30 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

मजरूह सुल्तानपुरी: ३५० फिल्मों के गीतकार जो दादा साहेब फाल्के पाने वाले पहले शायर बने

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
मजरूह सुल्तानपुरी: ३५० फिल्मों के गीतकार जो दादा साहेब फाल्के पाने वाले पहले शायर बने

सारांश

एक हकीम जो शायर बना और शायर जो अनिच्छा से गीतकार बना — मजरूह सुल्तानपुरी की कहानी हिंदी सिनेमा की सबसे अप्रत्याशित यात्राओं में से एक है। ३५० फिल्में, हज़ारों गीत और दादा साहेब फाल्के का पहला गीतकार सम्मान — उनकी विरासत आज भी अमर है।

मुख्य बातें

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म १ अक्टूबर १९१९ को सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ; असली नाम असरार हसन खान था।
शायर जिगर मुरादाबादी की प्रेरणा से उन्होंने फिल्मी गीत लिखने का शुरुआती विरोध छोड़ा।
१९४६ में फिल्म 'शाहजहाँ' से फिल्मी करियर की शुरुआत; संगीतकार नौशाद के साथ पहली जोड़ी।
पाँच दशकों में करीब ३५० फिल्मों के लिए हज़ारों गीत लिखे।
१९९३ में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बने।
२४ मई २००० को मुंबई में ८० वर्ष की आयु में निधन।

हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली गीतकारों में शुमार मजरूह सुल्तानपुरी ने पाँच दशकों से अधिक के करियर में करीब ३५० फिल्मों के लिए हज़ारों गीत लिखे और १९९३ में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बनकर इतिहास रचा। उनके बोल — प्यार, दर्द, दोस्ती और ज़िंदगी के रंगों से सजे — आज भी करोड़ों लोगों की ज़ुबान पर ज़िंदा हैं। यह कम लोग जानते हैं कि फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने इस पेशे को ठुकरा दिया था।

शायर से गीतकार तक का सफ़र

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म १ अक्टूबर १९१९ को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था। उनका असली नाम असरार हसन खान था। उनके पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और उन्होंने बेटे की शुरुआती तालीम मदरसे में दिलाई।

आगे चलकर मजरूह ने यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और कुछ समय तक हकीम के रूप में भी काम किया। लेकिन उनका असली लगाव शायरी से था — मुशायरों में उनकी ग़ज़लें और नज़्में सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। धीरे-धीरे शायरी ही उनकी पहचान और राह बन गई।

जिगर मुरादाबादी की सलाह ने बदली दिशा

साल १९४५ में मुंबई के एक मुशायरे में मजरूह की शायरी सुनकर फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। मजरूह ने यह ऑफर सिरे से ठुकरा दिया — उनका मानना था कि फिल्मी गीत लिखना उनकी शायरी की तुलना में कमतर काम है।

इसके बाद मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी ने उन्हें समझाया कि फिल्मों के लिए लिखने से अच्छी कमाई होगी और परिवार को आर्थिक सहारा मिलेगा। जिगर साहब की बात का असर हुआ और मजरूह आख़िरकार राज़ी हो गए। यह मोड़ हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक निर्णायक क्षण साबित हुआ।

नौशाद की परीक्षा और पहली फिल्म

कारदार उन्हें संगीतकार नौशाद के पास ले गए। नौशाद ने मजरूह को एक धुन और उसका मीटर देकर उस पर कुछ लिखने को कहा। मजरूह ने उसी आधार पर लिखा — 'जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के' — और नौशाद तुरंत प्रभावित हो गए।

इसी के साथ १९४६ में आई फिल्म 'शाहजहाँ' से मजरूह के फिल्मी गीतों का सफर शुरू हुआ। इसी फिल्म में उनका लिखा 'जब दिल ही टूट गया' भी था, जिसे के.एल. सहगल ने आवाज़ दी और जो श्रोताओं के दिलों में उतर गया।

