नंदिता दास ने 'फिराक' के बाद तोड़ी थी निर्देशन की कसम, मंटो की जिंदगी ने बदला इरादा
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री और फिल्मकार नंदिता दास ने अपने पहले निर्देशकीय अनुभव के बाद कैमरे के पीछे खड़े होने से तौबा कर ली थी — लेकिन उर्दू के महान लेखक सआदत हसन मंटो की जिंदगी और विचारों ने उनके भीतर फिर से निर्देशन की चिंगारी सुलगाई। मुंबई में अपने विभिन्न साक्षात्कारों में नंदिता ने यह स्वीकार किया है कि 'फिराक' की खराब डिस्ट्रीब्यूशन ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था।
फिराक का कटु अनुभव
नंदिता दास ने साल 2008 में फिल्म 'फिराक' से फीचर फिल्म निर्देशन की शुरुआत की थी। यह फिल्म 2002 के गुजरात दंगों के बाद के हालात पर आधारित थी और इसमें दंगे के साये में जी रहे आम लोगों का दर्द, डर और टूटते रिश्ते दिखाए गए थे।
फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, परेश रावल, संजय सूरी, दीप्ति नवल और स्वयं नंदिता दास ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी और कलाकारी दोनों सराहनीय थीं, किंतु जिस व्यापकता से यह दर्शकों तक पहुँचनी चाहिए थी, वैसा नहीं हुआ।
नंदिता ने बाद में कई अवसरों पर कहा था कि 'फिराक' की कमज़ोर डिस्ट्रीब्यूशन ने उन्हें निर्देशन से विमुख कर दिया। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि वह दोबारा फिल्म नहीं बनाएंगी।
मंटो की कहानी ने जगाया जुनून
साल 2012 के आसपास उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो की 100वीं जयंती के उपलक्ष्य में उनके लेखन और विचारों पर व्यापक चर्चा होने लगी। नंदिता ने मंटो की कहानियाँ, उनके जीवन से जुड़ी सामग्री और उनके संघर्ष को गहराई से पढ़ा।
धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि मंटो का नजरिया और उनकी बेबाकी आज के समाज के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है। नंदिता ने मंटो के विचारों में खुद को महसूस किया और तय किया कि इस शख्सियत पर फिल्म बनना जरूरी है।
पाँच साल की गहन रिसर्च
इस बार नंदिता ने जल्दबाजी से परहेज किया। फिल्म की तैयारी और शोध में उन्होंने करीब पाँच साल लगाए। उन्होंने मंटो के परिवार के सदस्यों से मुलाकात की, उनके करीबी लोगों से जानकारी इकट्ठा की और उन स्थानों का दौरा किया जहाँ लेखक ने अपनी जिंदगी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा गुजारा था।
यह रिसर्च महज तथ्य-संग्रह नहीं थी — यह एक निर्देशक का अपने किरदार के साथ गहरा आत्मीय जुड़ाव था, जो परदे पर जीवंत भी नजर आया।
मंटो: कान्स से लेकर दर्शकों तक
साल 2018 में फिल्म 'मंटो' रिलीज हुई, जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने सआदत हसन मंटो की केंद्रीय भूमिका निभाई। रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी सफिया का किरदार अदा किया, जबकि ताहिर राज भसीन और ऋषि कपूर भी अहम भूमिकाओं में नजर आए। उल्लेखनीय यह रहा कि फिल्म का प्रीमियर प्रतिष्ठित कान्स फिल्म फेस्टिवल में हुआ था।
'फिराक' और 'मंटो' के बीच लगभग 10 साल का लंबा अंतर रहा, लेकिन इस दौरान नंदिता सक्रिय रहीं — अभिनय में, लेखन में और सामाजिक मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करने में।
ज्विगाटो और आगे की राह
'मंटो' के बाद नंदिता ने 'ज्विगाटो' का निर्देशन किया, जो गिग इकोनॉमी और डिलीवरी वर्कर्स की मुश्किलों पर केंद्रित थी। इस फिल्म में कपिल शर्मा और शाहाना गोस्वामी ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं।
नंदिता दास का सिनेमाई सफर बताता है कि वह हमेशा उन कहानियों की ओर खिंची हैं जो हाशिये पर खड़े इंसान की आवाज बनती हैं — और यही उनकी निर्देशकीय पहचान भी है।