मजरूह सुल्तानपुरी: ३५० फिल्मों के गीतकार जो दादा साहेब फाल्के पाने वाले पहले शायर बने
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली गीतकारों में शुमार मजरूह सुल्तानपुरी ने पाँच दशकों से अधिक के करियर में करीब ३५० फिल्मों के लिए हज़ारों गीत लिखे और १९९३ में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बनकर इतिहास रचा। उनके बोल — प्यार, दर्द, दोस्ती और ज़िंदगी के रंगों से सजे — आज भी करोड़ों लोगों की ज़ुबान पर ज़िंदा हैं। यह कम लोग जानते हैं कि फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने इस पेशे को ठुकरा दिया था।
शायर से गीतकार तक का सफ़र
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म १ अक्टूबर १९१९ को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था। उनका असली नाम असरार हसन खान था। उनके पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और उन्होंने बेटे की शुरुआती तालीम मदरसे में दिलाई।
आगे चलकर मजरूह ने यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और कुछ समय तक हकीम के रूप में भी काम किया। लेकिन उनका असली लगाव शायरी से था — मुशायरों में उनकी ग़ज़लें और नज़्में सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। धीरे-धीरे शायरी ही उनकी पहचान और राह बन गई।
जिगर मुरादाबादी की सलाह ने बदली दिशा
साल १९४५ में मुंबई के एक मुशायरे में मजरूह की शायरी सुनकर फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। मजरूह ने यह ऑफर सिरे से ठुकरा दिया — उनका मानना था कि फिल्मी गीत लिखना उनकी शायरी की तुलना में कमतर काम है।
इसके बाद मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी ने उन्हें समझाया कि फिल्मों के लिए लिखने से अच्छी कमाई होगी और परिवार को आर्थिक सहारा मिलेगा। जिगर साहब की बात का असर हुआ और मजरूह आख़िरकार राज़ी हो गए। यह मोड़ हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक निर्णायक क्षण साबित हुआ।
नौशाद की परीक्षा और पहली फिल्म
कारदार उन्हें संगीतकार नौशाद के पास ले गए। नौशाद ने मजरूह को एक धुन और उसका मीटर देकर उस पर कुछ लिखने को कहा। मजरूह ने उसी आधार पर लिखा — 'जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के' — और नौशाद तुरंत प्रभावित हो गए।
इसी के साथ १९४६ में आई फिल्म 'शाहजहाँ' से मजरूह के फिल्मी गीतों का सफर शुरू हुआ। इसी फिल्म में उनका लिखा 'जब दिल ही टूट गया' भी था, जिसे के.एल. सहगल ने आवाज़ दी और जो श्रोताओं के दिलों में उतर गया।
पाँच दशकों की अटूट विरासत
'शाहजहाँ' के बाद मजरूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'अंदाज़', 'आर पार', 'मिस्टर एंड मिसेज़ ५५', 'सीआईडी', 'नौ दो ग्यारह', 'काला पानी', 'सुजाता', 'गाइड' और 'ज्वेल थीफ' जैसी कालजयी फिल्मों के लिए उन्होंने यादगार गीत लिखे। एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, आर.डी. बर्मन और नौशाद जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ उनकी जोड़ी ने एक के बाद एक मील के पत्थर स्थापित किए।
मजरूह की खूबी यह थी कि वे हर दौर के साथ खुद को ढाल लेते थे। नई पीढ़ी के लिए भी उन्होंने उतने ही दिल से लिखा। 'कयामत से कयामत तक' का 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा', 'जो जीता वही सिकंदर' का 'पहला नशा' और 'हम किसी से कम नहीं' जैसे गीत युवाओं में भी उतने ही लोकप्रिय हुए।
पुरस्कार और सम्मान
फिल्म 'दोस्ती' के गीत 'चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे' के लिए उन्हें १९६५ में फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार से नवाज़ा गया। १९९३ में वे दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बने — यह भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान है। साहित्य के क्षेत्र में भी उन्हें गालिब पुरस्कार और इकबाल सम्मान जैसे प्रतिष्ठित अवार्ड मिले।
गौरतलब है कि मजरूह सिर्फ गीतकार नहीं, एक संवेदनशील शायर भी थे जिन्होंने अपनी क़लम से दो अलग-अलग दुनियाओं को एक साथ रोशन किया। २४ मई २००० को ८० वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके गीत आज भी उतने ही ताज़ा हैं जितने पहले दिन थे।