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मजरूह सुल्तानपुरी: एक मुशायरे ने बदली किस्मत, एआर कारदार ने नौशाद से करवाई मुलाकात और मिली 'शाहजहां'

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मजरूह सुल्तानपुरी: एक मुशायरे ने बदली किस्मत, एआर कारदार ने नौशाद से करवाई मुलाकात और मिली 'शाहजहां'

सारांश

एक मुशायरे की वह शाम जिसने असरार उल हसन खान को मजरूह सुल्तानपुरी बना दिया — 1945 में बॉम्बे के साबू सिद्दीकी इंस्टीट्यूट में फिल्मकार एआर कारदार ने उनकी शायरी सुनी, नौशाद से मिलाया, और 'शाहजहां' से शुरू हुआ वह सफर जो 1993 के दादासाहेब फाल्के पुरस्कार तक पहुँचा।

मुख्य बातें

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को आजमगढ़, उत्तर प्रदेश के निजामाबाद में हुआ; असली नाम असरार उल हसन खान ।
1945 में बॉम्बे के साबू सिद्दीकी इंस्टीट्यूट के मुशायरे में फिल्मकार एआर कारदार उनकी शायरी से प्रभावित हुए।
कारदार ने 1946 में उन्हें संगीतकार नौशाद से मिलवाया; पहला अवसर मिला फिल्म 'शाहजहां' में केएल सहगल के साथ।
नौशाद से एआर रहमान तक एक दर्जन से अधिक संगीतकारों के साथ काम किया; 1965 में फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
1993 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित; 24 मई 2000 को निमोनिया के कारण निधन।

गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का नाम हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में उन चंद रचनाकारों में शुमार है जिन्होंने अपनी कलम से पीढ़ियों को झुमाया। एक साधारण शायर से भारतीय सिनेमा के सर्वाधिक सम्मानित गीतकार तक का उनका सफर 1945 में बॉम्बे के एक मुशायरे से शुरू हुआ, जहाँ उनकी शायरी सुनकर फिल्मकार एआर कारदार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संगीतकार नौशाद से उनकी मुलाकात करवाई और यहीं से एक नए युग की नींव पड़ी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद में हुआ था। उनका असली नाम असरार उल हसन खान था। उनके पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और चाहते थे कि पुत्र पारंपरिक शिक्षा की राह अपनाए। इसी उद्देश्य से उन्हें मदरसे में दाखिल कराया गया, जहाँ उन्होंने अरबी और फारसी की शिक्षा ली और आलिम की उपाधि प्राप्त की।

इसके बाद उन्होंने लखनऊ के तक्मील उल तिब्ब कॉलेज से यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई कर हकीम की उपाधि हासिल की। किंतु उनकी शायराना प्रवृत्ति उन्हें चिकित्सा से कहीं अधिक शायरी की ओर खींचती रही। सुल्तानपुर में रहते हुए उन्होंने गजलें लिखना आरंभ किया और मुशायरों में सक्रिय भागीदारी करने लगे। इसी दौर में वे प्रतिष्ठित शायर जिगर मुरादाबादी के सानिध्य में भी रहे।

वह मुशायरा जिसने बदल दी ज़िंदगी

1945 में मजरूह सुल्तानपुरी बॉम्बे पहुँचे और साबू सिद्दीकी इंस्टीट्यूट में आयोजित एक मुशायरे में अपनी शायरी पेश की। उनकी गहरी और भावपूर्ण रचनाओं ने उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उस मुशायरे में मौजूद फिल्मकार एआर कारदार उनकी शायरी से बेहद प्रभावित हुए।

कारदार ने जिगर मुरादाबादी के माध्यम से मजरूह से संपर्क साधा और 1946 में उन्हें संगीतकार नौशाद से मिलवाया। इस ऐतिहासिक मुलाकात के फलस्वरूप मजरूह को फिल्म 'शाहजहां' के लिए गीत लिखने का अवसर मिला, जिसमें केएल सहगल मुख्य भूमिका में थे। यही वह क्षण था जब मजरूह सुल्तानपुरी ने हिंदी फिल्म जगत में अपना पहला कदम रखा।

