लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल: 750 फिल्में, 2,800 गीत और एक दोस्ती जो मौत के बाद भी जिंदा है
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर और प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा की जोड़ी एक ऐसा अध्याय है जिसे न दोहराया जा सका, न भुलाया जा सका। साढ़े तीन दशकों तक इस जुगलबंदी ने लगभग 750 फिल्मों के लिए 2,800 से अधिक गीत रचे और हिंदी सिनेमा को उसका सबसे सुरीला कालखंड दिया। 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' से लेकर 'हंसता हुआ नूरानी चेहरा' तक — ये धुनें आज भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में बसी हैं।
संघर्ष से संगीत तक का सफर
लक्ष्मीकांत का जन्म 3 नवंबर 1937 को मुंबई के विले पार्ले में हुआ — दीपावली की वह रात जब चारों ओर दीप जल रहे थे। लक्ष्मी पूजन के शुभ अवसर पर जन्म लेने के कारण माता-पिता ने 'लक्ष्मीकांत' नाम रखा। किंतु यह बचपन सुख से भरा नहीं था — पिता का साया जल्द उठ गया, परिवार कर्ज में डूब गया और पढ़ाई अधूरी छूट गई।
पिता के एक संगीतकार मित्र की सलाह पर मात्र दस वर्ष की उम्र में लक्ष्मीकांत के हाथों में मैंडोलिन आया। उन्होंने उस्ताद हुसैन अली और बाद में बाल मुकुंद इंदोरकर से इस वाद्य यंत्र की बारीकियाँ सीखीं। इसी दौर में उन्होंने 'भक्त पुंडलिक' (1949) जैसी फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम भी किया।
लता मंगेशकर की नज़र और एक नई शुरुआत
जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब कोलाबा के रेडियो क्लब में एक संगीत कार्यक्रम के दौरान करीब 11 वर्षीय लक्ष्मीकांत को मैंडोलिन बजाते हुए स्वयं लता मंगेशकर ने सुना। उनके अद्भुत वादन से प्रभावित होकर लता जी ने तुरंत उनकी पारिवारिक स्थिति जानी और शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन तथा नौशाद जैसे तत्कालीन दिग्गज संगीतकारों से उनकी सिफारिश की। यह वह क्षण था जिसने एक संघर्षरत बालक को बॉलीवुड के दरवाज़े तक पहुँचाया।
एक दोस्ती जिसने इतिहास रचा
इसी संघर्ष के दौरान 'सुरीले बाल कला केंद्र' में लक्ष्मीकांत की मुलाकात प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा से हुई — एक कुशल वायलिन वादक, जिनके घर के हालात भी कुछ बेहतर नहीं थे। एक जैसी उम्र, एक सा दर्द और संगीत का वही जुनून — यही नींव बनी उस दोस्ती की जो दशकों तक भारतीय सिनेमा की धड़कन बनी रही।
एक समय ऐसा भी आया जब तंगहाली से हारकर प्यारेलाल वियना जाने की सोचने लगे थे। तब लक्ष्मीकांत ने उनका हाथ थामकर कहा था — 'घबराओ मत यार, हम दोनों मिलकर एक दिन इस इंडस्ट्री में अपना बहुत बड़ा नाम बनाएंगे।' यह वादा बाद में सच साबित हुआ।
पारसमणि से खलनायक तक — सफलता का अटूट सिलसिला
1963 में कम बजट की फिल्म 'पारसमणि' ने इस जोड़ी को रातोंरात पहचान दी। फिर 1964 की फिल्म 'दोस्ती' ने इतिहास रच दिया और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को उनका पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद तो सफलता का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो थमा ही नहीं।
राज कपूर की 'बॉबी' (1973) से आधुनिक युवा संगीत की नई परिभाषा लिखी गई। 'सत्यम शिवम सुंदरम' में शास्त्रीय राग दरबारी की गूँज हो, 'कर्ज' का थिरकता डिस्को संगीत हो, या 'तेजाब' और 'खलनायक' की धुनें — इस जोड़ी ने हर दौर के बदलते मिजाज को अपनी संगीत-भाषा में ढाला। गीतकार आनंद बख्शी के साथ मिलकर उन्होंने लगभग 302 फिल्मों में यादगार गीत दिए।
इंसानियत की मिसाल
व्यावसायिकता के शिखर पर होने के बावजूद लक्ष्मीकांत जमीन से जुड़े रहे। निर्माता बोनी कपूर ने एक बार स्वीकार किया था कि वे इस जोड़ी को अधिक फीस देना चाहते थे, पर लक्ष्मीकांत ने यह कहकर मना कर दिया कि 'हर निर्माता इतना खर्च सहन नहीं कर सकता।' यह उनकी इंसानी बड़ाई का प्रमाण था।
25 मई 1998 को इस सुर-सम्राट ने अंतिम सांस ली। लक्ष्मीकांत के निधन के बाद प्यारेलाल ने आज तक किसी भी मंच पर अकेले प्रस्तुति नहीं दी। वे जहाँ भी काम करते हैं, नाम हमेशा 'लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल' ही लिखते हैं — एक ऐसी दोस्ती की गवाही जो मृत्यु के बाद भी जीवित है।