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रजत बेदी: '9 साल में पिता को खोया, उनका आशीर्वाद आज भी हर मुश्किल में साथ देता है'

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रजत बेदी: '9 साल में पिता को खोया, उनका आशीर्वाद आज भी हर मुश्किल में साथ देता है'

सारांश

9 साल की उम्र में पिता को खोने का दर्द और उनके अदृश्य आशीर्वाद की अनुभूति — अभिनेता रजत बेदी ने बताया कि दादा राजिंदर सिंह बेदी की साहित्यिक और पिता नरेंद्र बेदी की सिनेमाई विरासत को आगे ले जाना उनके लिए पेशा नहीं, ज़िम्मेदारी है।

मुख्य बातें

अभिनेता रजत बेदी ने 9 वर्ष की आयु में अपने पिता को खो दिया था।
उनके पिता नरेंद्र बेदी हिंदी सिनेमा के प्रतिष्ठित निर्माता-निर्देशक थे।
दादा राजिंदर सिंह बेदी प्रसिद्ध उर्दू साहित्यकार थे जिन्होंने भारतीय साहित्य में उल्लेखनीय योगदान दिया।
रजत बेदी ने कहा कि पिता का आशीर्वाद उन्हें हर कठिनाई में अदृश्य रूप से संबल देता है।
रजत अपनी परिवार की तीन पीढ़ियों की कला और सिनेमा की विरासत को आगे बढ़ाना अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं।

अभिनेता रजत बेदी ने 21 जून को मुंबई में दिए एक विशेष इंटरव्यू में अपने बचपन, पिता की यादों और परिवार की समृद्ध फिल्मी-साहित्यिक विरासत को लेकर दिल खोलकर बात की। उन्होंने बताया कि मात्र 9 वर्ष की आयु में पिता को खो देने का दर्द आज भी उतना ही गहरा है, और यही अनुभव उन्हें जीवन में एक साथ मज़बूत और भावुक बनाता है।

बचपन का वह खालीपन

रजत बेदी ने बताया, 'मेरे जीवन में पिता का साथ बहुत कम समय के लिए रहा। जब मैं 9 साल का था, तभी उन्हें खो दिया। उस उम्र में पिता के महत्व को पूरी तरह समझना मुश्किल था, लेकिन जैसे-जैसे बड़ा हुआ और दूसरे बच्चों को उनके पिता के साथ देखा, तो एक गहरा खालीपन महसूस होने लगा। यह एहसास धीरे-धीरे अंदर तक उतरता गया कि पिता का प्यार जीवन में कितना ज़रूरी होता है।'

अदृश्य आशीर्वाद की अनुभूति

रजत ने कहा, 'समय के साथ मेरे भीतर यह विश्वास और पक्का होता गया कि भले ही पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ है। जब भी कोई मुश्किल आती है या असफलता का सामना करना पड़ता है, तो ऐसा लगता है जैसे वे अदृश्य रूप से मुझे थामे हुए हैं और आगे बढ़ने की शक्ति दे रहे हैं।'

शूटिंग सेट की अनमोल यादें

अपने पिता के साथ बिताए सीमित पलों को याद करते हुए रजत बेदी ने कहा, 'कभी-कभी मैं उनके साथ शूटिंग पर जाता था — वे प्यार से गले लगाते, साथ खेलते। वे फिल्म इंडस्ट्री के जाने-माने निर्माता और निर्देशक थे, इसलिए काफी व्यस्त रहते थे, लेकिन उन थोड़े पलों की यादें आज भी दिल में ताज़ा हैं।'

तीन पीढ़ियों की विरासत

रजत बेदी ने अपने परिवार की कला और साहित्य में गहरी जड़ों का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके दादा राजिंदर सिंह बेदी प्रतिष्ठित उर्दू साहित्यकार थे, जिन्होंने भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया और अपने समय के महान लेखकों व फिल्मकारों के साथ काम किया। उनके पिता नरेंद्र बेदी हिंदी सिनेमा के जाने-माने निर्देशक रहे, जिन्होंने कई बड़े सितारों के साथ काम करते हुए यादगार फिल्में दीं।

विरासत को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी

रजत ने कहा, 'मेरे परिवार ने हमेशा मेहनत और कला को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। अब मैं उसी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ — यह मेरे लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि एक पारिवारिक ज़िम्मेदारी है।' यह स्वीकारोक्ति बताती है कि रजत बेदी के लिए अभिनय केवल करियर नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों की कलात्मक परंपरा का सातत्य है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि असली कहानी यह है कि पितृ-विरह और पारिवारिक अपेक्षाओं का यह द्वंद्व किसी कलाकार की रचनात्मक यात्रा को कितनी गहराई से आकार देता है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रजत बेदी के पिता कौन थे और उन्होंने क्या काम किया?
रजत बेदी के पिता नरेंद्र बेदी हिंदी सिनेमा के जाने-माने निर्माता और निर्देशक थे, जिन्होंने अपने करियर में कई बड़े सितारों के साथ काम किया और हिंदी सिनेमा को कई यादगार फिल्में दीं।
रजत बेदी ने पिता को किस उम्र में खोया था?
रजत बेदी ने अपने पिता को मात्र 9 वर्ष की आयु में खो दिया था। उन्होंने बताया कि उस छोटी उम्र में पिता के महत्व को पूरी तरह समझना कठिन था, लेकिन बड़े होने पर यह खालीपन और गहरा होता गया।
राजिंदर सिंह बेदी कौन थे?
राजिंदर सिंह बेदी रजत बेदी के दादा और प्रसिद्ध उर्दू साहित्यकार थे, जिन्होंने भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया और अपने समय के महान लेखकों व फिल्मकारों के साथ काम किया।
रजत बेदी अपनी पारिवारिक विरासत के बारे में क्या सोचते हैं?
रजत बेदी का मानना है कि अभिनय उनके लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि एक पारिवारिक ज़िम्मेदारी है। वे अपने दादा की साहित्यिक और पिता की सिनेमाई विरासत को आगे बढ़ाना अपना कर्तव्य समझते हैं।
रजत बेदी पिता की कमी को कैसे संभालते हैं?
रजत बेदी के अनुसार उन्हें विश्वास है कि उनके पिता का आशीर्वाद अदृश्य रूप से हमेशा उनके साथ है। हर मुश्किल और असफलता के दौर में उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे पिता उन्हें संभाल रहे हैं और आगे बढ़ने की शक्ति दे रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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