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पवन कल्याण बनना चाहते थे डायरेक्टर, भाभी सुरेखा के प्रोत्साहन ने बनाया 'पावर स्टार'

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पवन कल्याण बनना चाहते थे डायरेक्टर, भाभी सुरेखा के प्रोत्साहन ने बनाया 'पावर स्टार'

सारांश

जिस शख्स ने कभी कैमरे से मुँह फेरा, वही तेलुगु सिनेमा का 'पावर स्टार' बना। पवन कल्याण का असली सपना डायरेक्शन था — भाभी सुरेखा की एक सलाह ने राह बदल दी। अब वही पवन आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं।

मुख्य बातें

पवन कल्याण का असली नाम कोनिडेला कल्याण बाबू है और उनका जन्म 2 सितंबर 1971 को बापटला, आंध्र प्रदेश में हुआ था।
वह शुरुआत में अभिनेता नहीं, डायरेक्टर बनना चाहते थे — लेखन और निर्देशन में उनकी गहरी रुचि थी।
भाभी सुरेखा (चिरंजीवी की पत्नी) और कनका रत्नम के प्रोत्साहन से उन्होंने 1996 में अभिनय में कदम रखा।
1998 की फिल्म 'थोली प्रेमा' को नेशनल फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म इन तेलुगु मिला।
2003 में उन्होंने फिल्म 'जॉनी' लिखी, निर्देशित की और उसमें अभिनय भी किया।
2014 में जन सेना पार्टी की स्थापना के बाद वह अब आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं।

तेलुगु सिनेमा के पावर स्टार पवन कल्याण आज भले ही आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और करोड़ों प्रशंसकों के चहेते हों, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका असली सपना कैमरे के सामने नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने का था। पवन कल्याण का जन्म 2 सितंबर 1971 को आंध्र प्रदेश के बापटला में हुआ था और उनका असली नाम कोनिडेला कल्याण बाबू है। वह अभिनेता चिरंजीवी और अभिनेता-निर्माता नागेंद्र बाबू के छोटे भाई हैं।

डायरेक्शन का था सपना, एक्टिंग से था परहेज़

एक इंटरव्यू में पवन कल्याण ने खुद स्वीकार किया था कि उन्हें शुरुआत में कैमरे के सामने आने का कोई विशेष शौक नहीं था। उनकी रुचि लेखन, निर्देशन और फिल्म निर्माण की तकनीकी बारीकियों में थी। कहानी को पर्दे पर जीवंत करना और फिल्म बनाने की पूरी प्रक्रिया उन्हें आकर्षित करती थी — अभिनय नहीं।

यह ऐसे समय की बात है जब तेलुगु सिनेमा में उनके बड़े भाई चिरंजीवी पहले से ही एक स्थापित सितारे थे। ऐसे में पवन के लिए पर्दे के पीछे रहने की इच्छा और भी स्वाभाविक थी, क्योंकि वह अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे।

भाभी सुरेखा और परिवार ने बदली राह

पवन कल्याण की ज़िंदगी की दिशा बदलने में उनकी भाभी सुरेखा — जो चिरंजीवी की पत्नी हैं — की भूमिका सबसे अहम रही। पवन ने खुद बताया है कि भाभी सुरेखा और अल्लू अरविंद की माँ कनका रत्नम ने उन्हें अभिनय की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। परिवार के इस प्रोत्साहन ने उनकी सोच बदल दी और उन्होंने एक्टिंग को एक मौका देने का फैसला किया।

गौरतलब है कि यह प्रोत्साहन महज़ एक पारिवारिक सलाह नहीं था — यह उस इंसान के लिए एक निर्णायक मोड़ था, जो आगे चलकर तेलुगु सिनेमा का सबसे बड़ा जन-नायक बना।

करियर की शुरुआत और पहचान

पवन कल्याण ने 1996 में फिल्म 'अक्कड़ा अम्मायी इक्कड़ा अब्बायी' से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें चिरंजीवी के छोटे भाई के रूप में देखा गया, लेकिन 'गोकुलमलो सीता', 'सुस्वागतम' और 'थोली प्रेमा' जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच अपनी अलग जगह दिला दी। 1998 में आई 'थोली प्रेमा' उनके करियर की मील का पत्थर साबित हुई — इस फिल्म को नेशनल फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म इन तेलुगु मिला।