सुनहरा करियर और यादगार गीत

1950 से 1960 के दशक तक मजरूह फिल्म इंडस्ट्री की पहली पंक्ति के गीतकार बने रहे। उन्होंने नौशाद, मदन मोहन, एसडी बर्मन, रोशन, ओपी नैयर, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन, राजेश रोशन, आनंद-मिलिंद, जतिन-ललित और एआर रहमान जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। 'चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे', 'दिल देके देखो', 'रहे न रहे हम', 'माना जनाब ने पुकारा नहीं', 'तेरी बिंदिया रे' और 'लेकर हम दीवाना दिल' जैसे उनके गीत आज भी श्रोताओं की जुबाँ पर हैं।

पुरस्कार, विचारधारा और जेल

1965 में फिल्म 'दोस्ती' के गीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। 1993 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से उन्हें अलंकृत किया गया। मजरूह वामपंथी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे और 1949 में अभिनेता बलराज साहनी के साथ उन्होंने कुछ समय जेल में भी बिताया। परिस्थितियाँ चाहे जो भी रही हों, उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।

विरासत और निधन

24 मई 2000 को निमोनिया के कारण मजरूह सुल्तानपुरी का निधन हो गया। उनके जाने के पच्चीस वर्ष बाद भी उनके गीत भारतीय संगीत की अमूल्य धरोहर बने हुए हैं — एक ऐसे शायर की विरासत जिसे एक मुशायरे ने इतिहास में दर्ज करा दिया।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब यह याद दिलाना ज़रूरी है कि एआर कारदार जैसे फिल्मकारों की सौंदर्यबोध-चालित खोज ने हिंदी सिनेमा को वह काव्यात्मक गहराई दी जो आज दुर्लभ है। मजरूह का वामपंथी झुकाव और जेल जाने का साहस यह भी बताता है कि उस पीढ़ी के कलाकार अपनी कला को सामाजिक जिम्मेदारी से अलग नहीं मानते थे — एक सबक जो समकालीन मनोरंजन उद्योग के लिए प्रासंगिक बना हुआ है।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम और जन्मस्थान क्या था?
मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार उल हसन खान था और उनका जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद में हुआ था। उन्होंने अरबी-फारसी की शिक्षा के बाद लखनऊ से यूनानी चिकित्सा भी पढ़ी।
एआर कारदार ने मजरूह सुल्तानपुरी को फिल्मों में कैसे लाया?
1945 में बॉम्बे के साबू सिद्दीकी इंस्टीट्यूट के मुशायरे में एआर कारदार मजरूह की शायरी सुनकर बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने शायर जिगर मुरादाबादी के माध्यम से मजरूह से संपर्क किया और 1946 में उन्हें संगीतकार नौशाद से मिलवाया, जिसके बाद मजरूह को फिल्म 'शाहजहां' में गीत लिखने का मौका मिला।
मजरूह सुल्तानपुरी को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?
मजरूह सुल्तानपुरी को 1965 में फिल्म 'दोस्ती' के गीत के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 1993 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया।
मजरूह सुल्तानपुरी को जेल क्यों जाना पड़ा था?
मजरूह सुल्तानपुरी वामपंथी विचारधारा के समर्थक थे और 1949 में अभिनेता बलराज साहनी के साथ उन्होंने कुछ समय जेल में बिताया। अपने सिद्धांतों के लिए वे किसी भी परिस्थिति में समझौता करने को तैयार नहीं थे।
मजरूह सुल्तानपुरी का निधन कब और किस कारण हुआ?
मजरूह सुल्तानपुरी का निधन 24 मई 2000 को निमोनिया के कारण हुआ। अपने पाँच दशक से अधिक के करियर में उन्होंने नौशाद से लेकर एआर रहमान तक के साथ काम किया और हिंदी फिल्म संगीत को अनगिनत यादगार गीत दिए।
राष्ट्र प्रेस
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