'साधना कट': जो माथा छिपाने की कोशिश थी, वही बन गई 1960s की सबसे बड़ी हेयर क्रांति
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री साधना शिवदासानी ने अपने करियर में न सिर्फ अभिनय से, बल्कि अपने अनूठे अंदाज़ से भी पर्दे पर एक अलग छाप छोड़ी। 1960 के दशक में वह हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित अभिनेत्रियों में शुमार थीं — और उनकी यह पहचान एक ऐसे हेयरस्टाइल से जुड़ी है, जो दरअसल एक व्यावहारिक समस्या का हल था। माथे को छिपाने के लिए अपनाया गया फ्रिंज कट आगे चलकर इतना मशहूर हुआ कि पूरे देश में उसे 'साधना कट' के नाम से जाना जाने लगा।
कराची से मुंबई तक का सफर
साधना का जन्म 2 सितंबर 1941 को कराची में हुआ था, जब भारत का विभाजन अभी नहीं हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार मुंबई आ बसा। बचपन से ही फिल्मों में काम करने का सपना संजोए साधना ने धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनानी शुरू की। 1955 में उन्होंने राज कपूर की फिल्म 'श्री 420' में एक छोटी-सी भूमिका निभाई। इसके बाद 1958 में सिंधी फिल्म 'अबाना' में उनका काम देखकर निर्माता शशधर मुखर्जी ने उनमें संभावना देखी और उन्हें अभिनय की विधिवत ट्रेनिंग दिलाई।
वह फ्रिंज जिसने बदल दी पहचान
साधना को बतौर मुख्य अभिनेत्री पहला बड़ा मौका 1960 में आई फिल्म 'लव इन शिमला' से मिला। फिल्म के निर्देशक आर.के. नैय्यर और नायक जॉय मुखर्जी थे। फिल्म के लिए जब साधना की तस्वीरें देखी गईं, तो उनका चौड़ा माथा कैमरे पर स्पष्ट नज़र आ रहा था। इसे छिपाने के लिए कई हेयरस्टाइल और विग आज़माए गए, लेकिन कोई भी कारगर नहीं रहा। अंततः निर्देशक नैय्यर ने हॉलीवुड अभिनेत्री ऑड्रे हेपबर्न से प्रेरित फ्रिंज हेयरस्टाइल आज़माने का निर्णय लिया।
शुरुआत में साधना इस विचार को लेकर संशय में थीं। उन्हें आशंका थी कि किसी भारतीय चेहरे पर यह पश्चिमी स्टाइल शायद जँचे नहीं। लेकिन नतीजा उनकी उम्मीद से बिल्कुल उलट रहा — माथे पर आने वाली छोटी-छोटी लटें उनके चेहरे पर इतनी खूबसूरत लगीं कि यही उनका सिग्नेचर स्टाइल बन गया। फिल्म के हिट होते ही यह हेयरकट देशभर में चर्चा का विषय बन गया और लोग इसे 'साधना कट' कहने लगे। उस दौर में अनगिनत युवतियाँ सैलून जाकर यही कट माँगने लगीं।
करियर की ऊँचाइयाँ और 'मिस्ट्री गर्ल' की उपाधि
'लव इन शिमला' की सफलता के बाद साधना ने 'परख', 'हम दोनों', 'असली-नकली' और 'एक मुसाफिर एक हसीना' जैसी फिल्मों में काम किया। इसके बाद 'मेरे महबूब', 'राजकुमार', 'वो कौन थी?', 'आरजू', 'वक्त' और 'मेरा साया' ने उन्हें शीर्ष अभिनेत्रियों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। निर्देशक राज खोसला के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से सराही गई। 'वो कौन थी?', 'मेरा साया' और 'अनीता' में उनके रहस्यमयी किरदारों ने उन्हें 'मिस्ट्री गर्ल' की उपाधि दिलाई। 'वो कौन थी?' में सफेद साड़ी में उनका रहस्यमयी अवतार दर्शकों की स्मृति में आज भी ताज़ा है।
साधना फैशन आइकन सिर्फ हेयरस्टाइल की वजह से नहीं बनीं — 'वक्त' में उनके फिट चूड़ीदार-कुर्ते वाले लुक ने भी उस दौर की युवतियों के बीच नया ट्रेंड स्थापित किया। पर्दे पर उनका हर अंदाज़ जल्द ही आम जनजीवन के फैशन का हिस्सा बन जाता था।
स्वास्थ्य संकट और वापसी
1960 के दशक के अंत में साधना को हाइपरथायरॉइडिज्म की गंभीर समस्या हो गई। इलाज के लिए उन्हें बोस्टन जाना पड़ा और इस कारण उनका करियर कुछ समय के लिए थम गया। हालाँकि, 1969 में उन्होंने 'एक फूल दो माली' और 'इंतकाम' के ज़रिये सफल वापसी की और दोनों फिल्मों को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला।
निर्देशन और विरासत
साधना ने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन में भी कदम रखा। 1974 में उन्होंने फिल्म 'गीता मेरा नाम' का निर्देशन किया। उनकी अंतिम रिलीज़ फिल्म 'उल्फत की नई मंजिलें' 1994 में आई। निजी जीवन में उन्होंने 1966 में अपनी पहली फिल्म के निर्देशक आर.के. नैय्यर से विवाह किया। 2002 में उन्हें आईफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। 25 दिसंबर 2015 को 74 वर्ष की आयु में मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनकी विरासत आज भी 'साधना कट' के रूप में जीवित है — एक ऐसा हेयरस्टाइल जो संयोग से जन्मा और इतिहास बन गया।