पवन कल्याण बनना चाहते थे डायरेक्टर, भाभी सुरेखा के प्रोत्साहन ने बनाया 'पावर स्टार'
सारांश
मुख्य बातें
तेलुगु सिनेमा के पावर स्टार पवन कल्याण आज भले ही आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और करोड़ों प्रशंसकों के चहेते हों, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका असली सपना कैमरे के सामने नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने का था। पवन कल्याण का जन्म 2 सितंबर 1971 को आंध्र प्रदेश के बापटला में हुआ था और उनका असली नाम कोनिडेला कल्याण बाबू है। वह अभिनेता चिरंजीवी और अभिनेता-निर्माता नागेंद्र बाबू के छोटे भाई हैं।
डायरेक्शन का था सपना, एक्टिंग से था परहेज़
एक इंटरव्यू में पवन कल्याण ने खुद स्वीकार किया था कि उन्हें शुरुआत में कैमरे के सामने आने का कोई विशेष शौक नहीं था। उनकी रुचि लेखन, निर्देशन और फिल्म निर्माण की तकनीकी बारीकियों में थी। कहानी को पर्दे पर जीवंत करना और फिल्म बनाने की पूरी प्रक्रिया उन्हें आकर्षित करती थी — अभिनय नहीं।
यह ऐसे समय की बात है जब तेलुगु सिनेमा में उनके बड़े भाई चिरंजीवी पहले से ही एक स्थापित सितारे थे। ऐसे में पवन के लिए पर्दे के पीछे रहने की इच्छा और भी स्वाभाविक थी, क्योंकि वह अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे।
भाभी सुरेखा और परिवार ने बदली राह
पवन कल्याण की ज़िंदगी की दिशा बदलने में उनकी भाभी सुरेखा — जो चिरंजीवी की पत्नी हैं — की भूमिका सबसे अहम रही। पवन ने खुद बताया है कि भाभी सुरेखा और अल्लू अरविंद की माँ कनका रत्नम ने उन्हें अभिनय की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। परिवार के इस प्रोत्साहन ने उनकी सोच बदल दी और उन्होंने एक्टिंग को एक मौका देने का फैसला किया।
गौरतलब है कि यह प्रोत्साहन महज़ एक पारिवारिक सलाह नहीं था — यह उस इंसान के लिए एक निर्णायक मोड़ था, जो आगे चलकर तेलुगु सिनेमा का सबसे बड़ा जन-नायक बना।
करियर की शुरुआत और पहचान
पवन कल्याण ने 1996 में फिल्म 'अक्कड़ा अम्मायी इक्कड़ा अब्बायी' से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें चिरंजीवी के छोटे भाई के रूप में देखा गया, लेकिन 'गोकुलमलो सीता', 'सुस्वागतम' और 'थोली प्रेमा' जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच अपनी अलग जगह दिला दी। 1998 में आई 'थोली प्रेमा' उनके करियर की मील का पत्थर साबित हुई — इस फिल्म को नेशनल फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म इन तेलुगु मिला।
इसके बाद 'थम्मुडु', 'बद्री' और 'कुशी' जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊँचाई दी। खासकर 'कुशी' ने युवाओं के बीच उन्हें एक कल्ट फिगर बना दिया — उनकी हेयरस्टाइल, पहनावा, एक्शन और संवाद अदायगी तक फैंस के लिए प्रेरणा बन गई।
डायरेक्शन का सपना पूरा किया 'जॉनी' से
2003 में पवन कल्याण ने फिल्म 'जॉनी' बनाई, जिसमें वह न केवल लीड रोल में थे, बल्कि उन्होंने इसे लिखा और निर्देशित भी किया। यह उनके उस पुराने सपने की झलक थी जो वर्षों पहले उनके मन में पला था। हालाँकि 'जॉनी' के बाद 'गुडुंबा शंकर', 'बालू', 'बंगारम' और 'अन्नवरम' जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकीं।
लेकिन पवन कल्याण ने वापसी की। 2008 में 'जलसा' और 2012 में 'गब्बर सिंह' ने उन्हें फिर शीर्ष पर पहुँचाया। 'गब्बर सिंह' के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्टर (तेलुगु) से नवाज़ा गया। इसके बाद 'अत्तरिन्तिकी दारेदी', 'गोपाला गोपाला', 'वकील साब' और 'भीमला नायक' जैसी फिल्मों ने उन्हें 'पावर स्टार' का अटल दर्जा दे दिया।
सिनेमा से राजनीति तक का सफर
पर्दे पर अपनी धाक जमाने के बाद पवन कल्याण ने राजनीति की राह चुनी। उन्होंने 2014 में जन सेना पार्टी की स्थापना की और धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति में पूरी तरह उतर गए। वर्तमान में वह आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के पद पर हैं — यह साबित करते हुए कि जिस इंसान ने कभी कैमरे के सामने आने से झिझका था, वह आज लाखों लोगों की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करता है।