन और अदम्य प्रतिभा की एक अनूठी गाथा है।
संघर्षपूर्ण बचपन और संगीत की शुरुआत
लक्ष्मीकांत का बचपन गहरी आर्थिक तंगी में बीता। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार की माली हालत और कठिन हो गई। इसी कारण वह अपनी औपचारिक पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाए। उनके पिता के एक मित्र, जो स्वयं संगीतज्ञ थे, ने उन्हें और उनके बड़े भाई को संगीत की राह दिखाई।
इसके बाद लक्ष्मीकांत ने मंडोलिन सीखने की शुरुआत की। उन्होंने करीब दो वर्षों तक मशहूर मंडोलिन वादक हुसैन अली से बारीकियां सीखीं। बाद में बाल मुकुंद इंदोरकर के सान्निध्य में मंडोलिन की शिक्षा को और गहरा किया और वायलिन की समझ भी विकसित की। यह वही नींव थी, जिस पर आगे उनकी महान संगीत-यात्रा खड़ी हुई।
बाल कलाकार से ऑर्केस्ट्रा वादक तक
लक्ष्मीकांत का फिल्मी दुनिया से रिश्ता बचपन में ही जुड़ गया था। उन्होंने बतौर बाल कलाकार फिल्म 'भक्त पुंडलिक' और 'आंखें' में काम किया। कुछ गुजराती फिल्मों में भी उन्होंने अभिनय किया। किंतु उनका वास्तविक जुनून संगीत था। वह विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मंडोलिन वादन करते और उससे मिलने वाली आमदनी से अपने परिवार की सहायता करते थे।
धीरे-धीरे उन्हें फिल्मी ऑर्केस्ट्रा में अवसर मिलने लगे। उस जमाने में फिल्मी गाने विशाल ऑर्केस्ट्रा के बीच रिकॉर्ड होते थे। लक्ष्मीकांत छोटी उम्र और कम ऊंचाई के बावजूद बड़े-बड़े कलाकारों के साथ बजाते थे। रिकॉर्डिंग के दौरान उनका वाद्य यंत्र सही तरीके से माइक्रोफोन तक पहुंच सके, इसके लिए उन्हें ऊंची कुर्सी पर बिठाया जाता था। इसी परिश्रम और धैर्य से उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और सी. रामचंद्र, ओ.पी. नैयर, शंकर-जयकिशन तथा हेमंत कुमार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम करने का मौका पाया।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल: एक ऐतिहासिक जुगलबंदी
इसी दौर में लक्ष्मीकांत की मुलाकात वायलिन में पारंगत प्यारेलाल शर्मा से हुई। दोनों ने बड़े संगीतकारों के सहायक के रूप में काम किया और रिकॉर्डिंग, ऑर्केस्ट्रेशन तथा धुन-रचना की बारीकियां आत्मसात कीं। यह दोस्ती जल्द ही हिंदी सिनेमा की सबसे मजबूत संगीत-जोड़ी में तब्दील हो गई।
दोनों ने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में 1963 में फिल्म 'पारसमणि' से अपना पहला कदम रखा। इस फिल्म का संगीत दर्शकों को खूब भाया। इसके बाद 1964 में आई फिल्म 'दोस्ती' ने उन्हें जबरदस्त प्रसिद्धि दिलाई और इस फिल्म के संगीत के लिए उन्हें पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। गौरतलब है कि यह उस दौर में किसी नई जोड़ी की असाधारण उड़ान थी।
यादगार फिल्में और अमर गाने
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने 'मिलन', 'दो रास्ते', 'इंतकाम', 'बॉबी', 'अमर अकबर एंथनी', 'सरगम', 'कर्ज', 'एक दूजे के लिए', 'हीरो', 'तेजाब' और 'मिस्टर इंडिया' जैसी दर्जनों बड़ी फिल्मों में संगीत दिया। 'एक प्यार का नगमा है', 'डफली वाले डफली बजा', 'मेरे दिल में आज क्या है', 'ओम शांति ओम' और 'एक दो तीन' जैसी धुनें आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी हैं।
करीब 35 वर्षों तक हिंदी सिनेमा में सक्रिय रहते हुए इस जोड़ी ने कुल सात बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता — जो भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में एक दुर्लभ उपलब्धि है।
विरासत और निधन
लक्ष्मीकांत का 25 मई 1998 को मुंबई में निधन हो गया। वह 60 वर्ष के थे। उनके जाने से हिंदी सिनेमा ने उस दौर का एक बेहद महत्वपूर्ण स्वर खो दिया, जो आर्थिक विपन्नता से उठकर ऑर्केस्ट्रा की ऊंची कुर्सी तक पहुंचा और फिर सुरों की दुनिया का सम्राट बन गया। उनकी धुनें आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित और मंत्रमुग्ध करती रहेंगी।