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पृथ्वीराज कपूर जयंती: सांसद होकर भी थर्ड क्लास में सफर, 112 शहरों में किए 2,662 थिएटर शो

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पृथ्वीराज कपूर जयंती: सांसद होकर भी थर्ड क्लास में सफर, 112 शहरों में किए 2,662 थिएटर शो

सारांश

सांसद बनने के बाद भी थर्ड क्लास में सफर — पृथ्वीराज कपूर का यह फैसला उनके थिएटर-समर्पण की सबसे बड़ी मिसाल है। 16 वर्षों में 112 शहर, 2,662 शो और हर मंच पर खुद मुख्य भूमिका — यही वह विरासत है जो 'पृथ्वी थिएटर्स' को भारतीय रंगमंच का स्तंभ बनाती है।

मुख्य बातें

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब के समुंदरी (अब पाकिस्तान) में हुआ था।
उन्होंने 1944 में पृथ्वी थिएटर्स की स्थापना की; कंपनी ने 16 वर्षों में 112 शहरों में 2,662 शो किए।
राज्यसभा के मनोनीत सांसद ( 1952–1960 ) होने के बावजूद वे अपनी टीम के साथ थर्ड क्लास में सफर करते रहे।
भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' (1931) और 'सिकंदर' (1941) उनके फिल्मी करियर के मील के पत्थर हैं।
उन्हें 1954 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, 1969 में पद्म भूषण और 1971 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
29 मई 1972 को मुंबई में कैंसर से उनका निधन हुआ।

हिंदी सिनेमा और भारतीय रंगमंच के महानायक पृथ्वीराज कपूर की आज, 3 नवंबर को जयंती है। वह उन विरले कलाकारों में थे जिन्होंने रुपहले परदे की चकाचौंध के बावजूद थिएटर की मशाल को कभी बुझने नहीं दिया। राज्यसभा के मनोनीत सांसद बनने के बाद भी उन्होंने अपनी थिएटर टीम के साथ थर्ड क्लास में सफर करना नहीं छोड़ा — यह समर्पण भारतीय रंगमंच के इतिहास में अनुपम है। थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, उनकी कंपनी पृथ्वी थिएटर्स ने 16 वर्षों में देश के 112 शहरों में 2,662 शो किए और पृथ्वीराज ने प्रत्येक शो में स्वयं मुख्य भूमिका निभाई।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब के समुंदरी में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में अधिकारी थे। बचपन से ही उनका झुकाव अभिनय और नाट्य कला की ओर था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पंजाब में पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए पेशावर पहुँचे, जहाँ थिएटर के प्रति उनका लगाव और गहरा होता गया। कानून की पढ़ाई भी शुरू की, किंतु अभिनय का जुनून इतना प्रबल था कि उसे बीच में ही छोड़ना पड़ा।

मुंबई आगमन और फिल्मी सफर

अपने सपने को साकार करने के लिए पृथ्वीराज 1928 में मुंबई पहुँचे। शुरुआत छोटे किरदारों से हुई, लेकिन संघर्ष लंबा नहीं रहा। 1930 में मूक फिल्म 'सिनेमा गर्ल' ने उन्हें पहचान दिलाई। इसके अगले ही वर्ष, 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' में उनकी दमदार आवाज़ और अभिनय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। बाद में वह कोलकाता के न्यू थिएटर्स से जुड़े, जहाँ फिल्म 'विद्यापति' में उनके काम को व्यापक सराहना मिली।

1941 में निर्देशक सोहराब मोदी की ऐतिहासिक फिल्म 'सिकंदर' में उन्होंने सिकंदर महान की भूमिका निभाई, जो उनके करियर का महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसके बाद 'आवारा', 'दहेज' और 'मुगल-ए-आजम' जैसी कालजयी फिल्मों में उनका अभिनय देखने को मिला।

