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ओटीटी ने बदला भारतीय सिनेमा का चेहरा, पल्लवी चटर्जी ने राष्ट्र प्रेस को बताई अंदर की बात

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ओटीटी ने बदला भारतीय सिनेमा का चेहरा, पल्लवी चटर्जी ने राष्ट्र प्रेस को बताई अंदर की बात

सारांश

अभिनेत्री पल्लवी चटर्जी ने राष्ट्र प्रेस से खास बातचीत में बताया कि ओटीटी ने कैसे भारतीय सिनेमा और अभिनेत्रियों की भूमिकाओं को नया आयाम दिया। बहुभाषी अनुभव, प्रोडक्शन में उतरने की वजह और पुराने-नए दौर की तुलना पर उन्होंने बेबाकी से अपने विचार रखे।

मुख्य बातें

पल्लवी चटर्जी ने राष्ट्र प्रेस को दिए इंटरव्यू में ओटीटी को भारतीय सिनेमा का गेम-चेंजर बताया।
ओटीटी से पहले एक उम्र के बाद अभिनेत्रियों के लिए भूमिकाएं सीमित हो जाती थीं — यह समस्या अब काफी हद तक दूर हुई है।
पल्लवी ने प्रोडक्शन की दुनिया में कदम रखा और सेट पर उपकरण उठाने तक का काम किया।
उड़िया फिल्म के लिए उन्होंने स्थानीय तकनीशियनों के साथ घंटों उच्चारण सुधारा — भाषा पर पकड़ को उन्होंने अनिवार्य बताया।
डिजिटल क्रांति ने दर्शकों की समझ और उम्मीदें बढ़ाई हैं, जिससे कंटेंट की गुणवत्ता पर दबाव बढ़ा है।
फिल्म निर्माण को उन्होंने सामूहिक प्रयास बताया और कहा कि दर्शक अक्सर इसके पीछे की मेहनत और निवेश को नजरअंदाज करते हैं।

मुंबई, 22 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। बंगाली सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री पल्लवी चटर्जी ने राष्ट्र प्रेस के साथ एक विशेष बातचीत में खुलासा किया कि किस तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म ने न केवल भारतीय सिनेमा की कहानी कहने की शैली को बदला है, बल्कि अभिनेत्रियों के लिए उम्र और भूमिकाओं की सीमाएं भी तोड़ी हैं। उन्होंने अपने करियर के उतार-चढ़ाव, बहुभाषी अनुभव और प्रोडक्शन की दुनिया में कदम रखने के फैसले पर बेबाकी से बात की।

ओटीटी ने अभिनेत्रियों को दी नई पहचान

पल्लवी चटर्जी ने कहा कि ओटीटी के आगमन से पहले एक निश्चित उम्र के बाद अभिनेत्रियों के लिए फिल्मों में भूमिकाएं बेहद सीमित हो जाती थीं। उन्हें अक्सर एक ही प्रकार के किरदारों में कैद कर दिया जाता था, जिससे न तो कलाकार की प्रतिभा का सही उपयोग होता था और न ही दर्शकों को विविधता मिलती थी।

उन्होंने कहा, "मैं कुछ सार्थक और रचनात्मक करना चाहती थी, इसलिए मैंने प्रोडक्शन की दुनिया में कदम रखा।" यह निर्णय उनके लिए केवल पेशेवर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रचनात्मक स्वतंत्रता की तलाश भी था।

फिल्म निर्माण — एक सामूहिक प्रयास

अभिनेत्री ने बताया कि प्रोडक्शन के दौरान उन्होंने सेट पर उपकरण उठाने तक का काम किया है। उनके अनुसार फिल्म बनाना किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी टीम का सामूहिक प्रयास होता है।

उन्होंने कहा कि दर्शक अक्सर किसी फिल्म को अच्छी या बुरी कहकर आसानी से राय बना लेते हैं, लेकिन उसके पीछे की मेहनत, निवेश और भावनाओं को नहीं देखते। यह बात फिल्म इंडस्ट्री की एक बड़ी सच्चाई है जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है।

बहुभाषी अनुभव और भाषा की अहमियत

पल्लवी चटर्जी ने हिंदी, बंगाली और उड़िया सहित कई भाषाई फिल्म इंडस्ट्रीज में काम किया है। उनका मानना है कि एक अभिनेता के लिए किरदार तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन भाषा पर पकड़ उतनी ही जरूरी है।

उन्होंने कहा, "यदि कोई अभिनेता भाषा में सहज नहीं है, तो उसका पूरा ध्यान अभिनय के बजाय सही संवाद बोलने पर लगा रहता है।" उन्होंने बताया कि जब उन्होंने उड़िया फिल्म की, तो वहां के स्थानीय लोगों और तकनीशियनों के साथ घंटों बैठकर अपने उच्चारण को सुधारा।

उनके अनुसार "सेट पर जाने से पहले होमवर्क करना हर कलाकार के लिए अनिवार्य है।" यह अनुशासन उन्हें अपने परिवार और इंडस्ट्री के शुरुआती अनुभवों से मिला।

पुराने और नए दौर का सिनेमा — क्या बदला?