पाँच दशकों की अटूट विरासत

'शाहजहाँ' के बाद मजरूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'अंदाज़', 'आर पार', 'मिस्टर एंड मिसेज़ ५५', 'सीआईडी', 'नौ दो ग्यारह', 'काला पानी', 'सुजाता', 'गाइड' और 'ज्वेल थीफ' जैसी कालजयी फिल्मों के लिए उन्होंने यादगार गीत लिखे। एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, आर.डी. बर्मन और नौशाद जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ उनकी जोड़ी ने एक के बाद एक मील के पत्थर स्थापित किए।

मजरूह की खूबी यह थी कि वे हर दौर के साथ खुद को ढाल लेते थे। नई पीढ़ी के लिए भी उन्होंने उतने ही दिल से लिखा। 'कयामत से कयामत तक' का 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा', 'जो जीता वही सिकंदर' का 'पहला नशा' और 'हम किसी से कम नहीं' जैसे गीत युवाओं में भी उतने ही लोकप्रिय हुए।

पुरस्कार और सम्मान

फिल्म 'दोस्ती' के गीत 'चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे' के लिए उन्हें १९६५ में फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार से नवाज़ा गया। १९९३ में वे दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बने — यह भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान है। साहित्य के क्षेत्र में भी उन्हें गालिब पुरस्कार और इकबाल सम्मान जैसे प्रतिष्ठित अवार्ड मिले।

गौरतलब है कि मजरूह सिर्फ गीतकार नहीं, एक संवेदनशील शायर भी थे जिन्होंने अपनी क़लम से दो अलग-अलग दुनियाओं को एक साथ रोशन किया। २४ मई २००० को ८० वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके गीत आज भी उतने ही ताज़ा हैं जितने पहले दिन थे।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसी ने आगे चलकर उस विधा को इतनी ऊँचाई दी कि दादा साहेब फाल्के जैसा सर्वोच्च सम्मान पहली बार किसी गीतकार को मिला। यह विरोधाभास हिंदी सिनेमा की उस व्यापक प्रवृत्ति को रेखांकित करता है जहाँ 'शुद्ध साहित्य' और 'फिल्मी लेखन' के बीच की दीवार अक्सर कृत्रिम साबित होती है। मजरूह की विरासत आज के गीतकारों के लिए भी एक सबक है — दर्शक की भाषा में लिखना कमज़ोरी नहीं, असली हुनर है।
RashtraPress
30 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मजरूह सुल्तानपुरी कौन थे?
मजरूह सुल्तानपुरी हिंदी सिनेमा के महान गीतकार थे, जिनका असली नाम असरार हसन खान था। उनका जन्म १ अक्टूबर १९१९ को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था और उन्होंने पाँच दशकों में करीब ३५० फिल्मों के लिए हज़ारों गीत लिखे।
मजरूह सुल्तानपुरी दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार कब बने?
मजरूह सुल्तानपुरी को १९९३ में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे यह पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार थे, जो भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।
मजरूह सुल्तानपुरी ने फिल्मों के लिए गीत लिखना कैसे शुरू किया?
१९४५ में मुंबई के एक मुशायरे में फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार ने उन्हें गीत लिखने का प्रस्ताव दिया, जिसे मजरूह ने शुरू में ठुकरा दिया। शायर जिगर मुरादाबादी की समझाइश के बाद वे राज़ी हुए और १९४६ में फिल्म 'शाहजहाँ' से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ।
मजरूह सुल्तानपुरी के सबसे मशहूर गीत कौन से हैं?
उनके मशहूर गीतों में 'जब दिल ही टूट गया' (शाहजहाँ), 'चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे' (दोस्ती), 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा' (कयामत से कयामत तक) और 'पहला नशा' (जो जीता वही सिकंदर) शामिल हैं। उन्होंने 'गाइड', 'ज्वेल थीफ' और 'आर पार' जैसी फिल्मों के लिए भी यादगार गीत लिखे।
मजरूह सुल्तानपुरी का निधन कब हुआ?
मजरूह सुल्तानपुरी का निधन २४ मई २००० को मुंबई में हुआ। उनकी आयु उस समय ८० वर्ष थी।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 2 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 5 महीने पहले
  6. 6 महीने पहले
  7. 12 महीने पहले
  8. 1 साल पहले