पृथ्वीराज कपूर जयंती: सांसद होकर भी थर्ड क्लास में सफर, 112 शहरों में किए 2,662 थिएटर शो
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा और भारतीय रंगमंच के महानायक पृथ्वीराज कपूर की आज, 3 नवंबर को जयंती है। वह उन विरले कलाकारों में थे जिन्होंने रुपहले परदे की चकाचौंध के बावजूद थिएटर की मशाल को कभी बुझने नहीं दिया। राज्यसभा के मनोनीत सांसद बनने के बाद भी उन्होंने अपनी थिएटर टीम के साथ थर्ड क्लास में सफर करना नहीं छोड़ा — यह समर्पण भारतीय रंगमंच के इतिहास में अनुपम है। थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, उनकी कंपनी पृथ्वी थिएटर्स ने 16 वर्षों में देश के 112 शहरों में 2,662 शो किए और पृथ्वीराज ने प्रत्येक शो में स्वयं मुख्य भूमिका निभाई।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब के समुंदरी में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में अधिकारी थे। बचपन से ही उनका झुकाव अभिनय और नाट्य कला की ओर था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पंजाब में पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए पेशावर पहुँचे, जहाँ थिएटर के प्रति उनका लगाव और गहरा होता गया। कानून की पढ़ाई भी शुरू की, किंतु अभिनय का जुनून इतना प्रबल था कि उसे बीच में ही छोड़ना पड़ा।
मुंबई आगमन और फिल्मी सफर
अपने सपने को साकार करने के लिए पृथ्वीराज 1928 में मुंबई पहुँचे। शुरुआत छोटे किरदारों से हुई, लेकिन संघर्ष लंबा नहीं रहा। 1930 में मूक फिल्म 'सिनेमा गर्ल' ने उन्हें पहचान दिलाई। इसके अगले ही वर्ष, 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' में उनकी दमदार आवाज़ और अभिनय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। बाद में वह कोलकाता के न्यू थिएटर्स से जुड़े, जहाँ फिल्म 'विद्यापति' में उनके काम को व्यापक सराहना मिली।
1941 में निर्देशक सोहराब मोदी की ऐतिहासिक फिल्म 'सिकंदर' में उन्होंने सिकंदर महान की भूमिका निभाई, जो उनके करियर का महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसके बाद 'आवारा', 'दहेज' और 'मुगल-ए-आजम' जैसी कालजयी फिल्मों में उनका अभिनय देखने को मिला।
पृथ्वी थिएटर्स: रंगमंच की विरासत
फिल्मी सफलता के बावजूद पृथ्वीराज का थिएटर-प्रेम कभी कम नहीं हुआ। 1944 में उन्होंने 'पृथ्वी थिएटर्स' की नींव रखी, जिसका उद्देश्य उत्कृष्ट नाटकों को देशभर के दर्शकों तक पहुँचाना था। कंपनी का पहला नाटक 'शकुंतला' था। इसके बाद 'दीवार', 'पठान', 'गद्दार', 'आहूति' और 'पैसा' जैसे नाटकों ने परिवार, देश के विभाजन, हिंदू-मुस्लिम एकता, गरीबी और सामाजिक विसंगतियों को मंच पर जीवंत किया। यह ऐसे समय में आया जब स्वाधीनता संग्राम और विभाजन के घाव ताजे थे — पृथ्वीराज का रंगमंच सामाजिक चेतना का माध्यम बन गया।
सांसद होकर भी थर्ड क्लास का सफर
पृथ्वीराज कपूर 1952 से 1960 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। सांसद होने के नाते उन्हें हवाई यात्रा या फर्स्ट क्लास की सुविधा सहज उपलब्ध थी, परंतु उन्होंने अपनी थिएटर टीम से अलग सफर करना स्वीकार नहीं किया। वह दल के अन्य कलाकारों और सदस्यों के साथ थर्ड क्लास में ही यात्रा करते रहे। थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 16 वर्षों के इस अथक सफर में कंपनी ने 112 शहरों में 2,662 प्रस्तुतियाँ दीं — और पृथ्वीराज ने हर बार मंच पर उतरकर मुख्य भूमिका का निर्वहन किया। गौरतलब है कि यह सिलसिला 1960 में उनके स्वास्थ्य में गिरावट के कारण थम गया और तभी पृथ्वी थिएटर्स को बंद करना पड़ा।
सम्मान और विरासत
भारतीय रंगमंच और सिनेमा में उनके असाधारण योगदान को देश ने कई रूपों में सम्मानित किया। 1954 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप प्रदान की गई। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया। इसके बाद 1971 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। 29 मई 1972 को मुंबई में कैंसर से उनका निधन हो गया। पृथ्वीराज कपूर ने जो रंगमंच की परंपरा स्थापित की, उसे उनके परिवार ने आगे बढ़ाया — आज पृथ्वी थिएटर मुंबई में सांस्कृतिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र बना हुआ है।