पृथ्वी थिएटर्स: रंगमंच की विरासत

फिल्मी सफलता के बावजूद पृथ्वीराज का थिएटर-प्रेम कभी कम नहीं हुआ। 1944 में उन्होंने 'पृथ्वी थिएटर्स' की नींव रखी, जिसका उद्देश्य उत्कृष्ट नाटकों को देशभर के दर्शकों तक पहुँचाना था। कंपनी का पहला नाटक 'शकुंतला' था। इसके बाद 'दीवार', 'पठान', 'गद्दार', 'आहूति' और 'पैसा' जैसे नाटकों ने परिवार, देश के विभाजन, हिंदू-मुस्लिम एकता, गरीबी और सामाजिक विसंगतियों को मंच पर जीवंत किया। यह ऐसे समय में आया जब स्वाधीनता संग्राम और विभाजन के घाव ताजे थे — पृथ्वीराज का रंगमंच सामाजिक चेतना का माध्यम बन गया।

सांसद होकर भी थर्ड क्लास का सफर

पृथ्वीराज कपूर 1952 से 1960 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। सांसद होने के नाते उन्हें हवाई यात्रा या फर्स्ट क्लास की सुविधा सहज उपलब्ध थी, परंतु उन्होंने अपनी थिएटर टीम से अलग सफर करना स्वीकार नहीं किया। वह दल के अन्य कलाकारों और सदस्यों के साथ थर्ड क्लास में ही यात्रा करते रहे। थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 16 वर्षों के इस अथक सफर में कंपनी ने 112 शहरों में 2,662 प्रस्तुतियाँ दीं — और पृथ्वीराज ने हर बार मंच पर उतरकर मुख्य भूमिका का निर्वहन किया। गौरतलब है कि यह सिलसिला 1960 में उनके स्वास्थ्य में गिरावट के कारण थम गया और तभी पृथ्वी थिएटर्स को बंद करना पड़ा।

सम्मान और विरासत

भारतीय रंगमंच और सिनेमा में उनके असाधारण योगदान को देश ने कई रूपों में सम्मानित किया। 1954 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप प्रदान की गई। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया। इसके बाद 1971 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। 29 मई 1972 को मुंबई में कैंसर से उनका निधन हो गया। पृथ्वीराज कपूर ने जो रंगमंच की परंपरा स्थापित की, उसे उनके परिवार ने आगे बढ़ाया — आज पृथ्वी थिएटर मुंबई में सांस्कृतिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पृथ्वी थिएटर्स का 16 वर्षीय यात्रा-अनुभव एक प्रश्न छोड़ता है: क्या समकालीन कलाकारों में वैसी जमीनी प्रतिबद्धता बची है जो मंच को महल से ऊपर रखे? पद्म भूषण और दादासाहेब फाल्के जैसे सम्मान उनके बाद मिले — उनकी पहचान सरकारी मान्यता की मोहताज नहीं थी।
RashtraPress
2 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पृथ्वीराज कपूर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब के समुंदरी में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में अधिकारी थे।
पृथ्वी थिएटर्स की स्थापना कब हुई और इसने कितने शो किए?
पृथ्वी थिएटर्स की स्थापना 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने की थी। थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, कंपनी ने 16 वर्षों में 112 शहरों में कुल 2,662 शो किए और पृथ्वीराज ने प्रत्येक शो में मुख्य भूमिका निभाई।
पृथ्वीराज कपूर राज्यसभा सांसद होने के बाद भी थर्ड क्लास में सफर क्यों करते थे?
पृथ्वीराज कपूर 1952 से 1960 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य थे और उन्हें फर्स्ट क्लास यात्रा की सुविधा उपलब्ध थी। लेकिन उन्होंने अपनी थिएटर टीम से अलग सफर करना स्वीकार नहीं किया और दल के साथ थर्ड क्लास में ही यात्रा करते रहे।
पृथ्वीराज कपूर को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
पृथ्वीराज कपूर को 1954 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, 1969 में पद्म भूषण और 1971 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया।
पृथ्वीराज कपूर की प्रमुख फिल्में कौन सी हैं?
पृथ्वीराज कपूर ने 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' में काम किया। 1941 में 'सिकंदर' में सिकंदर महान का किरदार निभाया। इसके बाद 'आवारा', 'दहेज' और 'मुगल-ए-आजम' जैसी कालजयी फिल्मों में उनका अभिनय देखने को मिला।
राष्ट्र प्रेस
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