महाराष्ट्र के इस थिएटर में मीना कुमारी के प्रशंसक के लिए हमेशा बुक रहती थी सीट
सारांश
Key Takeaways
- मीना कुमारी की खूबसूरती और अदाकारी ने दर्शकों को प्रभावित किया।
- एक प्रशंसक की निष्ठा ने एक सीट को हमेशा के लिए आरक्षित रखा।
- सिनेमा और व्यक्तिगत संबंधों के बीच की गहराई।
- यह कहानी सिनेमा के प्रति दीवानगी और प्रेम को दर्शाती है।
- सिनेमा का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर कितना गहरा हो सकता है।
मुंबई, २ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय सिनेमा की 'ट्रैजेडी क्वीन' मीना कुमारी ने अपनी खूबसूरती और अदाकारी से दर्शकों के दिलों में एक विशेष स्थान बना लिया। प्यार और अपनापन की तलाश में भटकती इस अदाकारा की कशिश ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। एक प्रशंसक की दीवानगी तो ऐसी थी कि उसका जीवन मीना कुमारी की फिल्मों के साथ ही समाप्त हुआ।
हाल ही में पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में प्रसिद्ध सिनेमेटोग्राफर हेमंत चतुर्वेदी ने मीना कुमारी के एक अद्भुत प्रशंसक की कहानी साझा की, जिसकी सीट सिनेमाघर के अंतिम दिनों तक हमेशा आरक्षित रहती थी।
पूजा ने अपनी इंस्टाग्राम पर दोनों के बीच हुई बातचीत की ऑडियो क्लिप साझा की। हेमंत ने बताया कि वह व्यक्ति मीना कुमारी का इतना बड़ा प्रशंसक था कि सिर्फ उनकी फिल्में देखने के लिए उसकी सीट हमेशा बुक रहती थी।
हेमंत ने कहा, "जब मैं अपने करियर की शुरुआत कर रहा था, तब मध्य महाराष्ट्र के एक पुराने सिनेमाघर में काम के सिलसिले में गया था। वहां के मालिक ने मुझे एक बुजुर्ग दर्शक की कहानी सुनाई, जो मीना कुमारी के उत्साही प्रशंसक थे।"
सिनेमाघर के मालिक ने हेमंत को बताया कि "मेरे पिता मुझे बताया करते थे कि १९४० के दशक में बने इस थिएटर में एक बुजुर्ग सज्जन रोज़ शाम चार बजे के शो में आते थे। वे मीना कुमारी की कोई भी फिल्म हो, उसी फिल्म को बार-बार देखते थे। चाहे फिल्म एक हफ्ते चले, दो हफ्ते या २५ हफ्ते तक चले, वे हर रोज़ उसी सीट पर बैठकर फिल्म देखते थे। उनकी दीवानगी इतनी थी कि सिनेमाघर वाले उनके लिए हमेशा वह सीट पहले से रिजर्व रखते थे। यह सिलसिला लगभग २५ से ३० साल तक चला।"
उन्होंने आगे बताया, "जब मीना कुमारी की आखिरी फिल्में रिलीज हो रही थीं, तब भी सिनेमाघर वालों ने उनके लिए वही सीट रिजर्व रखी लेकिन उस दिन शाम चार बजे वे नहीं आए। अगले दिन भी उनका इंतज़ार किया गया, फिर भी वे नहीं पहुंचे। चिंता होने पर सिनेमाघर से किसी को उनके घर भेजा गया। वहां जाकर पता चला कि बुजुर्ग सज्जन का निधन हो चुका था।"
हेमंत ने कहा कि इसके बाद से सिनेमाघर वालों ने निर्णय लिया कि उस सीट को कभी किसी और को नहीं देंगे। जब तक थिएटर बंद नहीं हुआ, उस बी-१४ नंबर की सीट को हमेशा रिजर्व रखा गया। यह सीट उनके सबसे पसंदीदा दर्शक के सम्मान और पुरानी यादों के प्रतीक के रूप में खाली रखी गई।
यह कहानी केवल एक कलाकार की नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक संबंध की है जिसने सिनेमा और असली जिंदगी के बीच की दीवार को मिटा दिया।