डीएमएफ घोटाला: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ₹4.36 करोड़ की एफडी से ईडी-कुर्क संपत्तियाँ बदलने की याचिका ठुकराई
सारांश
मुख्य बातें
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऋषभ सोनी और उनकी पत्नी कोमल सोनी की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा अस्थायी रूप से कुर्क की गई छह अचल संपत्तियों के बदले ₹4.36 करोड़ की सावधि जमा (एफडी) स्वीकार करने का अनुरोध किया था। यह मामला जिला खनिज कोष (डीएमएफ) में कथित अनियमितताओं से जुड़े धन शोधन के आरोपों से संबंधित है।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कोई ऐसा वैधानिक या कानूनी अधिकार साबित नहीं कर सके, जिसके आधार पर कुर्क संपत्तियों के स्थान पर एफडी स्वीकार करने का निर्देश दिया जा सके।
ईडी ने 9 दिसंबर 2024 को इन संपत्तियों को डीएमएफ निधि में कथित अनियमितताओं से अर्जित अपराध की आय के समतुल्य मूल्य पर अस्थायी रूप से जब्त किया था। इसके बाद 23 मई 2025 को निर्णायक प्राधिकरण ने इस कुर्की की पुष्टि की।
याचिकाकर्ताओं के तर्क
ऋषभ और कोमल सोनी ने पीएमएलए अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष कुर्की की पुष्टि को चुनौती दी थी। उन अपीलों के लंबित रहने के दौरान उन्होंने उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि छह संपत्तियों के बदले समतुल्य मूल्य की तरल एफडी स्वीकार की जाए।
उनका तर्क था कि संपत्तियाँ प्रत्यक्ष अपराध की आय नहीं, बल्कि केवल समतुल्य मूल्य के आधार पर जब्त की गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय का असाधारण क्षेत्राधिकार राहत प्रदान करने में सक्षम है, भले ही न्यायाधिकरण के पास यह शक्ति न हो।
ईडी का पक्ष और अदालत का निर्णय
ईडी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इस प्रकार के प्रतिस्थापन के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) में कोई सामान्य वैधानिक प्रावधान नहीं है। एजेंसी ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं को रिट याचिका दायर करने के बजाय पीएमएलए की धारा 42 के तहत वैधानिक अपील का रास्ता अपनाना चाहिए था। ईडी ने उन सामग्रियों की ओर भी इशारा किया जो कथित तौर पर आवास प्रविष्टियों और कमीशन भुगतान के माध्यम से डीएमएफ निधि की हेराफेरी का संकेत देती हैं।
अदालत ने माना कि पीएमएलए और 2013 के नियमों में सामान्यतः कुर्क अचल संपत्तियों को एफडी से प्रतिस्थापित करने का प्रावधान नहीं है। केवल नियम 5(5) के तहत, और वह भी संयुक्त स्वामित्व के सीमित मामलों में, ऐसी अनुमति दी जा सकती है — और वह भी विवेकाधीन आधार पर, अनिवार्य रूप से नहीं।
कानूनी व्याख्या
उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि जब कोई विशेष क़ानून प्रभावी उपाय प्रदान करता है, तो उच्च न्यायालय को सामान्यतः अनुच्छेद 226 के तहत अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कठिनाई का तर्क वैधानिक योजना को रद्द करने का आधार नहीं बन सकता, खासकर जब कुर्की की वैधता का मामला स्वयं न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित हो।
आगे क्या
याचिका को बिना किसी लागत संबंधी आदेश के खारिज किया गया। अब ऋषभ और कोमल सोनी के पास पीएमएलए अपीलीय न्यायाधिकरण में चल रही अपीलों के माध्यम से ही राहत पाने का वैधानिक रास्ता शेष है। डीएमएफ घोटाले में ईडी की जाँच जारी है और इस मामले का अंतिम निर्णय न्यायाधिकरण स्तर पर तय होगा।