पल्लवी चटर्जी ने पुराने और नए दौर की तुलना करते हुए कहा कि पहले फिल्में केवल कमर्शियल और आर्ट सिनेमा में बंटी होती थीं और दर्शकों के पास सीमित विकल्प हुआ करते थे। आज की डिजिटल क्रांति ने यह तस्वीर पूरी तरह बदल दी है।

उन्होंने कहा, "आज की तकनीक ने सिनेमा की भव्यता बढ़ा दी है और दर्शक दुनिया भर का बेहतरीन कंटेंट देख रहे हैं।" इससे दर्शकों की समझ और उम्मीदें दोनों बढ़ी हैं, जिससे फिल्म निर्माताओं पर गुणवत्तापूर्ण कंटेंट बनाने का दबाव भी बढ़ा है।

यह बदलाव सिर्फ तकनीकी नहीं है — यह भारतीय मनोरंजन उद्योग की सोच और संरचना में एक गहरा परिवर्तन है। आने वाले समय में ओटीटी और थिएटर के बीच संतुलन कैसा होगा, यह देखना दिलचस्प रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारतीय मनोरंजन उद्योग की उस संरचनागत समस्या का स्वीकारोक्ति है जिसे बॉलीवुड दशकों से नकारता रहा है — यानी एक उम्र के बाद महिला कलाकारों की प्रासंगिकता को जानबूझकर सीमित किया जाना। ओटीटी ने इस पितृसत्तात्मक ढांचे में पहली बड़ी दरार डाली है, लेकिन यह बदलाव अभी भी अधूरा है क्योंकि अधिकांश प्रमुख ओटीटी शोज़ में भी पुरुष किरदार ही केंद्र में हैं। जब तक कंटेंट निर्माण में महिला लेखकों, निर्देशकों और निर्माताओं की हिस्सेदारी नहीं बढ़ती, तब तक यह 'बदलाव' सतही ही रहेगा।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पल्लवी चटर्जी ने ओटीटी के बारे में क्या कहा?
पल्लवी चटर्जी ने कहा कि ओटीटी के आने से पहले एक निश्चित उम्र के बाद अभिनेत्रियों के लिए भूमिकाएं बहुत सीमित हो जाती थीं। ओटीटी ने कहानी कहने के तरीके और कलाकारों के लिए नए अवसर खोले हैं।
पल्लवी चटर्जी ने प्रोडक्शन में कदम क्यों रखा?
उन्होंने बताया कि वे कुछ सार्थक और रचनात्मक करना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने प्रोडक्शन की दुनिया में कदम रखा। प्रोडक्शन के दौरान उन्होंने सेट पर उपकरण उठाने तक का काम किया।
पल्लवी चटर्जी ने बहुभाषी अभिनय के बारे में क्या बताया?
उन्होंने कहा कि अभिनेता के लिए भाषा पर पकड़ बेहद जरूरी है। उड़िया फिल्म के लिए उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ घंटों बैठकर अपने उच्चारण को सुधारा।
ओटीटी से भारतीय सिनेमा में क्या बदलाव आया है?
ओटीटी और डिजिटल क्रांति की वजह से दर्शक अब दुनिया भर का बेहतरीन कंटेंट देख सकते हैं, जिससे उनकी समझ और उम्मीदें बढ़ी हैं। पहले फिल्में केवल कमर्शियल और आर्ट सिनेमा में बंटी होती थीं, लेकिन अब विकल्पों की कोई कमी नहीं।
पल्लवी चटर्जी किन भाषाओं में काम कर चुकी हैं?
पल्लवी चटर्जी ने हिंदी, बंगाली और उड़िया सहित कई भाषाई फिल्म इंडस्ट्रीज में काम किया है। वे हिंदी और बंगाली में सहज हैं और उड़िया के लिए उन्होंने विशेष तैयारी की थी।
राष्ट्र प्रेस
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