इसके बाद 'थम्मुडु', 'बद्री' और 'कुशी' जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊँचाई दी। खासकर 'कुशी' ने युवाओं के बीच उन्हें एक कल्ट फिगर बना दिया — उनकी हेयरस्टाइल, पहनावा, एक्शन और संवाद अदायगी तक फैंस के लिए प्रेरणा बन गई।

डायरेक्शन का सपना पूरा किया 'जॉनी' से

2003 में पवन कल्याण ने फिल्म 'जॉनी' बनाई, जिसमें वह न केवल लीड रोल में थे, बल्कि उन्होंने इसे लिखा और निर्देशित भी किया। यह उनके उस पुराने सपने की झलक थी जो वर्षों पहले उनके मन में पला था। हालाँकि 'जॉनी' के बाद 'गुडुंबा शंकर', 'बालू', 'बंगारम' और 'अन्नवरम' जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकीं।

लेकिन पवन कल्याण ने वापसी की। 2008 में 'जलसा' और 2012 में 'गब्बर सिंह' ने उन्हें फिर शीर्ष पर पहुँचाया। 'गब्बर सिंह' के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्टर (तेलुगु) से नवाज़ा गया। इसके बाद 'अत्तरिन्तिकी दारेदी', 'गोपाला गोपाला', 'वकील साब' और 'भीमला नायक' जैसी फिल्मों ने उन्हें 'पावर स्टार' का अटल दर्जा दे दिया।

सिनेमा से राजनीति तक का सफर

पर्दे पर अपनी धाक जमाने के बाद पवन कल्याण ने राजनीति की राह चुनी। उन्होंने 2014 में जन सेना पार्टी की स्थापना की और धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति में पूरी तरह उतर गए। वर्तमान में वह आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के पद पर हैं — यह साबित करते हुए कि जिस इंसान ने कभी कैमरे के सामने आने से झिझका था, वह आज लाखों लोगों की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि उन्होंने अपनी शर्तों पर अपनी पहचान बनाई। यह विरोधाभास उल्लेखनीय है कि जिस व्यक्ति ने कैमरे से बचना चाहा, उसने 'जॉनी' में लेखन-निर्देशन-अभिनय तीनों एक साथ किए। राजनीति में उनका सफर भी इसी स्वतंत्र सोच का विस्तार है — जन सेना की स्थापना से उपमुख्यमंत्री तक का रास्ता बताता है कि पर्दे के पीछे काम करने की उनकी मूल इच्छा अब जनसेवा के रूप में अभिव्यक्त हो रही है।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पवन कल्याण डायरेक्टर क्यों बनना चाहते थे?
पवन कल्याण को शुरुआत से ही लेखन, निर्देशन और फिल्म निर्माण की तकनीकी प्रक्रिया में गहरी रुचि थी। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि कहानी को पर्दे पर उतारना और फिल्म बनाने की पूरी यात्रा उन्हें अभिनय से ज़्यादा आकर्षित करती थी।
पवन कल्याण को अभिनय में आने के लिए किसने प्रेरित किया?
पवन कल्याण को उनकी भाभी सुरेखा (चिरंजीवी की पत्नी) और अल्लू अरविंद की माँ कनका रत्नम ने अभिनय की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। पवन ने खुद कहा है कि फिल्मों में उनका आना काफी हद तक भाभी सुरेखा की वजह से हुआ।
पवन कल्याण ने फिल्मी करियर की शुरुआत कब और किस फिल्म से की?
पवन कल्याण ने 1996 में फिल्म 'अक्कड़ा अम्मायी इक्कड़ा अब्बायी' से अभिनय में डेब्यू किया। इसके बाद 1998 में 'थोली प्रेमा' ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई, जिसे नेशनल फिल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म इन तेलुगु से सम्मानित किया गया।
क्या पवन कल्याण ने कभी फिल्म डायरेक्ट भी की?
हाँ, 2003 में पवन कल्याण ने फिल्म 'जॉनी' लिखी, निर्देशित की और उसमें लीड रोल भी निभाया। यह उनके उस पुराने सपने की अभिव्यक्ति थी जो उन्होंने अभिनय में आने से पहले देखा था।
पवन कल्याण अभी राजनीति में किस पद पर हैं?
पवन कल्याण वर्तमान में आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। उन्होंने 2014 में जन सेना पार्टी की स्थापना की थी और बाद में सक्रिय राजनीति में पूरी तरह उतर गए।
राष्ट्र प्रेस
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