क्या मजरूह सुल्तानपुरी पहले फिल्मफेयर विजेता गीतकार थे, जिन्होंने फिल्मी गानों का ऑफर ठुकराया?

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क्या मजरूह सुल्तानपुरी पहले फिल्मफेयर विजेता गीतकार थे, जिन्होंने फिल्मी गानों का ऑफर ठुकराया?

सारांश

मजरूह सुल्तानपुरी भारतीय सिनेमा के एक अद्वितीय गीतकार थे, जिनकी रचनाओं में एक दार्शनिक की गहराई और विद्रोही का जोश था। उनका सफर केवल गीतकार के रूप में नहीं, बल्कि एक साहित्यिक कवि के रूप में भी प्रेरणादायक है। आइए जानते हैं उनकी यात्रा और संघर्ष के बारे में।

मुख्य बातें

मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार हसन खान था।
उन्होंने 1964 में फिल्म 'दोस्ती' के लिए पहला फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।
उनकी लेखनी में सादगी और गहराई थी।
उन्होंने राज कपूर और गुरुदत्त जैसे दिग्गजों के साथ काम किया।
उन्हें 1994 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला।

मुंबई, 30 सितंबर (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सिनेमा में कुछ ऐसे अद्वितीय कलाकार होते हैं, जिनकी कलम न केवल गीत लिखती है, बल्कि पीढ़ियों के दिलों की धड़कन बन जाती है। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी, जिनकी शायरी में एक दार्शनिक की गहराई और एक विद्रोही का जोश था, ऐसे ही एक महान गीतकार थे।

एक शायर और गीतकार के रूप में, उन्होंने न केवल प्रेम की मिठास बिखेरी, बल्कि दर्द, संघर्ष, और सामाजिक संदेशों को भी शब्दों में ढाला। मजरूह एक जादूगर थे, जिनके गीत आज भी हमारे दिलों में गूंजते हैं, जैसे “जब दिल ही टूट गया” या “प्यार हुआ इकरार हुआ।”

उनकी लेखनी की विशेषता थी उनकी सादगी और गहराई। चाहे प्रेम का उत्सव हो या टूटे दिल का मातम, उनके शब्द हर भाव को जीवंत कर देते थे। फिल्म 'अंदाज' (1949) का “तू कहे अगर, जिंदगी भर मैं गीत सुनाता जाऊं” हो या कभी-कभी (1976) का “मैं पल दो पल का शायर हूं,” उनके गीत हर पीढ़ी के साथ जुड़ गए।

उन्होंने राज कपूर, गुरुदत्त, और यश चोपड़ा जैसे दिग्गजों के साथ काम किया और हर बार अपनी लेखनी से कहानी को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया। 1995 की ब्लॉकबस्टर 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में उनके गीत “तुझे देखा तो ये जाना सनम” ने नई पीढ़ी को भी उनके जादू से बांध लिया। मजरूह की खूबी थी कि वे हर दौर के साथ बदले, फिर भी अपनी जड़ों से जुड़े रहे।

मजरूह सुल्तानपुरी पहले गीतकार थे, जिन्हें 1964 में फिल्म 'दोस्ती' के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। उनके गीत “चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे” ने दोस्ती की भावना को अमर कर दिया। 1994 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे मजरूह का असली नाम असरार हसन खान था। उर्दू साहित्य और शायरी के प्रति उनका प्रेम बचपन से ही था। एक पारंपरिक परिवार में पले-बढ़े मजरूह ने हकीम के रूप में करियर शुरू किया, लेकिन उनकी आत्मा शब्दों में बसी थी।

मुशायरों में उनकी शायरी ने जल्द ही उन्हें स्थानीय ख्याति दिलाई। 1940 के दशक में जब वे मुंबई पहुंचे, तो उनकी मुलाकात मशहूर निर्माता-निर्देशक करदार साहब से हुई। यहीं से शुरू हुआ उनका सिनेमा का सफर। उनके जीवन से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है जो बताता है कि कैसे एक साहित्यिक कवि फिल्मों के लिए लिखने को तैयार नहीं था, लेकिन एक मुलाकात ने उनका नजरिया हमेशा के लिए बदल दिया। इसका जिक्र उनकी जीवनी से जुड़ी किताबों में मिलता है।

यह बात 1940 के दशक की है, जब मजरूह सुल्तानपुरी अपनी साहित्यिक नज्मों और गजलों के लिए जाने जाते थे। वह 'प्रगतिशील लेखक संघ' के एक प्रमुख सदस्य थे और फिल्मी गीतों को अपनी कला के दर्जे से कमतर मानते थे। उनकी इस सोच के बावजूद महान गायक के. एल. सैगल ने उन्हें मुंबई बुलाया।

सैगल ने मजरूह को उस दौर के सबसे बड़े संगीतकार नौशाद से मिलवाया। नौशाद ने मजरूह से उनकी कला का एक छोटा सा इम्तिहान लेने का फैसला किया। उन्होंने मजरूह से कहा कि वह एक खास परिस्थिति पर एक गीत लिखें जहां एक नायक और नायिका पहली बार मिल रहे हों।

मजरूह को यह सब बेहद अजीब लगा। उन्हें लगा कि फिल्मी गीतकार बनना उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा के खिलाफ है। उन्होंने नौशाद और वहां मौजूद अभिनेता दिलीप कुमार से सीधे शब्दों में कह दिया, "मैं इस तरह की शायरी नहीं करता। मैं तो बस अपनी गजलें और नज्में लिखता हूं।"

नौशाद और दिलीप कुमार ने मजरूह के इस जवाब में उनकी ईमानदारी देखी। दिलीप कुमार ने उन्हें समझाया कि कला किसी भी रूप में हो, वह कला ही रहती है, चाहे वह एक साहित्यिक मंच पर हो या सिनेमा के लिए।

मजरूह ने आखिरकार उनके कहे अनुसार एक गीत लिखा, जिसने नौशाद को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने मजरूह को अपना पहला फिल्मी गीत लिखने का मौका दिया। मजरूह ने जो गीत लिखा, वह था "जब उसने गेसू बिखराए..."। बाकी तो इतिहास है।

संपादकीय दृष्टिकोण

हमें मजरूह सुल्तानपुरी की यात्रा से यह सीख मिलती है कि कला के प्रति सच्ची निष्ठा और ईमानदारी ही सफलता की कुंजी है। उनकी कहानी हमें प्रेरित करती है कि हमें अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम क्या था?
मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार हसन खान था।
मजरूह सुल्तानपुरी ने कौन सा पहला फिल्मफेयर पुरस्कार जीता?
उन्होंने 1964 में फिल्म 'दोस्ती' के लिए पहला फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।
उनके प्रसिद्ध गीत कौन से हैं?
उनके प्रसिद्ध गीतों में 'जब दिल ही टूट गया' और 'तुझे देखा तो ये जाना सनम' शामिल हैं।
मजरूह सुल्तानपुरी ने किस निर्देशक के साथ काम किया?
उन्होंने राज कपूर, गुरुदत्त, और यश चोपड़ा जैसे दिग्गजों के साथ काम किया।
मजरूह सुल्तानपुरी को किस सम्मान से नवाजा गया?
उन्हें 1994 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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